दिल्ली – लैंसेट की रिपोर्ट: भारत में 13.5 करोड़ धूम्रपान करने वाले, न्यूजीलैंड के मॉडल से मिल सकती है राहत – #INA

चिकित्सा क्षेत्र की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘लैंसेट’ द्वारा साल 2026 में जारी एक हालिया अध्ययन में भारत के लिए बेहद अहम जानकारियां सामने आई हैं। ‘लैंसेट रीजनल हेल्थ- वेस्टर्न पैसिफिक’ की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यूजीलैंड में निकोटीन के सुरक्षित विकल्पों (रैगुलेटेड वेपिंग) को कानूनी मंजूरी मिलने के बाद धूम्रपान की दर में पांच गुना तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। वहीं, भारत में 13.5 करोड़ धूम्रपान करने वालों के बीच इसे छोड़ने की दर आज भी 4 प्रतिशत तक नहीं पहुंच पा रही है।
अध्ययन के लिए ‘जॉइनपॉईंट रिग्रेशन एनालिसिस’ नामक स्टैटिस्टिकल विधि का उपयोग किया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सुरक्षित विकल्पों की उपलब्धता के बाद न्यूजीलैंड में धूम्रपान घटने की दर 3.5% प्रतिवर्ष से बढ़कर सीधे 17.9% प्रतिवर्ष हो गई। 20वीं सदी के मध्य में वहां लगभग 40 प्रतिशत पुरुष धूम्रपान करते थे, जो पारंपरिक नियंत्रण उपायों से 2016 तक घटकर 15% हुई और 2018 में सुरक्षित विकल्पों को मान्यता मिलने के बाद अब 7% से भी कम रह गई है।
विशेषज्ञों की राय: तंबाकू का जलना है बीमारी की मुख्य वजह
आकाश हेल्थकेयर (द्वारका, नई दिल्ली) के पल्मोनरी मेडिसीन विशेषज्ञ डॉ. सौरभ तोमर ने इस रिपोर्ट पर कहा, “विज्ञान यह प्रमाणित कर चुका है कि फेफड़ों का कैंसर, सीओपीडी और हृदय रोगों के लिए जिम्मेदार 7,000 से अधिक हानिकारक केमिकल तंबाकू के जलने से पैदा होते हैं, न कि निकोटीन से। न्यूजीलैंड में सादा पैकेजिंग और उत्पाद शुल्क बढ़ाने जैसे तमाम पारंपरिक उपायों के बाद भी मामूली सुधार था, लेकिन बड़ा बदलाव तब आया जब वयस्कों के लिए कम नुकसान वाले निकोटीन विकल्पों को मंजूरी दी गई।”
पैसिफिक वन हेल्थ हॉस्पिटल (नई दिल्ली) के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. सतीश कुमार ने बताया, “भले ही भारत और न्यूजीलैंड की स्वास्थ्य प्रणालियां अलग हों, लेकिन तंबाकू पर निर्भरता का विज्ञान एक ही है। भारत में तंबाकू सेवन से हर साल होने वाली 13.5 लाख मौतें नीतिगत बदलावों से रोकी जा सकती हैं। केवल मांग कम करने की नीतियां पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि कम नुकसान वाले विनियमित विकल्पों को अपनाकर ही तंबाकू मुक्ति की दर को तेज किया जा सकता है।”
भारत के लिए नीतिगत संतुलन की आवश्यकता
रिपोर्ट के अनुसार, न्यूजीलैंड ने कड़े नियम (जैसे 18 वर्ष की आयु सीमा, फ्लेवर पर रोक और निकोटीन की मात्रा तय करना) लागू कर युवाओं को सुरक्षित रखते हुए वयस्कों में धूम्रपान की दर को सफलतापूर्वक कम किया है।
लैंसेट के अध्ययन ने एक महत्वपूर्ण अंतर को रेखांकित किया है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है- तंबाकू के जलने से होने वाले नुकसान को कम करना और निकोटीन को पूरी तरह खत्म करना, ये दोनों अलग-अलग लक्ष्य हैं। भारत में वर्तमान में बिना सहायता के धूम्रपान छोड़ने की दर बेहद कम है और संसाधन भी सीमित हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि तंबाकू नियंत्रण के पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ न्यूजीलैंड के इस निष्पक्ष और प्रमाण-आधारित ढांचे को समझना भारत के लिए दीर्घकालिक रूप से जीवन रक्षक साबित हो सकता है।