खाकी की नुमाइश में हर माल तीस रुपये की तर्ज पर पिसते दरोगा और दम तोड़ती विवेचना

AGRA: थानों के बाहर जब आप खड़े होते हैं तो अंदर खाकी वर्दी की एक भारी भीड़ नजर आती है कभी जिस दरोगा को देखकर इलाके में सन्नाटा छा जाता था और जिसकी डायरी से मुजरिम का भविष्य तय होता था। आज उसी दरोगा की अहमियत नुमाइश की दुकानों में बिकने वाले हर माल 30 रुपये के सामान जैसी हो गई है।पुलिस महकमे में अब करीब 40000 दरोगाओ की एक अथाह भीड़ जमा हो गई है। जिनमे लगभग 20000 वो हैं। जो अपनी लंबी सेवा के बाद मुख्य सिपाही से प्रमोशन से आए हैं। और करीब 20000 वो हैं । जो सीधी परीक्षा/ विभागीय परीक्षा देकर सब इंस्पेक्टर हुए हैं। लेकिन इस भारी भरकम फौज के बावजूद थानों में न्याय दम तोड़ रहा है। क्योंकि हमने संख्या तो बढ़ा दी लेकिन उनकी काबलियत के हिसाब से उनके काम का बंटवारा नही किया ।मतलब क्वालिटी बड़ी लेकिन क्वांटिटी नहीं।
आज फिर से विभागीय परीक्षाओ की पहल करने की पुन: जरूरत है। तभी प्रतिभाओ का सही पता चल सकेगा।
फिटकरी और मिश्री दोनों सफेद होती हैं। दूर से देखने पर आप बता नही सकते कि कौन सी फिटकरी है। और कौन सी मिश्री लेकिन जब आप उसे जुबान पर रखते हैं। तब असली स्वाद का पता चलता है।आज थानों में मौजूद दरोगाओ की स्थिति भी इसी फिटकरी और मिश्री जैसी हो गई है।
जो दरोगा 25 या 30 साल सिपाही और हेड कांस्टेबल रहकर प्रमोशन पाकर दरोगा बने हैं। उनके पास जमीन का तगड़ा अनुभव है। वो जानते हैं कि मुजरिम की नब्ज कहां दबानी है। और मुखबिर तंत्र से खबर कैसे निकालनी है। दूसरी तरफ जो दरोगा सीधी भर्ती से आए हैं। वो तकनीक में तेज हैं।और कानून की नई किताबों को रटकर आए हैं लेकिन सरकार और पुलिस विभाग इन दोनों को एक ही तराजू पर तौल रहा है। किसी को यह नही पता कि फिटकरी का इस्तेमाल कहां करना है। और मिश्री का कहां !
नतीजा यह है। कि हर दरोगा गश्त भी कर रहा है वीआईपी ड्यूटी भी कर रहा है और हत्या या साइबर क्राइम की विवेचना भी कर रहा है ।
थोक भाव में होती भर्तियां और प्रमोशन का रेला
अगर आप हालिया आंकड़ो पर नजर डालें तो आपको पुलिस महकमे में हो रही थोक भाव की भर्तियों और प्रमोशन का अंदाजा लग जाएगा उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड ने हाल ही में 4543 पदों पर दरोगाओ का फाइनल रिजल्ट जारी किया जिसके लिए करीब 15 लाख से ज्यादा युवाओ ने किस्मत आजमाई थी। इससे पहले 2021 की भर्ती रैली में भी 3638 दरोगा भर्ती हुए थे और अब फिर से मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद 26596 पदों पर नई पुलिस सिपाही भर्ती की प्रक्रिया शुरू होने वाली है । 2026 मे फिर से 4543 पद दरोगाओ का चयन हो चुका है।
दूसरी तरफ थानों में तैनात दीवान और हेड कांस्टेबलों को भी थोक में प्रमोशन देकर दरोगा बनाया जा रहा है। पुलिस मुख्यालय 7639 हेड कांस्टेबलों को पदोन्नति देकर दरोगा बनाने की प्रक्रिया चला रहा है। जिसमे सिर्फ उन दीवानों को मौका मिल रहा है। जिन्होंने सिपाही से दीवान बनने के दौरान प्रशिक्षण प्राप्त किया था।अभी हाल ही में उन्नाव जैसे जिलों में 45 हेड कांस्टेबलों के कंधों पर एक साथ स्टार सजा दिए गए इससे पहले 1781 हेड कांस्टेबल दरोगा बने थे और 80 इंस्पेक्टरों को डिप्टी एसपी बना दिया गया था। इस तरह से बिना किसी दूरगामी योजना के प्रमोशन और नई भर्तियों के इस घालमेल ने 40000 दरोगाओ की एक ऐसी फौज खड़ी कर दी है। जो थानों में आपस में ही टकरा रही है। क्योंकि किसी का भी स्पष्ट कार्य विभाजन तय नही है। और न ही किसी की विशेषज्ञता ज्ञान का सही इस्तेमाल हो पा रहा है
विवेचना और कानून व्यवस्था एक ही कंधे पर दो पहाड़
सबसे गंभीर और चिंताजनक बात यह है। कि हमारे देश में पुलिस सुधारों की बात दशकों से केवल कागजों पर धूल फांक रही है । लॉ कमीशन ने अपनी 154 वीं रिपोर्ट में बहुत साफ शब्दों में कहा था। कि गंभीर अपराधों की विवेचना करने वाली पुलिस को कानून व्यवस्था संभालने वाली पुलिस से बिल्कुल अलग होना चाहिए, रिपोर्ट में यह भी बताया गया था। कि जब कोई विवेचक किसी मामले की विवेचना शुरू करे तो उसे सिर्फ उसी काम में लगाया जाना चाहिए उसे वीआईपी प्रोटोकॉल ड्यूटी सड़क पर ट्रैफिक संभालने या मेले के इंतजाम से पूरी तरह मुक्त रखना चाहिए लेकिन थानों की हकीकत यह है । कि एक ही दरोगा सुबह किसी नेता का रूट लगाता है। दोपहर में जुलूस को रोकता है।और रात को थक हारकर मर्डर मिस्ट्री की केस डायरी लिखता है
सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक मामले में पुलिस सुधार के लिए सात कड़े निर्देश दिए थे इनमे से एक सबसे प्रमुख निर्देश यही था। कि विवेचना विंग और लॉ एंड ऑर्डर विंग को अलग अलग किया जाए ताकि जांच में तेजी आए विशेषज्ञता बढ़े और जनता का पुलिस पर भरोसा कायम हो मलिमथ समिति ने भी 2003 में अपनी रिपोर्ट में यही सिफारिश की थी कि पुलिस थानों में अपराध की जांच को कानून व्यवस्था से अलग किया जाए ताकि फोरेंसिक विज्ञान का सही इस्तेमाल हो सके और गवाहों को सुरक्षा मिल सके रिबेरो समिति और पद्मनाभैया समिति ने भी चीख चीख कर यही कहा था । लेकिन किसी भी राज्य सरकार ने इन निर्देशों को लागू करने में कोई दिलचस्पी नही दिखाई
कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव की रिपोर्ट साफ बताती है। कि इतने साल बीत जाने के बाद भी किसी भी राज्य ने प्रकाश सिंह जजमेंट का पूरी तरह से पालन नही किया है।जब एक ही दरोगा से दोनों काम लिए जाते हैं तो वह हमेशा आसान काम को तरजीह देता है। लॉ एंड ऑर्डर एक ऐसी चीज है। जो तुरंत दिखती है । अगर सड़क पर जाम लगा है या हंगामा हो रहा है। तो पुलिस को तुरंत पहुंचना पड़ता है।वरना मीडिया से लेकर उच्च अधिकारी तक सब टूट पड़ते हैं। लेकिन किसी पुरानी फाइल में सबूत तलाशने का काम ऐसा है। जिसमे हफ्तों का समय लग सकता है इसीलिए विवेचना हमेशा पीछे छूट जाती है। दरोगाओं की इतनी बड़ी फौज होने के बावजूद जांच की पेंडेंसी बढ़ती जा रही है। और पीड़ित थानों के चक्कर काटने को मजबूर हैं
नए आपराधिक कानून बीएनएसएस का बोझ और हांफता तंत्र अब एक तरफ थानों में हर माल तीस रुपये की तरह दरोगाओ की भीड़ है। तो दूसरी तरफ देश में अंग्रेजों के जमाने के कानून बदलकर नए आपराधिक कानून लागू हो गए हैं । 1जुलाई 2024 से लागू हुई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस 2023 ने पुलिस की विवेचना को और भी तकनीकी और जटिल बना दिया है। बीएनएसएस की धारा 176(3) के तहत अब 7 साल या उससे अधिक सजा वाले गंभीर अपराधों में फोरेंसिक एक्सपर्ट का अपराध स्थल पर जाना और वहां से सबूत इकट्ठा करना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही इस पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी भी अनिवार्य है। ताकि सबूतों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके ।
इसी तरह बीएनएसएस की धारा 180 के तहत गवाहों के बयान अब ऑडियो वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दर्ज किए जा सकते हैं। डीजीपी मुख्यालय उत्तर प्रदेश ने इस संबंध में परिपत्र संख्या 39 जारी किया है । जिसमे स्पष्ट निर्देश है । कि विवेचना के दौरान गवाहों के कथन इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से ही रिकॉर्ड किए जाएं और इलाहाबाद हाई कोर्ट के 30 जुलाई 2026 के आदेश का कड़ाई से पालन किया जाए हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी। कि विवेचक गवाहों के बयान अपनी मर्जी से घुमा फिरा कर लिख लेते हैं। और उनसे ऐसे सवाल पूछते हैं। जो अभियुक्त को फंसाने वाले हों इसलिए अदालत ने कहा कि गवाह जो बोले उसे बिना किसी बदलाव के उसी की भाषा में रिकॉर्ड किया जाए
बीएनएसएस की धारा 173 में ई एफआईआर और जीरो एफआईआर का भी प्रावधान है। जिससे कहीं से भी अपराध की सूचना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी जा सकती है अगर तीन दिन के अंदर ई एफआईआर पर शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर नही हुए तो पूरी कानूनी प्रक्रिया वहीं रुक जाएगी इसके अलावा धारा 173(3) के तहत 3 से 7 साल की सजा वाले मामलों में 14 दिन की प्रारंभिक जांच का भी प्रावधान है ।
जरा सोचिए जिस दरोगा को स्मार्टफोन का कैमरा ठीक से ऑन करना नही आता जिसने अपनी आधी पुलिसिया जिंदगी सिर्फ लाठी भांजने और भीड़ को खदेड़ने में बिता दी हो वो अचानक से इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य कैसे जुटाएगा वो कैसे फोरेंसिक लैब के साथ वैज्ञानिक समन्वय करेगा क्या इन 40000 दरोगाओ को वो विश्वस्तरीय प्रशिक्षण मिला है। यदि मिला भी है।तो मात्र 40 दिन का! जो एक वैज्ञानिक विवेचना के लिए पर्याप्त नही है । अगर 20000 प्रमोशन वाले दरोगा और 20000 सीधी भर्ती/ रेंकर परीक्षा वाले दरोगा के बीच उनके तकनीकी कौशल के आधार पर विवेचना और कानून व्यवस्था का बंटवारा नही किया गया। तो यह नया कानून जमीन पर पूरी तरह से फेल हो जाएगा। यह बिल्कुल ऐसा ही है । जैसे आप किसी हलवाई से कह रहे हैं।कि वह जूता सिल दे और मोची से कह रहे हैं कि वह आपके लिए जलेबी बना दे।
केस डायरी में फर्जीवाड़ा और अदालतों की फटकार
पुलिस की इस अदूरदर्शिता और लचर व्यवस्था का खामियाजा अंततः आम जनता को भुगतना पड़ता है अदालतों में जब पुलिस की विवेचना और केस डायरी पहुंचती है तो अक्सर जज भी अपना सिर पकड़ लेते हैं इलाहाबाद हाई कोर्ट बार बार पुलिस की खराब विवेचना और केस डायरी में जानबूझकर छोड़ी गई त्रुटियों को लेकर पुलिस को फटकार लगाता रहा है कई मामलों में तो अदालत ने विवेचना अधिकारियों के खिलाफ ही भ्रष्टाचार और लापरवाही की जांच के आदेश दे दिए हैं ।
जब कोई विवेचना अधिकारी किसी दबाव में या अपनी अज्ञानता के कारण लापरवाही करता है केस डायरी में सही साक्ष्य दर्ज नही करता या बीएनएसएस के तहत अनिवार्य इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को कोर्ट के सामने सही प्रारूप में पेश नही कर पाता तो बड़े से बड़ा अपराधी भी सबूतों के अभाव में आसानी से बरी हो जाता है । एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि आईपीसी के अपराधों में दोषसिद्धि दर 54 प्रतिशत के आसपास झूल रही है जो कि ऐतिहासिक औसत 42 प्रतिशत से थोड़ी ही बेहतर है । इसका सीधा मतलब है। कि पुलिस जिन मामलों की जांच करती है उनमे से लगभग आधे मामलों में अपराधी अदालत से छूट जाते हैं।यह पुलिस की विवेचना प्रणाली की बहुत बड़ी और शर्मनाक विफलता है
प्रमोशन से आए दरोगाओ के पास जमीनी अनुभव होता है वो जानते हैं कि मुजरिम कैसे पकड़ा जाता है । लेकिन जब बात बीएनएसएस के तहत डिजिटल एविडेंस जुटाने की आती है। या अदालत में तकनीकी जिरह की आती है। लेकिन विवेचनाओ तो वो बुरी तरह पिछड़ जाते हैं। दूसरी तरफ जो सीधी भर्ती/ रेंकर परीक्षा से दरोगा बनकर आए हैं। उनके पास किताबों का ज्ञान है तकनीकी समझ है लेकिन उनके पास वो जमीनी अनुभव और मुखबिरों का नेटवर्क नही है । जो एक मंजे हुए पुलिस वाले के पास होता है । पुलिस महकमा इन दोनों को एक ही लाठी से हांक रहा है किसी को यह परवाह नही है कि फिटकरी का इस्तेमाल कहां करना है। और मिश्री का कहां।
इंस्पेक्टरो का अंधकारमय भविष्य और पुलिस रिफॉर्म का भद्दा मजाक
अगर आज दरोगाओ की स्थिति नुमाइश के 30 रुपये वाले माल जैसी हो गई है तो यकीन मानिए कुछ ही दिनों में इंस्पेक्टरो की हालत भी ऐसी ही होने वाली है क्योंकि जब नीचे से 40000 दरोगा प्रमोशन की कतार में खड़े होंगे तो इंस्पेक्टरो की भीड़ भी थानों में इसी तरह बढ़ेगी इंस्पेक्टर जिसे थाना प्रभारी कहा जाता है आज वह सिर्फ एक मैनेजर या पोस्टमास्टर बनकर रह गया है जो ऊपर से आने वाले आदेशों को नीचे सिपाहियों और दरोगाओ में ट्रांसफर करता है और राजनेताओं के भारी दबाव में काम करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह मामले में यह स्पष्ट कहा था। कि पुलिस अधिकारियों का कार्यकाल तय होना चाहिए और पुलिस एस्टेब्लिशमेंट बोर्ड (पीईबी) बनना चाहिए जो बिना किसी राजनीतिक दबाव के ट्रांसफर और पोस्टिंग तय करे लेकिन राज्यों ने इन आदेशों को जिस तरह से तोड़ा मरोड़ा है वो पुलिस रिफॉर्म के नाम पर एक खुला और भद्दा मजाक है। देश आजाद होने के 80 साल बाद आज भी ट्रांसफर और पोस्टिंग में राजनीतिक दखलंदाजी चरम पर है । जब एक विवेचक को यह जानता है । कि अगर उसने किसी रसूखदार राजनेता या माफिया के खिलाफ सही विवेचना कर दी। तो उसका ट्रांसफर रातों रात या फिर कुछ समय बाद किसी दूर दराज इलाके में कर दिया जाएगा, तो वह निष्पक्ष जांच कैसे करेगा ,विवेचक सिर्फ एक रबर स्टैंप बनकर रह गया है। जहां फैसले कहीं और होते हैं और मोहर कहीं और लगती है
स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट बताती है कि भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर केवल 155 पुलिसकर्मी उपलब्ध हैं जबकि संयुक्त राष्ट्र का मानक 222 पुलिसकर्मियों का है। 83 प्रतिशत से ज्यादा पुलिसकर्मी अत्यधिक तनाव और काम के बोझ तले दबे हैं ऐसे में 40000 दरोगाओ की यह भारी भीड़ भी नाकाफी ही साबित होगी अगर हमने उन्हें सही तरीके से इस्तेमाल नही किया थानों में काम का बोझ इतना है। कि पुलिस वाले न तो अपने परिवार को समय दे पाते हैं और न ही अपनी सेहत पर ध्यान दे पाते हैं इसी का नतीजा है कि उनके व्यवहार में रुखापन आ जाता है और जनता के साथ उनका संवाद लगातार बिगड़ता जा रहा है
क्या सिस्टम न्याय के लिए है या सिर्फ दिखावे के लिए
क्या आपको लगता है कि आपका अंग्रेजी हकूमत द्वारा बनाया गया पुलिस एक्ट 1861 का सिस्टम आपको न्याय देने के लिए बना है। या सिर्फ आपको यह एहसास दिलाने के लिए बना है।कि न्याय की एक दुकान खुली हुई है। जहां हर माल तीस रुपये की तर्ज पर काम हो रहा है
- क्या थानों में 40000 दरोगाओ की फौज खड़ी कर देने से अपराध कम हो जाएंगे या सिर्फ थानों में बैठने के लिए कुर्सियां कम पड़ जाएंगी।
- जब एक ही पुलिस वाले को धूप में खड़े होकर लाठी चार्ज भी करना है। और रात को उसी हाथ से मर्डर मिस्ट्री की बारीक वैज्ञानिक रिपोर्ट भी बनानी है। तो क्या वो दोनों काम ईमानदारी और सटीकता से कर पाएगा।
- अगर फिटकरी और मिश्री दोनों को एक ही डिब्बे में पीसकर रख दिया जाए तो क्या आप कभी चाय में सही मिठास ला पाएंगे
सरकारें हर साल हजारों भर्तियां निकालती हैं। टेंडर जारी होते हैं ढोल नगाड़े बजते हैं । कि हमने पुलिस को बहुत मजबूत कर दिया। - लेकिन क्या बिना ला एंड ऑर्डर एवम् विवेचना विंग अलग किए पुलिस कभी वास्तव में मजबूत हो सकती है। यह आज भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है।
ये वो व्यंग्यात्मक और बेचैन करने वाले सवाल हैं। जो हर उस नागरिक को पूछने चाहिए जो न्याय की उम्मीद में किसी पुलिस स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ता है । अगर हम सिर्फ संख्या बल बढ़ाते रहेंगे और पुलिस की कार्यप्रणाली और ढांचे में सुधार नही करेंगे तो हम एक ऐसे पुलिस स्टेट की तरफ बढ़ रहे हैं जहां वर्दीधारी तो हर नुक्कड़ पर बहुत होंगे लेकिन न्याय देने वाला कोई नही होगा आप सोचिए एक दरोगा जो दिन भर चिलचिलाती धूप में किसी बड़े अधिकारी की ड्यूटी बजाता है। वो शाम को आपकी लूटी हुई मोटरसाइकिल कैसे खोजेगा टीवी के परदे पर आपको जो चमकती हुई पुलिस दिखती है। थानों के अंदर उसकी फाइलें असल में दीमक खा रही हैं।
पुरानी व्यवस्था से नए अपराधों से लड़ने की जिद
आज हालात इस खतरनाक मोड़ पर पहुंच गए हैं कि हम 1861 की पुरानी औपनिवेशिक व्यवस्था के सहारे 2026 के नए जमाने के साइबर और डिजिटल अपराधों से नही लड़ सकते विवेचना विंग और लॉ एंड ऑर्डर विंग को अलग अलग करना अब कोई विकल्प नही बल्कि समय की सबसे बड़ी और अनिवार्य जरूरत बन गई है
अगर हमने जल्द ही सिर्फ जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों का एक अलग और विशेषज्ञ कैडर नही बनाया तो नए आपराधिक कानून बीएनएसएस और भारतीय न्याय संहिता सिर्फ किताबों में ही अच्छे लगेंगे जमीन पर पुलिस की वही पुरानी लाठी और वही पुरानी घिसी पिटी आन लाइनकेस डायरी चलेगी, जिसमे न तो कोई वैज्ञानिक साक्ष्य होगा और न ही कोई तकनीकी आधार दोषसिद्धि दर जो आज 54 प्रतिशत पर है।
बस कॉपी पेस्ट कर आन लाइन विवेचना का की यह नई दर चलती रहेगी। वह आने वाले समय में और भी नीचे गिर सकती है क्योंकि अदालतें अब सिर्फ कागजी बयानों पर नही बल्कि इलेक्ट्रॉनिक और फोरेंसिक सबूतों पर फैसला सुनाती हैं।
अगर हमें अपनी पुलिस को एक पेशेवर पारदर्शी और जनता के प्रति जवाबदेह संस्था बनाना है तो हमें नुमाइश की इस दुकान को तुरंत बंद करना होगा हर माल तीस रुपये की तर्ज पर सभी दरोगाओ को एक ही नजरिए से आंकना बंद करना होगा जिनकी विशेषज्ञता विवेचना और फोरेंसिक विज्ञान में है उन्हें सिर्फ और सिर्फ विवेचना का काम मिले और जिनका अनुभव फील्ड में कानून व्यवस्था संभालने और भीड़ को नियंत्रित करने में है उन्हें वो जिम्मेदारी मिले
फिटकरी और मिश्री का यह बारीक अंतर अगर सिस्टम जल्द नही समझेगा तो जनता के लिए न्याय का स्वाद हमेशा कड़वा ही रहेगा । और वर्दी का रुतबा सिर्फ फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा यही वह कड़वा सच है जिसे हमें आज हर हाल में स्वीकार करना होगा ताकि कल का भविष्य थोड़ा बेहतर और सुरक्षित हो सके और थानों की चौखट पर खड़ा आम आदमी न्याय की उम्मीद में खाली हाथ न लोटे।
लेखक पुलिस के विभागीय मामलों का जानकार है।