MP News: Maha Shivratri 2026: जबलपुर में स्थित है चौसठ योगिनी मंदिर, विवाह की मुद्रा में नंदी पर विराजमान भगवान शिव-मां पार्वती; जानें क्या है मान्यता – INA

मध्य प्रदेश की संस्कारधानी यानी जबलपुर शहर में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर आस्था और श्रद्धा से सराबोर हो उठती है. भगवान शिव की आराधना का यह महापर्व यहां विशेष महत्व रखता है, क्योंकि भेड़ाघाट स्थित 64 योगिनी मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की विवाह मुद्रा में प्रतिमा विराजमान है. आमतौर पर भगवान शिव की पूजा शिवलिंग के रूप में की जाती है. देश में 12 ज्योतिर्लिंगों सहित असंख्य शिवालय हैं, किंतु यहां शिव दूल्हे और माता पार्वती दुल्हन के रूप में नंदी पर साथ विराजमान दिखाई देते हैं. यही कारण है कि इस मंदिर की पहचान पूरे देश में अलग है.
महाशिवरात्रि के दिन तड़के से ही 64 योगिनी मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी हुई हैं. भक्त दुग्धाभिषेक, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक कर शिव-पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं. विवाह मुद्रा में स्थापित यह प्रतिमा मानो शिव बारात के दिव्य दृश्य का साक्षात रूप हो. मान्यता है कि हिमाचल से विवाह के पश्चात जब भगवान शिव माता पार्वती को लेकर लौट रहे थे, तब उनके साथ चौसठ योगिनियां भी आई थीं.
64 योगिनी मंदिर
क्योंकि उनके साथ पार्वती के पिता ने चौसठ योगिनियों को भी साथ में भेजा था. यह पूरा मंदिर उसी बारात का एक प्रतीक है. इसी विश्वास के कारण इस मंदिर को चौसठ योगिनी मंदिर कहा जाता है और इसे शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है. 64 योगिनी मंदिर… अपने ऐतिहासिक पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाना जाता है. इस मंदिर में सबसे खास यहां स्थापित भगवान शिव और पार्वती की अनोखी प्रतिमा है. ऐसा कहा जाता है कि पूरी दुनिया में एकमात्र यहां ऐसी प्रतिमा है, जिसमें भगवान शिव और पार्वती दूल्हा-दुल्हन के वैवाहिक रूप में दिखाई दे रहे हैं.
मंदिर में होती तंत्र साधना
प्रतिमा में नंदी के ऊपर भगवान शिव और पार्वती विराजमान है. माना जाता है यह प्रतिमा भगवान शिव की बारात का एक दृश्य है. ऐसी प्रतिमा पूरी दुनिया में और कहीं नहीं हैं. मंदिर के पुजारी बताते हैं कि आज भी गोरखनाथ मठ के साधु संत मंदिर में तंत्र साधना करने आते हैं. भेड़ाघाट का क्षेत्र स्वयं में प्राकृतिक और आध्यात्मिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है. नर्मदा तट पर स्थित संगमरमर की ऊंची-ऊंची चट्टानें और निकट बहता धुआंधार जलप्रपात इस स्थान की भव्यता को और बढ़ा देते हैं.
1200 साल पुरानी धरोहर
मंदिर की ऊंचाई से बहती नर्मदा का विहंगम दृश्य ऐसा प्रतीत होता है, मानो स्वयं प्रकृति भी इस दिव्य विवाह की साक्षी हो. श्रद्धालु मानते हैं कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है, विशेषकर दांपत्य सुख और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना के लिए लोग यहां विशेष प्रार्थना करते हैं. इतिहास के पन्नों में झांकें तो यह मंदिर 9वीं शताब्दी का माना जाता है. कलचुरी शासकों द्वारा निर्मित यह धरोहर लगभग 1200 वर्ष पुरानी है.
उस समय यह क्षेत्र त्रिपुरी के नाम से जाना जाता था और शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र था. मंदिर की गोलाकार संरचना और परिधि में बनी 64 कक्ष इसकी स्थापत्य कला की उत्कृष्टता को दर्शा रही हैं. लेकिन मुगल शासक ने इस मंदिर पर आक्रमण करके कई प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त कर दिया, लेकिन भगवान शिव की प्रतिमा आज भी सुरक्षित हैं. धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह स्थल तांत्रिक साधना का भी केंद्र रहा है.
तांत्रिकों का ‘विश्वविद्यालय’
प्राचीन काल में यहां तंत्र-मंत्र की शिक्षा दी जाती थी, इसलिए इसे तांत्रिकों का ‘विश्वविद्यालय’ भी कहा जाता है. मान्यता है कि देश-विदेश से साधक यहां आकर साधना करते थे. आज भी विशेष अवसरों पर साधु-संत यहां साधना के लिए पहुंचते हैं. मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा और शांत वातावरण साधना के लिए अनुकूल माना जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती इस क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे, तब उन्होंने एक ऊंची पहाड़ी पर विश्राम करने का निश्चय किया.
सुवर्ण ऋषि ने ली थी समाधि
यहां सुवर्ण नामक ऋषि तपस्या कर रहे थे, जो भगवान शिव के दर्शन पाकर अत्यंत प्रसन्न हो गए. उन्होंने भगवान शिव से विनती की कि जब तक वे नर्मदा का पूजन कर लौटें, तब तक शिव वहीं विराजमान रहें. जब ऋषि सुवर्ण नर्मदा पूजन कर रहे थे, तब उनके मन में यह विचार आया कि यदि भगवान शिव सदा के लिए इसी स्थान पर विराजमान हो जाएं, तो इस भूमि का कल्याण होगा. इसी कारण उन्होंने नर्मदा में समाधि ले ली.
कहा जाता है कि भगवान शिव ने भक्तों की सुविधा के लिए नर्मदा को अपना मार्ग बदलने का आदेश दिया, जिससे संगमरमर की कठोर चट्टानें भी मक्खन की तरह मुलायम हो गईं और नदी को नया मार्ग प्राप्त हो गया. चौसठ योगिनी मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है और अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए जाना जाता है. यह मंदिर पूरी तरह से बलुआ पत्थर और लाल पत्थरों से निर्मित है, जो हजारों वर्षों से मौसम की मार सहकर भी सुरक्षित खड़े हैं.
महाशिवरात्रि पर होती विशेष पूजा
मंदिर में दो प्रवेश द्वार हैं. एक नर्मदा नदी के तट से आता है, जो दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है, और दूसरा प्रवेश द्वार पंचवटी घाट से धुआंधार जलप्रपात की ओर जाने वाले मार्ग से जुड़ता है. महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में विशेष सजावट की जाती है. भजन-कीर्तन, रात्रि जागरण और आरती के साथ पूरा वातावरण ‘हर हर महादेव’ के जयघोष से गूंज उठता है. सावन माह में भी यहां विशेष पूजन-अर्चन का आयोजन होता है, जब हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
विवाह मुद्रा में शिव-पार्वती की प्रतिमा के समक्ष नवविवाहित दंपत्ति और विवाह योग्य युवक-युवतियां विशेष प्रार्थना करते हैं. इस प्रकार भेड़ाघाट स्थित चौसठ योगिनी मंदिर केवल एक प्राचीन धरोहर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और संस्कृति का जीवंत संगम है. शिव और पार्वती की नंदी पर विराजमान विवाह प्रतिमा इसे भारत की अद्वितीय पहचान प्रदान करती है. महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर यहां उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सदियों बाद भी इस मंदिर की आस्था और महिमा अक्षुण्ण बनी हुई है.
Maha Shivratri 2026: जबलपुर में स्थित है चौसठ योगिनी मंदिर, विवाह की मुद्रा में नंदी पर विराजमान भगवान शिव-मां पार्वती; जानें क्या है मान्यता
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