यूपी – रावण की तेरहवीं: ब्राह्मणों ने ब्रह्मभोज में चखा रसगुल्ला-रायता का स्वाद, दक्षिणा और परोसा भी लिया – INA

दशहरा पर रावण वध (दहन) होने के बाद भी चंडौस के वाशिंदे रावण को सम्मान देने की परंपरा को 87 साल से पूरी शिद्दत के साथ निभाते चले आ रहे हैं। इसी के तहत सोमवार को रामलीला के मंच पर हवन कर रावण की तेरहवीं (त्रयोदशी संस्कार) करते हुए 13 ब्राह्मणों को ब्रह्मभोज कराया गया। उन्हें दान-दक्षिणा और परोसा भी भेंट किया गया।

रावण की तेरहवीं पर हवन

चंडौस कस्बे में वर्ष 1939 में पं. गवेंद्र प्रसाद शास्त्री, श्योप्रसाद गुप्ता और लाला देवीलाल ने रामलीला की शुरुआत की थी। यहां के रामलीला की अनूठी बात ये है कि रावण के वध के बाद उसके अंतिम संस्कार की क्रियाओं को भी विधि-विधान से पूरा किया जाता है। प्रत्येक वर्ष रावण दहन के 12 दिन बाद ब्राह्मण समाज के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए त्रयोदशी संस्कार किया जाता है। 

सोमवार को भी ऐसा ही हुआ। रामलीला मंच पर लंकाधिपति की आत्मा की शांति के लिए वैदिक रीति के अनुसार पूरा हवन-पूजन किया गया। इसके बाद 13 ब्राह्मणों को भोज कराते हुए पैर छूकर उन्हें दक्षिणा-परोसा भेंटकर सम्मान के साथ विदाई दी गई। 87 वर्ष में कई बार रामलीला की कमेटी बदली। नए पदाधिकारी आए। इसके बावजूद इस परंपरा को बरकरार रखा गया है।


मैं कई वर्ष से चंडौस रामलीला में रावण का किरदार निभाता आ रहा हूं। हमारी रामलीला में शुरू से ही रावण का त्रयोदशी संस्कार मनाने की परंपरा है। हम इसे पूरे सम्मान के साथ निभाते हैं। -हेमंत शर्मा (रावण का किरदार निभाने वाले कलाकार)।


दशकों से कस्बे में दशहरा के बाद रावण का त्रयोदशी संस्कार और ब्रह्मभोज होता आ रहा है। रामलीला कमेटी की परंपरा के तहत सोमवार को इसका विधि-विधान के साथ आयोजन किया गया है। -सोनू शर्मा, अध्यक्ष, रामलीला आयोजन कमेटी।


बीते 87 वर्ष से कस्बे में रामलीला हो रही है। हमारे पूर्वज भी रावण का त्रयोदशी संस्कार एवं ब्रह्मभोज कराते थे। हमारी ये परंपरा हमें दूसरों से अलग बनाती है। ये मृतक का सम्मान भी है। -सचिन शर्मा, प्रबंधक, रामलीला आयोजन कमेटी ।


Credit By Amar Ujala

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