आगरा में ईदमिलादुन्नबी के भव्य जुलूसों की तैयारियां सुरु होगा अकीदत और रूहानियत का संगम, मंटोला पुलिस का साफ सन्देश शान्ति से संपन्न कराएंगे जलूस, बिना इजाजत नही होगी कोई नई जुलूस की परम्परा

आगरा: ईद मिलादुन्नबी के दिन आगरा शहर पूरी तरह से पैगंबर मुहम्मद के रंग में रंग जाता है। मस्जिदों, चौराहों और मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों को रंग-बिरंगी रोशनियों, इस्लामी झंडों और तोरणद्वारों से सजाया जाता है। इस जश्न का मुख्य आकर्षण वे विशाल और सुव्यवस्थित जुलूस हैं जो शहर के विभिन्न हिस्सों से निकलते हैं। इन जुलूसों में शांति, व्यवस्था और भव्यता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न कमेटियां दिन-रात एक कर देती हैं।

इस्लामिया लोकल एजेंसी और शाही जामा मस्जिद का मुख्य जुलूस
​आगरा में ईद मिलादुन्नबी के आयोजनों का नेतृत्व करने वाली सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक संस्था ‘इस्लामिया लोकल एजेंसी’ है। शाही जामा मस्जिद के प्रांगण से निकलने वाले मुख्य और सबसे बड़े जुलूस की पूरी जिम्मेदारी इसी कमेटी के कंधों पर होती है।

​वर्तमान में, इस्लामिया लोकल एजेंसी के कमेटी मेंबर्स—विशेष रूप से हाजी बिलाल,—ने इस जुलूस को भव्य, शांतिपूर्ण और गरिमामयी बनाने के लिए व्यापक तैयारियां की हैं। इन वरिष्ठ सदस्यों के मार्गदर्शन में, हजारों की संख्या में अकीदतमंद जामा मस्जिद पर एकत्र होते हैं। जुलूस में शामिल लोग नाअत पढ़ते हुए, दरूद-ओ-सलाम का नज़राना पेश करते हुए और इस्लामी झंडे लहराते हुए शहर के निर्धारित रास्तों से गुज़रते हैं। हाजी बिलाल और उनकी पूरी टीम का मुख्य फोकस इस बात पर रहता है कि जुलूस में पूर्ण अनुशासन बना रहे और किसी भी प्रकार की अव्यवस्था न फैले।

हाजी मंजूर साहब की पहल: मेवातियान मस्जिद से बच्चों का जुलूस
​जहाँ एक तरफ शाही जामा मस्जिद का जुलूस अपनी विशालता के लिए जाना जाता है, वहीं आगरा में एक और अत्यंत मनमोहक और भावनात्मक जुलूस निकलता है, जो सीधे तौर पर हाजी मंजूर साहब की देखरेख में संपन्न होता है। यह विशेष जुलूस आगरा की मेवातियान मस्जिद मदरसे से निकाला जाता है।

​इस जुलूस की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यह है कि इसमें मुख्य रूप से छोटे-छोटे बच्चे शामिल होते हैं। नए, साफ-सुथरे और पारंपरिक परिधानों में सजे ये मासूम बच्चे हाथों में छोटे-छोटे इस्लामी झंडे लिए होते हैं। जब ये बच्चे अपनी मासूम और मीठी आवाज़ में पैगंबर साहब की शान में नाअत-ए-पाक गुनगुनाते हैं, तो पूरे इलाके का माहौल एक अलग ही रूहानी (आध्यात्मिक) और पवित्र रंग में रंग जाता है। पैगंबर मुहम्मद स्वयं बच्चों से बेहद स्नेह करते थे, और यह जुलूस उनके उसी वात्सल्यपूर्ण चरित्र की एक सुंदर याद दिलाता है।

दावते इस्लामी का अनुशासित जुलूस (हरे साफे वाले)
​आगरा के मिलादुन्नबी समारोहों का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और अनुशासित अंग ‘दावते इस्लामी’ द्वारा निकाला जाने वाला जुलूस है। दावते इस्लामी एक गैर-राजनीतिक इस्लामी संगठन है जो दुनिया भर में शांति और कुरान की शिक्षाओं का प्रसार करता है।

​आगरा में इस संगठन के जुलूस की विशिष्ट पहचान इसमें शामिल होने वाले अकीदतमंदों का पहनावा है। दावते इस्लामी से जुड़े हजारों लोग सफेद लिबास पहनकर और सिर पर ‘हरे रंग का साफा’ (Green Turbans) बांधकर इस जुलूस में शिरकत करते हैं। हरा रंग इस्लाम में शांति, समृद्धि और मदीना स्थित पैगंबर की मस्जिद (मस्जिद-ए-नबवी) के प्रसिद्ध हरे गुंबद (Gumbad-e-Khazra) का प्रतीक माना जाता है। “हरे साफे वालों” का यह जुलूस अपने उच्च स्तरीय अनुशासन, शांतिपूर्ण मार्च और कतारबद्ध तरीके से चलने के लिए पूरे शहर में सराहा जाता है। वे पूरे मार्ग में अत्यंत शिष्टता के साथ दरूद-ओ-सलाम का पाठ करते हैं।

योगी सरकार के कड़े निर्देश और पुलिस प्रशासन की चौकसी
​त्योहारों के दौरान लाखों की भीड़ का सड़कों पर उतरना कानून व्यवस्था, यातायात प्रबंधन और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए एक बड़ी चुनौती होता है। इस चुनौती को अवसर में बदलने और पर्व को पूरी तरह से शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशालय (DGP मुख्यालय) ने अत्यंत सख्त, लेकिन स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। आगरा पुलिस ने इन निर्देशों को धरातल पर उतारने के लिए “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाई है। व्यवस्था में कोई रुकावट न पड़े, इसके लिए पुलिस पूर्ण रूप से हाई-अलर्ट पर है।

नई परंपराओं पर रोक: मंटोला थाना और कैथ वाली मस्जिद का प्रकरण
​योगी सरकार की त्योहारों और धार्मिक जुलूसों को लेकर सबसे सुस्पष्ट और कड़ी नीति यह है कि किसी भी स्थिति में ‘कोई नई परंपरा’ (No New Tradition) शुरू करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि केवल वे ही जुलूस और मार्ग (रूट) अनुमन्य होंगे जो पारंपरिक रूप से दशकों से चले आ रहे हैं और जिनका उल्लेख पुलिस के ‘त्योहार रजिस्टर’ में दर्ज है।

​आगरा में इस नीति का कड़ाई से अनुपालन थाना मंटोला क्षेत्र में देखने को मिला। विगत कुछ दिनों से मंटोला थाना अंतर्गत स्थित कैथ वाली मस्जिद से एक ‘नए जुलूस’ के निकाले जाने की चर्चाएं इलाके में आम हो गई थीं। इस नई पहल को लेकर जनता के बीच विभिन्न प्रकार की सुगबुगाहट थी। हालांकि, स्थिति को भांपते हुए इलाका पुलिस ने तत्काल हस्तक्षेप किया और आयोजकों के साथ-साथ आम जनता के लिए भी स्थिति को पूरी तरह से साफ कर दिया।

​मंटोला पुलिस ने स्पष्ट रूप से हिदायत दी है कि कोई भी नई परंपरा शुरू करने के लिए शासन-प्रशासन से लिखित परमिशन (Written Permission) प्राप्त करना अनिवार्य है। पुलिस ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अभी तक इस नए जुलूस को निकालने की कोई लिखित अनुमति प्राप्त नहीं हुई है। यदि प्रशासन द्वारा इसकी विधिवत इजाज़त दे दी जाती है, तो ही यहाँ से जुलूस शुरू होगा; अन्यथा, बिना परमिशन के किसी भी सूरत में कोई नया जुलूस नहीं निकलने दिया जाएगा। मंटोला पुलिस की हर एक गतिविधि और हर एक चीज़ पर पैनी नज़र है, और किसी भी प्रकार की अराजकता नहीं फैलने दी जाएगी।

हथियारों के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध
​जुलूसों में अखाड़ों द्वारा शक्ति प्रदर्शन या हथियारों के प्रदर्शन को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस प्रशासन ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। आगरा पुलिस ने स्पष्ट कर दिया है कि जुलूस-ए-मोहम्मदी में तलवार, भाले, लाठी या किसी भी प्रकार का हथियार लाना पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
​पूर्व के वर्षों में कुछ स्थानों पर युवाओं द्वारा करतब दिखाने के नाम पर धारदार हथियारों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता था, परंतु जन-सुरक्षा के दृष्टिकोण से वर्तमान कानून व्यवस्था के तहत इसे एक बड़ा खतरा माना गया है। यदि जुलूस में कोई भी व्यक्ति खुले हथियारों के साथ पाया जाता है, तो उसके खिलाफ त्वरित और सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इस कदम का उद्देश्य जुलूस के मूल आध्यात्मिक संदेश को बनाए रखना और भयमुक्त वातावरण का निर्माण करना है।

हाई-टेक निगरानी, फ्लैग मार्च और पुलिस तैनाती
​सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बनाने के लिए आगरा पुलिस पारंपरिक गश्त के साथ-साथ अत्याधुनिक तकनीक का व्यापक उपयोग कर रही है। शहर को सुरक्षा की दृष्टि से विभिन्न जोन और सेक्टरों में विभाजित किया गया है, जहाँ सिविल पुलिस के अलाबा लोकल इंटेलिजेंट व अतरिक्त फोर्स की टुकड़ियां तैनात की गई हैं।

जुलूस के सभी पारंपरिक मार्गों की ड्रोन कैमरों के माध्यम से आसमान से सघन निगरानी की जा रही है। ऊंची इमारतों और छतों पर असामाजिक तत्वों द्वारा किसी भी प्रकार की संदिग्ध सामग्री जमा करने से रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है।

पुलिस का साइबर सेल फेसबुक, एक्स (ट्विटर), और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स पर 24×7 नज़र रखे हुए है। अफवाहें फैलाने वालों या भड़काऊ पोस्ट डालने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई (FIR) के निर्देश हैं।

मंटोला, नाई की मंडी, ताजगंज, ढोलीखार और जामा मस्जिद जैसे संवेदनशील इलाकों में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा लगातार फ्लैग मार्च किया जा रहा है। यह जनता में सुरक्षा का भाव और असामाजिक तत्वों में पुलिस का खौफ पैदा करने के लिए है।

शांति समितियों की भूमिका: प्रशासन और अवाम का सेतु

आगरा प्रशासन यह भली-भांति जानता है कि केवल पुलिस के डंडे से स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती; इसके लिए समाज के सभी वर्गों का विश्वास और सहयोग अनिवार्य है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए, आगरा के सभी थानों (विशेषकर मंटोला, नाई की मंडी आदि) में ‘शांति समिति’ (Peace Committee) की बैठकों का दौर चला है।

​इन बैठकों में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मुस्लिम समाज के प्रमुख उलेमा, इस्लामिया लोकल एजेंसी के सदस्य, हिंदू समाज के गणमान्य नागरिक और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि एक मंच पर आते हैं।

​शांति समितियों की बैठकों में अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर योजना बनाई जाती है, जैसे: जुलूस किस समय शुरू होगा, उसकी गति क्या होगी, वह किन रास्तों से होकर गुज़रेगा और एम्बुलेंस जैसी आपातकालीन सेवाओं के लिए रास्ता कैसे छोड़ा जाएगा। इन बैठकों में मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा स्वयं युवाओं से यह मार्मिक अपील की जाती है कि वे अपने जज़्बातों पर काबू रखें, यातायात नियमों का कड़ाई से पालन करें, और जुलूस के दौरान ऐसा कोई भी कृत्य न करें जिससे दूसरे धर्म के लोगों को असुविधा हो या शहर का माहौल खराब हो।

​प्रशासन ने शांति समिति के सदस्यों के माध्यम से आम जनता तक यह संदेश भी पहुँचाया है कि अफवाहों पर बिल्कुल ध्यान न दें। यदि सोशल मीडिया पर या व्यक्तिगत रूप से कोई भ्रामक सूचना प्राप्त होती है, तो उसे आगे (Forward) करने के बजाय तुरंत स्थानीय पुलिस को सूचित करें।

​आगरा में ईद मिलादुन्नबी का आयोजन केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है; यह इस शहर की ऐतिहासिक भव्यता, अटूट धार्मिक आस्था और एक अत्यंत परिपक्व प्रशासनिक तंत्र का संगम है। एक ओर जहाँ इस्लामिया लोकल एजेंसी के हाजी बिलाल, हाजी अबरार और हाजी मंजूर जैसे समर्पित वरिष्ठ लोग शाही जामा मस्जिद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से निकलने वाले जुलूसो को गरिमा और भव्यता प्रदान कर रहे हैं, वहीं दावते इस्लामी के ‘हरे साफे’ वाले अकीदतमंद अपने उच्च अनुशासन से शांति का संदेश दे रहे हैं। इसी कड़ी में, मेवातियान मस्जिद से छोटे बच्चों का जुलूस इस पूरे पर्व में मासूमियत, वात्सल्य और विशुद्ध रूहानियत का रंग भर देता है, जो पैगंबर मुहम्मद के उस संदेश को साकार करता है जहाँ वे बच्चों से अथाह प्रेम करते थे।

​इन धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं के समानांतर, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के दिशा-निर्देशों को धरातल पर उतारने में आगरा पुलिस की मुस्तैदी अत्यंत सराहनीय है। मंटोला क्षेत्र की कैथ वाली मस्जिद में बिना अनुमति नई परंपरा शुरू न होने देने का त्वरित और स्पष्ट निर्णय, हथियारों (तलवार, भाले) के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध, और ड्रोन से लेकर शांति समितियों तक का प्रभावी उपयोग यह दर्शाता है कि कानून का राज (Rule of Law) सर्वोपरि है।

​अंततः, आगरा में ईद मिलादुन्नबी का यह पर्व यह सिद्ध करता है कि जब गहरी आस्था और कड़ा प्रशासनिक अनुशासन एक साथ मिलते हैं, तो वह समाज में भय नहीं, बल्कि सुरक्षा और सौहार्द का एक नया अध्याय लिखता है। आगरा की वह प्राचीन ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’, जिसे सूफी संतों ने सींचा था, आज भी यहाँ की हवाओं में महक रही है। यह सकारात्मकता, यह शांति और यह भाईचारा ही सच्चे अर्थों में पैगंबर मुहम्मद को दी जाने वाली सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।

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