यूपी – हाईकोर्ट : अनुमति नहीं ली तो पूरे समुदाय की ओर से प्रतिनिधि वाद नहीं माना जाएगा वाद, दूसरी अपील भी खारिज – INA

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महोबा की 18.14 एकड़ जमीन को मुस्लिम कब्रिस्तान बताए जाने से जुड़े करीब 45 साल पुराने विवाद में दाखिल दूसरी अपील खारिज कर दी। कहा कि आदेश एक नियम आठ सीपीसी के तहत अदालत की अनुमति के बिना दाखिल मुकदमा पूरी मुस्लिम बिरादरी की ओर से प्रतिनिधि वाद नहीं माना जा सकता। ऐसे वाद का प्रभाव केवल मुकदमे के पक्षकारों तक सीमित रहेगा।


यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने बाबूलाल बनाम शहाबुद्दीन व अन्य की दूसरी अपील पर दिया। विवाद वर्ष 1970 में दाखिल मूल वाद से जुड़ा था। वादियों का कहना था कि महोबा के फतेहपुर बजरिया स्थित 18.14 एकड़ जमीन करीब 300 वर्षों से मुस्लिम समुदाय के कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल होती रही है। दूसरी ओर बाबूलाल ने जमीन खरीदने और उस पर निर्माण का अधिकार होने का दावा किया था।

ट्रायल कोर्ट ने 26 अप्रैल 1978 को पूरी जमीन को कब्रिस्तान माना था। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों और मौके की जांच रिपोर्ट के आधार पर जमीन के लंबे समय से कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल होने का निष्कर्ष निकाला है। जांच रिपोर्ट को प्रभावी ढंग से चुनौती नहीं दी गई। इसलिए ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष में कोई अवैधता नहीं है। कोर्ट ने दूसरी अपील खारिज कर दी। 


Credit By Amar Ujala

यूपी – हाईकोर्ट : अनुमति नहीं ली तो पूरे समुदाय की ओर से प्रतिनिधि वाद नहीं माना जाएगा वाद, दूसरी अपील भी खारिज – INA

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महोबा की 18.14 एकड़ जमीन को मुस्लिम कब्रिस्तान बताए जाने से जुड़े करीब 45 साल पुराने विवाद में दाखिल दूसरी अपील खारिज कर दी। कहा कि आदेश एक नियम आठ सीपीसी के तहत अदालत की अनुमति के बिना दाखिल मुकदमा पूरी मुस्लिम बिरादरी की ओर से प्रतिनिधि वाद नहीं माना जा सकता। ऐसे वाद का प्रभाव केवल मुकदमे के पक्षकारों तक सीमित रहेगा।


यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने बाबूलाल बनाम शहाबुद्दीन व अन्य की दूसरी अपील पर दिया। विवाद वर्ष 1970 में दाखिल मूल वाद से जुड़ा था। वादियों का कहना था कि महोबा के फतेहपुर बजरिया स्थित 18.14 एकड़ जमीन करीब 300 वर्षों से मुस्लिम समुदाय के कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल होती रही है। दूसरी ओर बाबूलाल ने जमीन खरीदने और उस पर निर्माण का अधिकार होने का दावा किया था।

ट्रायल कोर्ट ने 26 अप्रैल 1978 को पूरी जमीन को कब्रिस्तान माना था। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों और मौके की जांच रिपोर्ट के आधार पर जमीन के लंबे समय से कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल होने का निष्कर्ष निकाला है। जांच रिपोर्ट को प्रभावी ढंग से चुनौती नहीं दी गई। इसलिए ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष में कोई अवैधता नहीं है। कोर्ट ने दूसरी अपील खारिज कर दी। 


Credit By Amar Ujala

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