UP News: धीरेंद्र शास्त्री की कथाओं पर सपा को ध्रुवीकरण का डर, बीजेपी के सामने भी चुनौती – INA

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले धार्मिक आयोजनों को लेकर सियासत तेज हो गई है. बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथाओं को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मोर्चा खोल दिया है. अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में प्रस्तावित धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रमों को अनुमति नहीं देने की मांग की है. उनकी आपत्ति भगवान श्रीकृष्ण को लेकर धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी पर है.
हालांकि, धीरेंद्र शास्त्री इस बयान पर माफी मांग चुके हैं, लेकिन अखिलेश यादव ने उनकी माफी को स्वीकार नहीं किया है. इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल यह है कि धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर सबसे ज्यादा सियासत उत्तर प्रदेश में क्यों हो रही है? धीरेंद्र शास्त्री की कथाओं के आयोजनों में बीजेपी विधायकों और राजनीतिक चेहरों की भूमिका क्या है? समाजवादी पार्टी को इन आयोजनों से किस तरह के राजनीतिक ध्रुवीकरण की आशंका है और बीजेपी के सामने क्या चुनौती है?
अखिलेश यादव ने कार्यक्रमों पर उठाए सवाल
सपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश सरकार और प्रशासन से अपील की है कि धीरेंद्र शास्त्री के प्रस्तावित सार्वजनिक आयोजनों को अनुमति न दी जाए. उन्होंने अंबेडकरनगर, प्रतापगढ़ के कुंडा, गोंडा, झांसी, लखनऊ और आगरा में होने वाले कार्यक्रमों का उल्लेख किया है. अखिलेश यादव ने इससे पहले सोशल मीडिया पर लिखा था कि धीरेंद्र शास्त्री ने यदुवंशियों और रघुवंशियों, दोनों की भावनाओं को आहत किया है.
अखिलेश यादव ने कहा कि अब न उन्हें ब्रज में प्रवेश मिलेगा और न अवध में. अखिलेश ने उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश सीमा पर ऐसा बोर्ड लगाने की बात भी कही, जिस पर लिखा हो कि ईशनिंदा करने वालों का उत्तर प्रदेश की धार्मिक भूमि पर प्रवेश वर्जित है. इसके बाद अखिलेश ने धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रमों को अनुमति नहीं देने की मांग की. उनका विरोध सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने पूरे प्रदेश में प्रस्तावित कथाओं को रद्द करने और नई अनुमति नहीं देने की बात कही है.
श्रीकृष्ण पर टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद
पूरा विवाद मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करेरा में आयोजित रामकथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी से शुरू हुआ. एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप की तुलना करते हुए दिखाई दिए. उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंग मुद्रा, बांसुरी और भगवान राम के सीधे खड़े होने के स्वरूप का जिक्र किया. इस टिप्पणी पर मथुरा-वृंदावन के संतों और कृष्ण भक्तों की ओर से आपत्ति जताई गई.
विवाद बढ़ने के बाद धीरेंद्र शास्त्री ने वीडियो संदेश जारी कर सफाई दी. उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य भगवान राम और श्रीकृष्ण में कोई अंतर करना या किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनकी बातों से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो वह क्षमा मांगते हैं, लेकिन अखिलेश यादव ने उनकी माफी को पर्याप्त नहीं माना. सपा प्रमुख ने इसे ईशनिंदा बताते हुए ऐसे लोगों के कार्यक्रम रद्द करने और उन्हें नई अनुमति नहीं देने की मांग की.
यूपी में कहां-कहां होने वाली हैं धीरेंद्र शास्त्री की कथाएं?
धीरेंद्र शास्त्री के अगले कुछ कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में प्रस्तावित हैं. इनमें कई आयोजन स्थानीय राजनीतिक नेताओं और जनप्रतिनिधियों से जुड़े हैं. यही वजह है कि इन कथाओं को लेकर सियासी बहस भी तेज हो गई है.
- प्रतापगढ़ (कुंडा): 17 से 19 नवंबर 2026 तक तीन दिवसीय श्री हनुमंत कथा का आयोजन प्रस्तावित है. इसका आयोजन जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के अध्यक्ष और कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की ओर से कराया जा रहा है.
- गोंडा: 4 से 6 दिसंबर 2026 तक कथा का कार्यक्रम प्रस्तावित है. इस आयोजन को कटरा विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक बावन सिंह से जोड़ा जा रहा है.
- झांसी: 11 से 13 दिसंबर 2026 तक धीरेंद्र शास्त्री की हनुमंत कथा प्रस्तावित है. झांसी के बीजेपी विधायक रवि शर्मा ने आयोजन की जानकारी दी थी. इससे पहले 4 से 10 दिसंबर तक शहर में पंडित प्रदीप मिश्रा की शिव महापुराण कथा भी प्रस्तावित है.
- लखनऊ: 17 से 21 दिसंबर 2026 तक कथा का कार्यक्रम प्रस्तावित है.
- आगरा: 23 से 25 दिसंबर 2026 तक कथा का कार्यक्रम प्रस्तावित है.
इन कार्यक्रमों के अलावा जौनपुर में पूर्व सांसद धनंजय सिंह की ओर से जया किशोरी की कथा और महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री तथा बीजेपी नेता कृपाशंकर सिंह की ओर से कुमार विश्वास का कार्यक्रम कराने की चर्चाएं भी हैं.
सपा को किस बात का डर?
धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रमों को लेकर अखिलेश यादव की आपत्ति के पीछे सिर्फ कथित विवादित टिप्पणी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति भी एक अहम पहलू है. सपा की राजनीति में पिछड़ा वर्ग, खासकर यादव समुदाय महत्वपूर्ण आधार रहा है. भगवान श्रीकृष्ण को यादव समाज अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जोड़ता है. ऐसे में श्रीकृष्ण को लेकर की गई टिप्पणी पर अखिलेश यादव का खुलकर विरोध करना राजनीतिक रूप से भी अहम है.
दूसरी तरफ, सपा की कोशिश रही है कि 2027 का विधानसभा चुनाव जातीय समीकरणों, सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों और पीडीए जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द रहे. पार्टी के लिए चुनौती यह है कि चुनावी बहस धार्मिक पहचान और ध्रुवीकरण के मुद्दों की ओर न खिसक जाए. सपा को आशंका है कि धार्मिक कथाओं और बड़े आयोजनों के जरिए चुनाव से पहले ऐसा माहौल बन सकता है, जिसमें जाति और सामाजिक न्याय से जुड़े सवाल पीछे छूट जाएं. अखिलेश यादव ने अपने बयानों में भी धार्मिक भावनाओं और सामाजिक सौहार्द का मुद्दा उठाया है.
बीजेपी के सामने क्या चुनौती?
धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रमों को लेकर बीजेपी के सामने भी राजनीतिक चुनौती है. उत्तर प्रदेश में कई प्रस्तावित कथाओं के आयोजन स्थानीय बीजेपी विधायकों या नेताओं से जुड़े बताए जा रहे हैं. ऐसे में पार्टी के सामने सवाल है कि धार्मिक आयोजनों को लेकर उसका रुख क्या होगा और यदि किसी कार्यक्रम में फिर कोई विवादित टिप्पणी होती है तो उसका राजनीतिक असर कैसे संभाला जाएगा.
धार्मिक आयोजनों में बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं. इन आयोजनों में स्थानीय नेताओं की मौजूदगी और आयोजन से जुड़ाव भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनता है. यदि मंच से कोई ऐसा बयान आता है, जिस पर नया विवाद खड़ा हो जाए, तो विपक्ष को सरकार और बीजेपी पर सवाल उठाने का मौका मिल सकता है. दूसरी ओर, बीजेपी के लिए यह भी जरूरी है कि वह अखिलेश यादव के आरोपों का जवाब दे और धार्मिक मुद्दों पर अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट रखे.
इस विवाद पर बीजेपी की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई है. बीजेपी प्रवक्ता हीरो वाजपेयी ने अखिलेश यादव पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव नजदीक आने पर उन्हें भगवान श्रीकृष्ण याद आ रहे हैं. उन्होंने अखिलेश से पूछा कि वह कृष्ण जन्मभूमि आंदोलन पर अपना रुख स्पष्ट करें… यानी बीजेपी इस विवाद को केवल धीरेंद्र शास्त्री के बयान तक सीमित रखने के बजाय अखिलेश यादव की धार्मिक और राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठाने के रूप में भी देख रही है.
धीरेंद्र शास्त्री की कथाओं पर सपा को ध्रुवीकरण का डर, बीजेपी के सामने भी चुनौती
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