Sport : Explainer: क्यों रुकी बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधु-लक्ष्य सेन की फंडिंग? बिना सरकारी मदद यूरोप गए और बने चैंपियन, जानें पूरा विवाद #INA

भारतीय बैडमिंटन में इस समय एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. दो बार की ओलंपिक मेडल विजेता पीवी सिंधु और स्टार खिलाड़ी लक्ष्य सेन की सरकारी फंडिंग रुकने की खबर से खेल जगत हैरान है. सोशल मीडिया पर इसे लेकर कई तरह की अफवाहें उड़ रही हैं, लेकिन इसकी असली वजह खेल प्रशासन की लापरवाही और कागजी कार्रवाई में हुई देरी है. बता दें कि पीवी सिंधु और लक्ष्य सेन को बिना फंडिंग के ही यूरोप में खेलने जाना पड़ा. हालांकि, इसके बावजूद इन दोनों खिलाड़ियों ने अपने पैसे से यात्रा की और चैंपियन बनकर देश का मान बढ़ाया. तो चलिए, इस आर्टिकल में जानते हैं कि आखिर फंडिंग रुकने का यह पूरा मामला क्या है. 

क्या है पीवी सिंधु और लक्ष्य सेन का फंडिंग रुकने का पूरा मामला?

हाल ही में अक्टूबर-नवंबर में भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों के एक बड़े दल ने यूरोप के चार महत्वपूर्ण टूर्नामेंट्स के लिए फिनलैंड, डेनमार्क, फ्रांस और जर्मनी का दौरा किया था. टूर्नामेंट शुरू होने के ठीक पहले खिलाड़ियों को पता चला कि भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI – Sports Authority of India) ने इस पूरे दौरे के लिए फंड जारी करने से मना कर दिया है. इसके बाद पीवी सिंधु और लक्ष्य सेन जैसे सीनियर स्टार्स से लेकर देश के जूनियर खिलाड़ियों तक को हवाई टिकट, होटल में रुकने और खाने-पीने का सारा खर्च अपनी जेब से या अपने निजी स्पॉन्सर्स की मदद से उठाना पड़ा. 

सरकारी फंडिंग रुकने की क्या रही असली वजह?

सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों के उलट, सरकार ने खिलाड़ियों का पैसा किसी नाराजगी या बजट की कमी की वजह से नहीं रोका था. इसके पीछे की असली वजह पूरी तरह से सरकारी कागजी कार्रवाई में हुई देरी थी. खेल मंत्रालय के नियमों के मुताबिक, किसी भी विदेशी दौरे या टूर्नामेंट से कम से कम 30 दिन पहले भारतीय बैडमिंटन संघ को खिलाड़ियों के नामों की लिस्ट और पूरा प्रस्ताव भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के पास जमा करना होता है. लेकिन बैडमिंटन संघ समय पर अपने डॉक्यूमेंट जमा नहीं कर पाया. संघ का तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन महासंघ अंतिम लिस्ट ऐन वक्त पर जारी करता है, जिससे देरी हुई, लेकिन SAI ने सख्त रुख अपनाते हुए नियमों का हवाला देकर फंड पास करने से साफ मना कर दिया. 

इस पूरे विवाद के बीच खेल जगत में यह चर्चा भी जोरों पर थी कि हाल ही में हुए 2026 एशियन गेम्स में भारतीय बैडमिंटन टीम का प्रदर्शन काफी खराब रहा था, जिसके कारण खेल मंत्रालय ने यह कड़ा कदम उठाया है. हालांकि, इस बात को लेकर जब हंगामा बढ़ा तो SAI के अधिकारियों ने साफ किया कि फंड रोकने का खिलाड़ियों के प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं है. यह पूरी तरह से एक प्रशासनिक लापरवाही थी, जहां सिर्फ समय पर पेपर जमा न होने की वजह से फंड अटक गया था. 

बिना पैसों के यूरोप में खिलाड़ियों का संघर्ष

टूर्नामेंट के आखिरी वक्त पर फंडिंग रुकने की वजह से भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों को भारी मानसिक और आर्थिक तनाव का सामना करना पड़ा. पैसों की तंगी और खर्चों में कटौती के कारण कई खिलाड़ियों को अपने निजी कोच, फिजियो और ट्रेनर के बिना ही यूरोप जाना पड़ा. समस्या इतनी बड़ी थी कि मैचों के दौरान कोर्ट के कोने पर खिलाड़ियों को गाइड करने के लिए उनके साथी खिलाड़ी ही बैठे नजर आए. वहीं दूसरी ओर, जो जूनियर खिलाड़ी खुद का खर्च उठाने में असमर्थ थे, उन्हें मजबूरन डेनमार्क ओपन, फ्रेंच ओपन और हाइलो ओपन जैसे बड़े टूर्नामेंट्स से अपने नाम वापस लेने पड़े. 

पीवी सिंधु का सरकार को करारा जवाब 

इस विवाद के सामने आने के बाद, पीवी सिंधु ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट एक्स पर खेल व्यवस्था को लेकर एक बेहद गंभीर पोस्ट लिखी. उन्होंने सिस्टम पर तीखा सवाल उठाते हुए कहा, “जवाबदेही और अनुशासन बिल्कुल जरूरी हैं. लेकिन खिलाड़ियों को सपोर्ट करना सिस्टम को लूटना या बर्बाद करना नहीं है, बल्कि यह भारत के खेल के भविष्य में निवेश करना है.”

सिंधु ने खेल जगत के एक बड़े कड़वे सच को उजागर करते हुए बैडमिंटन और टेनिस के बीच प्राइज मनी के भारी अंतर को भी समझाया. उन्होंने बताया कि बैडमिंटन खिलाड़ियों को भी टेनिस खिलाड़ियों की तरह ही दुनिया भर में यात्रा करने, कोच रखने और फिजियो का भारी खर्च खुद उठाना पड़ता है. लेकिन दोनों खेलों की कमाई में जमीन-आसमान का अंतर है.

उन्होंने कहा कि टेनिस के विंबलडन टूर्नामेंट में अगर कोई खिलाड़ी पहले ही दौर में बाहर हो जाता है, तो उसे करीब 85 लाख रुपये मिलते हैं. जबकि इसका उल्टा, बैडमिंटन के सबसे बड़े टूर्नामेंट्स में से एक ‘चाइना ओपन’ को जीतने वाले को सिर्फ 1.1 करोड़ रुपये मिलते हैं, जबकि पहले दौर में हारने वाले को महज 1.6 लाख रुपये ही दिए जाते हैं.

सिंधु का कहना था कि वह और लक्ष्य सेन जैसे बड़े खिलाड़ी तो अपने स्पॉन्सर्स या अपनी जेब से खर्च चला सकते हैं, लेकिन देश के उन 18 साल के उभरते युवाओं का क्या होगा, जो अगला सिंधु या लक्ष्य बनने का सपना देख रहे हैं और जिनके पास कोई निजी स्पॉन्सर नहीं है? 

क्या खिलाड़ियों को मिलेगा वापस पैसा?

इस विवाद के बाद खेल मंत्रालय और SAI ने अपनी गलती सुधारने की बात तो कही है, लेकिन खिलाड़ियों के लिए एक बुरी खबर भी है. SAI ने साफ किया है कि आगामी टूर्नामेंट्स के लिए फंडिंग बहाल कर दी जाएगी, लेकिन पिछले चार हफ्तों में खिलाड़ियों ने जो लाखों रुपये अपनी जेब से खर्च किए हैं, उसकी भरपाई सरकार नहीं करेगी.

फैंस का मानना है कि अगर भारत को क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में भी दुनिया में तहलका मचाना है, तो खिलाड़ियों को मेडल जीतने पर सिर्फ तालियां और प्राइज देने के बजाय, कोर्ट पर उतरने से पहले प्रशासनिक स्तर पर पूरी और बिना रुकावट के मदद मिलना बेहद जरूरी है.

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