Entertainment: Do Deewane Seher Mein Review: न शोर, न मसाला, फिर भी दिल जीत लेगी सिद्धार्थ-मृणाल की ‘दो दीवाने शहर में’, पढ़ें रिव्यू – #iNA

Do Deewane Seher Mein Review In Hindi: आजकल की फिल्मों का एक तय ढर्रा बन गया है, या तो कूट-कूट कर एक्शन होगा, या फिर इतनी चकाचौंध कि आंखें चौंधिया जाएं. लेकिन इसी भीड़ में चुपके से एक फिल्म आती है, जिसमें न कोई सुपरहीरो है, न कोई विलेन और न ही विदेश की बर्फीली वादियों में नाचते जोड़े. फिल्म का नाम है, ‘दो दीवाने शहर में’. पहली नजर में देखने पर ये फिल्म आपको एक साधारण रोमांटिक फिल्म लग सकती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, एहसास होता है कि ये फिल्म ‘परफेक्ट’ होने के बारे में नहीं, बल्कि हमारी ‘इम्पर्फेक्शन्स’ (कमियों) को गले लगाने के बारे में है. रवि उद्यावर ने एक ऐसी कहानी बुनी है, जो जितनी मासूम है, उतनी ही गहरी भी है.

कहानी

फिल्म की कहानी शशांक (सिद्धांत चतुर्वेदी) और रोशनी (मृणाल ठाकुर) के इर्द-गिर्द घूमती है. शशांक एक बड़ी मार्केटिंग फर्म में काम करता है, डैशिंग है, टैलेंटेड है, लेकिन उसके साथ एक छोटी सी समस्या है. उसे ‘श’ और ‘स’ बोलने में दिक्कत होती है. अब विडंबना देखिए, जिस लड़के के नाम में ही दो बार ‘श’ आता हो, उसे ही पब्लिक स्पीकिंग से डर लगता है. वो भीड़ से बचता है, ताकि कोई उसकी इस कमी का मजाक न उड़ा दे.

वहीं दूसरी ओर है रोशनी. वो एक लीडिंग मैगजीन में ग्राफिक डिजाइनर है. उसका काम ही है दुनिया को खूबसूरत बनाना, लेकिन खुद वो अपनी खूबसूरती को लेकर डरी रहती है. उसे लगता है कि उसकी नाक थोड़ी अजीब है, उसका रंग दबा हुआ है और वो अपनी बड़ी बहन नैना (संदीपा धर) जितनी सुंदर नहीं है. वो चश्मे के पीछे खुद को छिपाती है और फिल्टर वाली इस दुनिया में अपनी असली पहचान को लेकर असुरक्षित रहती है. अब इन दोनों की कहानी किस तरह से आगे बढ़ती है? ये जानने के लिए आपको ‘दो दीवाने शहर में’ थिएटर में जाकर देखनी होगी.

कैसी है फिल्म

अगर आप इस फिल्म में ‘जुम्मे की रात’ जैसा कोई धमाकेदार गाना या ‘सिंघम’ जैसा कोई भारी-भरकम डायलॉग ढूंढ रहे हैं, तो आप गलत दरवाजे पर आए हैं. ये फिल्म तो उस धीमी आंच पर बनी चाय जैसी है, जो धीरे-धीरे पकती है और अंत में सुकून देती है. लेकिन फिल्म की जो रफ्तार है, वो थोड़ी सुस्त लग सकती है. कई बार आपको लगेगा कि कहानी एक ही जगह गोल-गोल घूम रही है. फिल्म में इमोशनल गहराई (डेप्थ) की गुंजाइश थी, लेकिन स्क्रीनप्ले ने थोड़ा ‘सेफ’ खेलने की कोशिश की है. इंटरवल के बाद एक ट्विस्ट आता है जो थोड़ा खटकता है, मानो जबरदस्ती का ड्रामा पैदा करने की कोशिश की गई हो. लेकिन फिल्म की नीयत साफ है. आज के इंस्टाग्राम रील वाले जमाने में, जहां हर कोई ‘परफेक्ट’ दिखने की होड़ में है, ये फिल्म आईना दिखाते हुए कहती है कि भाई, तुम जैसे हो, वैसे ही कमाल हो!

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

रवि उद्यावर ने इससे पहले ‘मॉम’ जैसी इंटेंस फिल्म दी थी, यहां वो बिल्कुल अलग रंग में नजर आए हैं. उन्होंने दिल्ली/मुंबई की भीड़भाड़ के बीच इन दो किरदारों के एकांत को बहुत खूबसूरती से पकड़ा है. उदहारण के तौर पर बात की जाए तो फिल्म की शुरुआत एक मेट्रो सीन से होती है, जो बहुत ही जादुई है. कोई संवाद नहीं, बस कैमरे की नजर और इन दोनों का खामोश साथ. बिना एक शब्द कहे डायरेक्टर ने समझा दिया कि ये दोनों एक ही शहर में रहकर भी अपनी-अपनी अलग दुनिया और अकेलेपन में कैद हैं. फिल्म की सिनेमैटोग्राफी भी कमाल की है. रोशनी के घर का माहौल इतना असली लगता है कि आपको अपने पड़ोस की याद आ जाएगी.

एक्टिंग

सिद्धांत चतुर्वेदी की एक्टिंग की बात करें तो गली बॉय’ का एमसी शेर इस बार एक डरा हुआ, सहमा हुआ लेकिन प्यारा लड़का बना है. सिद्धांत ने शशांक के किरदार में जो मासूमियत डाली है, वह काबिले तारीफ है. हकलाहट वाले दृश्यों को उन्होंने मजाकिया नहीं, बल्कि दर्दनाक और इमोशनल बनाया है. मृणाल ठाकुर इस फिल्म की रूह हैं. एक लड़की जो भीतर से टूटी हुई है लेकिन बाहर से मजबूत दिखने का नाटक करती है, इस जज्बात को मृणाल ने अपनी आंखों से जिया है. बिना मेकअप और बड़े चश्मे के साथ भी वो इतनी ‘रिलेटेबल’ लगती हैं कि हर लड़की खुद को उनमें देख पाएगी.

नैना के रोल में संदीपा धार ने छोटी सी भूमिका में बड़ा असर छोड़ा है. इला अरुण और आयशा रजा जैसे सितारों ने घर के दृश्यों में जान फूंक दी है. खासकर इला अरुण की कॉमिक टाइमिंग, वो एक लाइन बोलती हैं और आप लोटपोट हो जाते हैं.

क्यों देखें?

अगर आप ‘हल्की-फुल्की’ लेकिन अच्छी फिल्में देखना पसंद करते हैं, तो ये फिल्म आपके लिए हैं. सिद्धार्थ और मृणाल की बेमिसाल केमिस्ट्री के लिए, आप इसे एक मौका दे सकते हैं. अगर आपको लगता है कि आप में कोई कमी है, तो ये फिल्म आपको खुद से प्यार करना सिखा देगी. लेकिन अगर आपको तेज रफ्तार वाली थ्रिलर या मसाला फिल्में पसंद हैं, अगर आपको ‘स्लो बर्निंग’ (धीमी) फिल्में देखकर नींद आती है, तो आप ये फिल्म स्किप कर सकते हैं. कहानी का दूसरा हिस्सा थोड़ा प्रेडिक्टेबल है, इसलिए कहानियों में नयापन ढूंढने वालों को निराशा हो सकती है.

कुलमिलाकर ‘दो दीवाने शहर में’ कोई क्रांतिकारी फिल्म नहीं है, लेकिन ये एक अच्छी फिल्म है. ये हमें बताती है कि प्यार का मतलब किसी परफेक्ट इंसान को ढूंढना नहीं है, बल्कि एक इम्पर्फेक्ट इंसान में परफेक्शन तलाशना है. ये फिल्म उन सभी लोगों के लिए है जो कभी न कभी आईने के सामने खड़े होकर खुद को बाकयों से कम समझते हैं.

Do Deewane Seher Mein Review: न शोर, न मसाला, फिर भी दिल जीत लेगी सिद्धार्थ-मृणाल की ‘दो दीवाने शहर में’, पढ़ें रिव्यू


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