डीएम की नाक के नीचे नियमों की अनदेखी? मुख्य सचिव से शिकायत के बाद गरमाया मामला

देहरादून। देहरादून जिला प्रशासन एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि जिलाधिकारी (डीएम) कार्यालय में नियमों की अनदेखी और संदिग्ध तैनातियों का खेल डीएम की नाक के नीचे चलता रहा, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पूरे मामले की शिकायत सीधे उत्तराखंड के मुख्य सचिव से की गई है, जिसके बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।

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जन अधिकार पार्टी–जनशक्ति की ओर से भेजे गए शिकायत पत्र में कहा गया है कि एक ऐसे कर्मचारी को पेशकार के रूप में कार्य कराया जा रहा है, जिनका पूर्व रिकॉर्ड विवादों से जुड़ा रहा है। शिकायत में उल्लेख है कि संबंधित व्यक्ति पूर्व में विजिलेंस कार्रवाई का सामना कर चुका है और कारावास भी भुगत चुका है, इसके बावजूद उसे देहरादून जैसे संवेदनशील जिले में अहम जिम्मेदारी दी गई। सवाल उठ रहा है कि क्या यह सब जिलाधिकारी की जानकारी के बिना संभव है?

इतना ही नहीं, एक सेवानिवृत्त अधिकारी से भी कथित रूप से कार्य लिए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त हो चुके अधिकारी को सेवा विस्तार की स्वीकृति नहीं मिली, फिर भी वे कार्यालय में सक्रिय हैं और सरकारी संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं। यदि यह सच है, तो यह सीधे-सीधे शासनादेशों की अनदेखी मानी जाएगी।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि “जीरो टॉलरेंस” की नीति का दावा करने वाली सरकार के सामने यह एक बड़ी परीक्षा है। डीएम कार्यालय में ही यदि नियमों को ताक पर रखकर फैसले लिए जा रहे हैं और महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं होती, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में उच्चस्तरीय और समयबद्ध जांच की मांग की गई है। साथ ही यह भी कहा गया है कि जांच पूरी होने तक संबंधित कर्मियों को संवेदनशील पदों से हटाया जाए।

अब सबकी नजरें शासन पर टिकी हैं। क्या मुख्य सचिव स्तर से सख्त कदम उठाए जाएंगे? क्या डीएम कार्यालय में हुई कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच होगी? या फिर मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा? आने वाले दिनों में इस पूरे प्रकरण की दिशा और दशा साफ हो सकेगी।

फिलहाल, प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यदि प्रतिक्रिया मिलती है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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