Sport : Explainer: टेस्ट क्रिकेट में जब रन बनाना था गुनाह! जानें वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के युग में क्यों असंभव है 1955 का वो रिकॉर्ड तोड़ना? #INA

आज का टेस्ट क्रिकेट पूरी तरह बदल गया है. आधुनिक क्रिकेट में अब टीमें टेस्ट मैच भी सिर्फ जीतने के लिए खेल रही हैं, क्योंकि वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के लिहाज से हर मैच जीतने पर अंक मिलते हैं, जिससे टीमों को ICC की मुख्य टूर्नामेंट यानी WTC फाइनल खेलने का मौका मिलता है. आज का क्रिकेट टी20 के आने से भले ही बदल गया हो, लेकिन कहते हैं ना कि क्रिकेट को अक्सर अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है, जहां खेल का रुख पलक झपकते ही बदल जाता है. आधुनिक युग में टी20 और टी10 के आने से फैंस को हर गेंद पर बाउंड्री देखने की आदत हो गई है. आज के समय में जब टीमें वनडे में 50 ओवरों में 400 से अधिक रन बना रही हैं, तब एक ऐसी बल्लेबाजी की कल्पना करना भी असंभव सा लगता है जहां पूरे दिन खेलने के बाद भी स्कोरबोर्ड पर 100 रन भी न टंगें.
टेस्ट क्रिकेट का इतिहास ऐसी ही कुछ अविश्वसनीय और मैराथन पारियों से भरा पड़ा है, जहां बल्लेबाजों का मकसद रन बनाना नहीं, बल्कि क्रीज पर चट्टान की तरह डटकर मैच को बचाना था. साल 1955 में न्यूजीलैंड द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ बनाया गया सबसे धीमी स्कोरिंग दर का रिकॉर्ड आज भी एक ऐसा कीर्तिमान है, जिसे तोड़ना किसी भी टीम के लिए लगभग नामुमकिन है. आइए इस आर्टिकल में समझते हैं कि क्रिकेट इतिहास की ये सबसे रक्षात्मक पारियां कैसे खेली गईं और क्यों आज के दौर में ऐसा दोबारा होना असंभव माना जाता है.
1955 का न्यूजीलैंड बनाम पाकिस्तान वो ऐतिहासिक मुकाबला
टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में सबसे कम रन रेट से बल्लेबाजी करने का रिकॉर्ड न्यूजीलैंड के नाम दर्ज है. साल 1955 में लाहौर में पाकिस्तान के खिलाफ खेले गए एक टेस्ट मैच में न्यूजीलैंड ने बेहद हैरान करने वाली बल्लेबाजी की थी. इस मैच में न्यूजीलैंड की टीम ने 90 ओवरों की बल्लेबाजी की और 6 विकेट गंवाकर सिर्फ 69 रन बनाए. इस पारी के दौरान न्यूजीलैंड का रन रेट मात्र 0.67 रन प्रति ओवर था. रिकॉर्ड बुक के नियमों के अनुसार, स्कोरिंग दर के आधिकारिक रिकॉर्ड के लिए किसी भी टीम का कम से कम 50 ओवर बल्लेबाजी करना अनिवार्य है. न्यूजीलैंड ने पांचवें दिन के अधिकांश समय तक बल्लेबाजी करते हुए पिच पर अपना खूंटा गाड़ दिया और मात्र 69 रन बनाकर एक शानदार टेस्ट मैच ड्रॉ कराने में सफलता हासिल की. यह पारी इस बात का सटीक उदाहरण है कि कभी-कभी टेस्ट क्रिकेट में रन बनाने से ज्यादा विकेट की कीमत होती है.
आधुनिक क्रिकेट में इस रिकॉर्ड का टूटना क्यों है असंभव?
अगर हम आज की परिस्थितियों में इस रिकॉर्ड के टूटने की संभावना का आकलन करें, तो यह सिर्फ 0.05% से भी कम है. यानी यह रिकॉर्ड टूटना लगभग नामुमकिन है. मान लीजिए कि एक टीम को मैच बचाने या जीतने के लिए 50 ओवरों में 300 रनों की जरूरत है. लेकिन उनके पास लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पर्याप्त बल्लेबाज नहीं बचे हैं या पिच पूरी तरह से गेंदबाजों की मददगार बन चुकी है. ऐसे में अगर टीम मैच बचाने के मजबूत इरादे के साथ उतरती है और अपने बेस्ट डिफेंसिव स्किल का प्रदर्शन करते हुए 50 ओवरों में सिर्फ 30 रन बनाती है, तो यह आधुनिक क्रिकेट में होना असंभव लगता है. 90 ओवरों की बल्लेबाजी में किसी भी टीम का महज 65 या 69 रनों पर टिके रहना और ऑलआउट न होना आज के दौर में एक चमत्कार जैसा है.
भारत बनाम साउथ अफ्रीका दिल्ली टेस्ट
न्यूजीलैंड के उस ऐतिहासिक रिकॉर्ड के साथ हमें साल 2015 का दिल्ली टेस्ट भी याद रखना होगा. इस मैच में साउथ अफ्रीका के बल्लेबाजों ने भारत के खिलाफ फिरोजशाह कोटला मैदान पर रक्षात्मक बल्लेबाजी की एक नई मिसाल पेश की थी. टर्निंग पिच पर रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जडेजा जैसे खतरनाक स्पिनरों का सामना करना दुनिया के किसी भी बल्लेबाज के लिए सबसे मुश्किल चुनौती थी. जीत के लिए 481 रनों के असंभव लक्ष्य का पीछा करने उतरी साउथ अफ्रीका का मकसद मैच जीतना नहीं, बल्कि पांचवें दिन का खेल खत्म होने तक विकेट बचाकर मैच को ड्रॉ कराना था. इस नामुमकिन काम के लिए अफ्रीकी दिग्गज बल्लेबाजों ने अपने आक्रामक अंदाज को पूरी तरह छोड़ दिया. उन्होंने भारतीय गेंदबाजों के सामने 143.1 ओवर बल्लेबाजी की और महज 143 रन बनाए. इस ऐतिहासिक संघर्ष का रन रेट ठीक 1.00 रन प्रति ओवर था. हालांकि, दक्षिण अफ्रीका यह मैच अंत में हार गया, लेकिन क्रीज पर चट्टान की तरह डटने की उनकी इस इच्छाशक्ति को पूरे क्रिकेट जगत ने सलाम किया.
न्यूजीलैंड का यह रिकॉर्ड ना टूटने के पीछे कई बड़े कारण
पिच और आउटफील्ड की स्थिति: आधुनिक समय में आउटफील्ड बेहद तेज होते हैं. अगर गेंद बल्ले का अंदरूनी या बाहरी किनारा लेकर भी निकल जाए, तो वह आसानी से बाउंड्री पार कर जाती है. ऐसे में चाहकर भी रन रेट को 1 से नीचे रखना नामुमकिन हो जाता है.
गेंदबाजी के नियम और ओवर गति: आज के दौर में अंपायर नकारात्मक लाइन यानी विपरीत दिशा में लगातार वाइड फेंकना पर सख्त रुख अपनाते हैं. साथ ही, फील्डिंग प्रतिबंध और आक्रामक कप्तानी बल्लेबाजों को लगातार डिफेंस करने पर मजबूर नहीं होने देती.
मानसिकता में बदलाव: आज टेस्ट क्रिकेट में कोई भी बल्लेबाज 90 ओवरों में सिर्फ डिफेंस करने की मानसिकता के साथ नहीं खेल सकता. डॉट गेंदें खेलने का दबाव आखिरकार बल्लेबाजों को बड़ा शॉट खेलने या गलती करने पर मजबूर कर देता है.
क्यों खास है रक्षात्मक बल्लेबाजी का यह हुनर?
क्रिकेट भले ही रनों का खेल माना जाता है, लेकिन टेस्ट क्रिकेट की असली जान विपरीत परिस्थितियों में टिके रहने की कला में है. न्यूजीलैंड का 1955 का प्रदर्शन हो या 2015 में दिल्ली टेस्ट में दक्षिण अफ्रीका का गजब का जुझारूपन, खेल के इतिहास में ये दोनों ही मिसालें सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं. ये पारियां बताती हैं कि जब बेहतरीन तकनीक के साथ गजब का मानसिक हौसला मिल जाए, तो क्रिकेट के मैदान पर कुछ भी मुमकिन है. आज के दौर में जहां खेल बहुत तेज हो चुका है, ये ऐतिहासिक मैच हमें याद दिलाते हैं कि कभी-कभी रन न बनाकर सिर्फ विकेट बचाए रखना भी खेल का सबसे कठिन और खूबसूरत हिस्सा होता है.
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