UP News: श्रावस्ती एनकाउंटर पर हाईकोर्ट सख्त, CBI जांच के आदेश; SHO की कहानी पर उठाए गंभीर सवाल – INA

उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में पुलिस मुठभेड़ में घायल चोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं. हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के लिए CBI को जांच सौंपने का आदेश दिया है. कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि पुलिस की FIR में दर्ज घटनाक्रम और जांच की प्रक्रिया को लेकर गंभीर संदेह पैदा होता है. न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की अदालत ने 13 अगस्त 2026 के आदेश में CBI को जांच करने के निर्देश दिए हैं.
सीबीआई को जांच के लिए अधिकारी नामित करना होगा और जांच रिपोर्ट प्राथमिकता के आधार पर तीन महीने के भीतर अदालत में पेश करने को कहा गया है. मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को होगी. तब तक श्रावस्ती की अतिरिक्त सत्र अदालत के 2 जुलाई 2026 के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक रहेगी.
क्या है पूरा मामला?
मामला 9 मई 2025 को श्रावस्ती के इकौना थाना क्षेत्र में एक सात वर्षीय बच्ची को कथित तौर पर ई-रिक्शा से ले जाने से जुड़ा है. इस मामले में FIR दर्ज होने के करीब एक घंटे के भीतर एक आरोपी शफीक को बच्ची के साथ पकड़कर पुलिस को सौंप दिया गया था. बाद में पुलिस ने चोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन को इस मामले से जोड़ते हुए उसके खिलाफ अलग FIR दर्ज की.
12 मई 2025 को SHO इकौना ने चोटकऊ के खिलाफ BNS की धारा 109 और आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत FIR दर्ज की. पुलिस का दावा था कि नेपाल भागने की कोशिश कर रहे चोटकऊ को पकड़ने के लिए पुलिस टीम ने घेराबंदी की. पुलिस के मुताबिक, चोटकऊ ने फायरिंग की, जिसके जवाब में SHO ने आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं और दोनों उसके पैरों में लगीं. मौके से तमंचा और कारतूस बरामद होने का भी दावा किया गया.
13 पुलिसकर्मी एक ही गाड़ी में कैसे?
हाईकोर्ट ने FIR के घटनाक्रम पर कई सवाल उठाए. अदालत ने कहा कि पुलिस के अनुसार SHO समेत 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे. कोर्ट ने टिप्पणी की कि सामान्य पुलिस जीप, SUV या MUV में 13 लोगों का बैठना व्यावहारिक और कानूनी रूप से संभव नहीं दिखता. इसके बाद FIR में बताया गया कि यही 13 पुलिसकर्मी तीन टीमों में बंटकर तीन अलग-अलग रास्तों पर चले गए. हाईकोर्ट ने इस कहानी को भी असंभव जैसा बताते हुए सवाल उठाया कि अगर टीम एक ही वाहन में थी तो तीन अलग-अलग दिशाओं में जाने के लिए वाहनों की व्यवस्था कहां से हुई.
23 पुलिसकर्मी थे, फिर भी आरोपी से मुठभेड़?
पुलिस के मुताबिक, SWAT टीम के 10 जवानों समेत कुल 23 पुलिसकर्मियों ने पुल के पास घेराबंदी की थी. कोर्ट ने सवाल उठाया कि 23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद ई-रिक्शा पर सवार व्यक्ति वहां से भागने में कैसे सफल हुआ. अदालत ने इस घटनाक्रम को भी अविश्वसनीय बताया. पुलिस का दावा था कि चोटकऊ ने फायरिंग की और उसके बाद हथियार लोड करने की आवाज सुनकर SHO ने दो गोलियां चलाईं. दोनों गोलियां उसके पैरों में लगीं. हाईकोर्ट ने इस दावे पर भी गंभीर सवाल खड़े किए.
9 MM की गोली और चोट के निशान पर भी सवाल
कोर्ट ने SHO से पूछा कि उन्होंने करीब 15 मीटर की दूरी से रात में केवल हथियार लोड होने की आवाज सुनकर कैसे निशाना लगाया. SHO ने जवाब दिया कि रात में चांदनी थी. इसके बाद कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए गोली के आकार और शरीर पर मिले घावों को लेकर भी सवाल उठाए. अदालत ने SHO के स्पष्टीकरण को तर्कसंगत नहीं माना.
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा कि SHO ने FIR में और अदालत के सामने भी सही घटनाक्रम नहीं बताया और अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया हो सकता है. कोर्ट ने माना कि इससे FIR में गलत विवरण दर्ज किए जाने की उचित आशंका पैदा होती है.
पुलिसकर्मियों को मिला था इनाम
अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि कथित एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों को उनके कथित अच्छे काम के लिए पुरस्कृत किया गया था. कोर्ट ने कहा कि यह कथित अच्छा काम ऐसे अपराध की स्वीकारोक्ति निकालने से भी जुड़ा था, जिसमें चोटकऊ को पहले ही सुप्रीम कोर्ट बरी कर चुका था.
पहले भी फांसी की सजा से बरी हो चुका है चोटकऊ
हाईकोर्ट के आदेश में चोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन के पुराने मामले का भी जिक्र है. उसे 2012 के एक छह वर्षीय बच्ची से जुड़े रेप और हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराकर सजा दी थी. हाईकोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2022 को उसकी अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने जांच और साक्ष्यों के मूल्यांकन में गंभीर कमियां बताई थीं.
हाईकोर्ट ने क्यों दी CBI जांच?
हाईकोर्ट ने कहा कि पूरे घटनाक्रम में ऐसे कई तथ्य सामने आए हैं, जो पुलिस के कथन की शुद्धता पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं. कोर्ट ने यह भी पाया कि जांच पहले SHO के अधीनस्थ पुलिस अधिकारी ने शुरू की थी, बाद में जांच दूसरी जगह ट्रांसफर हुई, लेकिन चार्जशीट फिर उसी SHO की ओर से दाखिल की गई, जो इस मामले में शिकायतकर्ता भी था.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र मामले में निर्धारित एनकाउंटर जांच संबंधी दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया. हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा कि मौजूदा मामले में इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया प्रतीत होता है.
CBI जांच में क्या-क्या जांचा जाएगा?
अदालत ने खास तौर पर निर्देश दिया है कि जांच के दौरान SHO अश्विनी कुमार दुबे की 15 मीटर की दूरी से रात में 9 MM सर्विस पिस्टल से केवल हथियार लोड होने की आवाज के आधार पर निशाना साधने और गोली चलाने की क्षमता का भी आकलन किया जाए. हाईकोर्ट ने साफ किया है कि मामले में अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है. अदालत ने प्रथम दृष्टया पुलिस के कथन और जांच में गंभीर खामियों की आशंका जताते हुए स्वतंत्र CBI जांच का आदेश दिया है.
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श्रावस्ती एनकाउंटर पर हाईकोर्ट सख्त, CBI जांच के आदेश; SHO की कहानी पर उठाए गंभीर सवाल
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