85 लाख का खेल या पारदर्शिता पर पर्दा? शिलापट्ट से गायब लागत धनराशि, सवालों के घेरे में नगर पालिका का ‘विकास मॉडल’

 गोला बाजार सब्जी मंडी के सौंदर्यीकरण में खर्च की गयी रकम और निर्माण का क्षेत्रफल छिपाया गया,शिलालेख पर नेताओं के नाम तो चमक रहे है लेकिन जनता की गाढी कमाई को विकास के नाम खर्च किये गये धनराशि को अंकित नही किया गया है।चर्चा-ए-सरेआम है धन के इस बंदरबांट में नपाध्यक्ष व ईओ की बराबर की भूमिका है।  

कुशीनगर। सूबे वजीरेआला योगी आदित्यनाथ की सरकार जहां विकास कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही को अपनी प्राथमिकता बताती है, वहीं कुशीनगर नगर पालिका परिषद में विकास कार्यों की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। वार्ड संख्या -13 स्थित गोला बाजार सब्जी मंडी के सौंदर्यीकरण कार्य ने नगर पालिका अध्यक्ष व अधिशासी अधिकारी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां विकास कार्यों के शिलापट्ट पर मुख्यमंत्री से लगायत सांसद, विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष और अधिकारियों के नाम तो बड़े-बड़े अक्षरों में अंकित हैं, लेकिन जिस धनराशि से यह निर्माण कराया गया और कितना क्षेत्र विकसित किया गया, उसका कोई उल्लेख नहीं है।सूत्रों के अनुसार इस सौंदर्यीकरण कार्य पर करीब 85 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। यदि यह सही है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जनता के टैक्स के पैसे से कराये गये निर्माण की लागत को सार्वजनिक करने से नगर पालिका प्रशासन क्यों बच रहा है? क्या यह केवल लापरवाही है या फिर वित्तीय विवरण छिपाने के पीछे कोई संदिग्ध खेल है?

🔴नामों की राजनीति, हिसाब से दूरी

मंडी परिसर में लगे शिलापट्टों को देखने पर यह सहज ही महसूस होता है कि नेताओं और अधिकारियों के नाम दर्ज कराने में न कोई कसर नहीं छोड़ी गई है और न ही उत्साह में कोई कमी रही है। मुख्यमंत्री, नगर विकास मंत्री, सांसद, विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष, सभासद, अधिशासी अधिकारी, अवर अभियंता और ठेकेदार तक के नाम प्रमुखता से लिखे गए हैं। लेकिन जिस जानकारी को सबसे पहले जनता के सामने होना चाहिए यानी निर्माण की स्वीकृत लागत, लंबाई, चौड़ाई और क्षेत्रफल वह पूरी तरह बोर्ड से नदारद है।यही तथ्य नगर पालिका की पारदर्शिता पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न खडा कर रहा है। आखिर आमजन यह कैसे जानकारी होगी कि जिस काम का उद्घाटन हुआ, उस पर कितना सरकारी धन खर्च हुआ और बदले में कितना निर्माण कराया गया?

🔴क्या छिपाना चाहती है नगर पालिका?

जानकारो की माने तो निर्माण कार्यों में लागत और माप का उल्लेख केवल औपचारिकता नहीं बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में यदि यह जानकारी जानबूझकर शिलापट्ट से हटाई गई है, तो यह संदेह स्वाभाविक है कि कहीं वास्तविक लागत और धरातल पर हुए कार्य के बीच कोई खेल तो  नहीं हुआ है।स्थानीय लोगों का कहना है कि सब कुछ नियमानुसार हुआ है तो खर्च का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करने में आखिर डर किस बात का है?

🔴नियमों की भावना पर उठे सवाल

शासन की मंशा हमेशा यही रही है कि सार्वजनिक धन से होने वाले प्रत्येक विकास कार्य की जानकारी आम नागरिक को आसानी से उपलब्ध हो। शिलापट्ट का उद्देश्य केवल उद्घाटन का प्रचार करना नहीं, बल्कि जनता को यह बताना भी होता है कि उनके पैसे से कौन-सा कार्य, कितनी लागत से और किस एजेंसी द्वारा कराया गया है।ऐसे में यदि केवल जनप्रतिनिधियों के नाम प्रदर्शित किए जाएं और वित्तीय जानकारी गायब रहे, तो यह न सिर्फ पारदर्शिता की भावना पर गंभीर सवाल खड़े करता है बल्कि नपाध्यक्ष व ईओ की आपसी तालमेल से किये गये धन की बंदरबांट की ओर भी इशारा करता है। 

🔴ईओ ने दी सफाई

इस संबंध में नगर पालिका की अधिशासी अधिकारी अंकिता शुक्ला का कहना है कि यह शिलापट्ट केवल शिलान्यास और लोकार्पण के लिए लगाया जाता है। ऐसे शिलापट्टों पर लागत और क्षेत्रफल अंकित नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि केवल कुछ विशेष योजनाओं, जैसे स्वच्छ भारत मिशन आदि में यदि गाइडलाइन होती है, तभी लागत और क्षेत्रफल लिखा जाता है। सामान्यतः ऐसे बोर्डों पर केवल जनप्रतिनिधियों के नाम और कार्यदायी संस्था का विवरण दर्ज किया जाता है।

🔴 उठ रहे सवाल

नगर पालिका की इस दलील के बाद कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। यदि करोड़ों और लाखों रुपये के विकास कार्यों का वित्तीय विवरण सार्वजनिक नहीं होगा, तो जनता खर्च की निगरानी कैसे करेगी? यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है, तो निर्माण की लागत और क्षेत्रफल बताने में संकोच क्यों? जानकारों का कहना है कि गोला बाजार सब्जी मंडी का यह मामला सिर्फ एक शिलापट्ट का नहीं, बल्कि सरकारी धन के उपयोग में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनविश्वास का है। अब देखना दिलचस्प होगा कि शासन सत्ता मे बैठे जिम्मेदार और जिले आला अफसर इस मामले को कितना गंभीरता से लेते है।

🔵 रिपोर्ट – संजय चाणक्य 

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