नाम में खेल या नियमों से खिलवाड़? सरकारी शिलापट्टों पर ‘किरन’ के साथ ‘राकेश’ की एंट्री पर सवाल

🔴प्रचलन’ की आड़ या नियमों की अनदेखी? शिलापट्टों पर अध्यक्ष के नाम के साथ जुडे पति के नाम ने खड़े किए बड़े सवाल

कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर इन दिनों विकास कार्यों से अधिक अपने कारगुजारियों को लेकर चर्चा में है। करोड़ों रुपये की लागत से कराए गए निर्माण कार्यों के बीच अब एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने नगर पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सरकारी शिलापट्टों पर अंकित नगर पालिका अध्यक्ष किरन जायसवाल के नाम के साथ जुडे उनके पति के नाम किरन राकेश जायसवाल का है।

बतादे कि नगर पालिका परिषद कुशीनगर के सभी आधिकारिक अभिलेखों, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड, सरकारी पत्राचार और अन्य प्रमाणित दस्तावेजों में अध्यक्ष का नाम “किरन जायसवाल” दर्ज है। लेकिन नगर में लगाए गए विकास कार्यों के अनेक सरकारी शिलापट्टों पर “किरन राकेश जायसवाल” अंकित किया गया है। सवाल यह है कि जब किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की वैधानिक पहचान सरकारी अभिलेखों से तय होती है, तो फिर सरकारी शिलापट्टों पर अलग नाम किस अधिकार और किस नियम के तहत अंकित कराया गया? विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी शिलापट्ट किसी व्यक्ति की निजी पहचान का माध्यम नहीं है, बल्कि वे सार्वजनिक धन से कराए गए कार्यों का स्थायी सरकारी अभिलेख होते हैं। ऐसे अभिलेखों पर अंकित प्रत्येक नाम, पद और विवरण आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुरूप होना चाहिए।

🔴ईओ का ‘प्रचलन’ वाला तर्क, लेकिन नियम कौन-सा?

 इस संबंध में जब नगर पालिका परिषद की अधिशासी अधिकारी अंकिता शुक्ला से बात की गई तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि नगर पालिका के रिकॉर्ड में अध्यक्ष का नाम “किरन जायसवाल” ही दर्ज है। लेकिन शिलापट्टों पर “किरन राकेश जायसवाल” लिखे जाने के संबंध में उन्होंने कहा कि “यह प्रचलन है कि हिन्दू महिलाएं अपने नाम के साथ पति का नाम जोड़ती हैं।”हालांकि जब उनसे पूछा गया कि यदि सरकारी अभिलेखों, चुनावी दस्तावेजों और अन्य प्रमाणित रिकॉर्ड में ऐसा नहीं है तो सरकारी शिलापट्टों पर ऐसा किस शासनादेश, नियमावली या वैधानिक प्रावधान के तहत किया गया, तो उन्होंने कहा कि “मैं दिखवाती हूं।”ईओ का यह जवाब अब स्वयं कई सवालों के घेरे में है, क्योंकि सरकारी कार्यों का संचालन “प्रचलन” से नहीं बल्कि नियमों, अधिनियमों और शासनादेशों से होता है।

🔴अगर प्रचलन था, तो पहले क्यों नहीं?

नगर के लोगों का कहना है कि अध्यक्ष बनने से पहले उनके आधार कार्ड, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, चुनावी नामांकन पत्र तथा नगर पालिका के रिकॉर्ड में केवल “किरन जायसवाल” नाम ही प्रयुक्त होता रहा। यदि पति का नाम जोड़ना वास्तव में परंपरा थी, तो वह पहले सरकारी दस्तावेजों में क्यों नहीं दिखाई दिया? अध्यक्ष बनने के बाद ही सरकारी शिलापट्टों पर यह बदलाव क्यों किया गया?

🔴सरकारी शिलापट्ट या निजी पहचान?

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी शिलापट्ट व्यक्तिगत परिचय या सामाजिक पहचान का माध्यम नहीं होते। वे सरकारी रिकॉर्ड का सार्वजनिक दस्तावेज होते हैं। यदि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि का नाम आधिकारिक अभिलेखों से अलग अंकित किया जाता है, तो उसका स्पष्ट प्रशासनिक और वैधानिक आधार होना चाहिए। अन्यथा यह पारदर्शिता और अभिलेखीय शुचिता पर प्रश्न खड़ा करता है।

🔴 सवाल पे सवाल कौन देगा जबाब

इस मुद्दे पर एक, दो नही तमाम यक्ष प्रश्न है, क्या सरकारी शिलापट्टों पर आधिकारिक नाम बदलकर लिखा जा सकता है?यदि हां, तो इसका नियम और शासनादेश क्या है?क्या नगर पालिका परिषद ने इस संबंध में कोई प्रस्ताव पारित किया था?क्या किसी सक्षम अधिकारी से इसकी अनुमति ली गई थी?यदि यह केवल “प्रचलन” है, तो क्या भविष्य में कोई भी जनप्रतिनिधि अपनी इच्छा के अनुसार नाम लिखवा सकता है?यदि यह त्रुटि है, तो क्या सभी शिलापट्टों को संशोधित कराया जाएगा?देखना दिलचस्प होगा कि जिलाधिकारी व नगर विकास मंत्रालय इसे कितनी गंभीरता से लेते है, क्योंकि यह मामला सिर्फ एक नाम का नहीं, बल्कि सरकारी अभिलेखों की शुचिता, प्रशासनिक पारदर्शिता और नियमों के पालन का है। फिलहाल नगर में एक ही चर्चा है “जब सरकारी रिकॉर्ड में ‘किरन जायसवाल’ हैं, तो शिलापट्टों पर ‘किरन राकेश जायसवाल’ आखिर किस नियम से लिखवाया गया?”

🔵 रिपोर्ट – संजय चाणक्य 

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