आधुनिक भारत की नई पुलिसिंग

सब इंस्पेक्टर/प्रशिक्षु इंस्पेक्टर पर कोबरा चीता लेपर्ड फेंटम और अनवरत पिकेट के नये प्रयोग।

पुलिस के इतिहास में यह दौर संभवत इसलिए याद किया जाएगा, क्यूँकि जहां आपने फिल्म दबंग सिंघम गंगाजल मर्दानी मूवी मे *दरोगा की भूमिका* देखी होगी। वही पुलिस कमिश्नरेटो जैसे बड़े मेट्रोपॉलिटन शहरों में दरोगा बड़ी संख्या में चीता और लेपर्ड बाइक पर ड्यूटी करते हुए आसानी से मिल जायेंगे ।

यह केवल ड्यूटी का एक विहंगम दृश्य नहीं है, बल्कि यह पूरी पुलिस व्यवस्था की संरचनात्मक चुनौतियों को स्पष्ट रूप से उजागर करने वाला संकेत भी है।

दरोगा का कार्य केवल गश्त तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनसे अपेक्षा की जाती है। कि वे अपराधों की विवेचना करें, कानून व्यवस्था बनाए रखें, जनसुनवाई करें, घटनास्थल पर *स्व विवेक* से त्वरित और उचित निर्णय लें तथा अपनी टीम का प्रभावी नेतृत्व करें।

लेकिन जब वही दरोगा लंबे समय तक सड़क पर फेंटम लेपर्ड और पीसीआर चलाते हुए दिखाई देता है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन मे उठता है।

कि आखिर उसके मूल दायित्वों का निर्वहन कौन कर रहा है?

यदि वह अपने मूल कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा है। तो क्या वह काम के बोझ तले दबा है। या फिर बेबी में फैंटम लेपर्ड ,चीता चलाने को मजबूर है।

क्या लगातार प्रतिदिन लेपर्ड चीता फैंटम कोबरा पिकेट ड्यूटी और विवेचन कार्य में कोई तारतम्य दिखाई पड़ता है।

यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। कि इनमें कुछ पुलिसकर्मी ऐसे भी हैं, जिन्होंने इंस्पेक्टर का प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

अति अनुभवी दरोगाओ को दो स्टार के साथ चीता या लेपर्ड ड्यूटी में लगाया जाना ,कही उस थाने के भार साधक अधिकारी द्वारा स्वयं की नाकामी पर पर्दा डालने का प्रयास तो नहीं है। जिसे उसके द्वारा छुपाने का प्रयास किया जा रहा हो।

लेकिन यह किसी एक व्यक्ति की त्रुटि नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है। कि प्रणाली गत स्तर पर संतुलन प्रभावित हुआ है।

यदि दरोगा को सिपाही स्तर की कमी पूरी करने के लिए लगाया जा रहा है, तो यह समस्या दरोगा की नहीं, बल्कि पुलिस बल की योजना, संसाधन प्रबंधन और मानव संसाधन नियोजन की है।

वास्तविक स्थिति यह है। कि दरोगा की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन उनके साथ कार्य करने वाले सिपाहियों और फील्ड स्टाफ की पर्याप्त भर्ती एवं तैनाती नहीं हो सकी है।

*परिणाम स्वरूप, जिस अनुभवी दारोगा को जांच और नेतृत्व की भूमिका निभानी चाहिए, उसे ही अपेक्षाकृत उसके पद से निम्न स्तर के कार्यों में लगाया जा रहा है।*

यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है। प्रमोशन के बाद दो स्टार प्राप्त करना एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। जो कर्मचारी के मनोबल को उत्कृष्ट बनाती है।

लेकिन उस पद के अनुरूप उपयुक्त जिम्मेदारी और कार्य आवंटन सुनिश्चित करना वास्तविक चुनौती है।

यदि किसी को दरोगा पद पर पदोन्नत किया गया है, लेकिन उसे जांच और नेतृत्व के स्थान पर केवल बाइक गश्त पिकेट तक सीमित रखा जा रहा है, तो केवल मात्र पदनाम परिवर्तन से व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है।कि दरोगा चीता लेपर्ड क्यों चला रहा है ? मतलब लेपर्ड चलाना गलत नहीं, बल्कि शांति व्यवस्था और घटनाओं को रोकने की एक क्वायद है।

बल्कि वास्तविक प्रश्न यह है। दरोगा से उसके मूल और आवश्यक दायित्व क्या लिए जा रहे हैं?

21वीं सदी मे तीव्र गति से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों में अपराध की प्रकृति भी अधिक जटिल हो चुकी है। यहां भूमि विवाद, साइबर अपराध,पोक्सो, ब्लात्कार,ऑनलाइन धोखाधड़ी और संगठित अपराध लगातार बढ़ रहे हैं।

ऐसे परिदृश्य में अनुभवी दरोगा को केवल सड़क गश्त तक सीमित रखना उनकी क्षमताओं का समुचित उपयोग नहीं है। उनकी जांच क्षमता और निर्णय लेने की दक्षता का प्रभावी उपयोग आवश्यक है।

यदि सिपाहियों की कमी है, तो उसका समाधान सिपाही स्तर की भर्ती बढ़ाकर किया जाना चाहिए। या फिर ड्यूटी रोटेशन ठीक करके किया जाना चाहिए ।

यदि फील्ड स्टाफ अपर्याप्त है, तो उसकी पूर्ति अलग से सुनिश्चित की जानी चाहिए।

लेकिन सिपाही की कमी को दूसरे स्तर के अधिकारियों से पूरा करना एक संतुलित प्रशासनिक व्यवस्था नहीं कही जा सकती।

प्रत्येक पद की अपनी स्पष्ट भूमिका होती है। सिपाही सशक्त होंगे, तो दरोगा अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर सकेंगे।

दरोगा अपनी भूमिका का सही निर्वहन करेंगे तो दरोगा/निरीक्षक स्तर पर थानों का संचालन अधिक सुचारु होगा। और जब पूरी श्रृंखला संतुलित होगी, तभी पुलिसिंग प्रणाली सुदृढ़ बन सकेगी।

किन्तु यदि स्थिति ऐसी हो कि दो स्टार वाला दरोगा भी वही कार्य करे जो एक सिपाही का दायित्व है, तो यह समस्या पद की नहीं, बल्कि कार्य विभाजन की असंतुलित व्यवस्था की है।

पुलिस कर्मियों की केवल पदोन्नति या स्टार बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक पद के अनुरूप उचित कार्य और जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण हो।

क्योंकि पुलिसिंग का अर्थ केवल दृश्य उपस्थिति नहीं है। सशक्त पुलिसिंग वही है। जिसमें सही व्यक्ति को सही भूमिका और उपयुक्त जिम्मेदारी प्रदान की जाए।

अन्यथा स्थिति दूर नहीं जब कंधों पर कंधों पर दो स्टार होंगे, हाथ में डंडा और नीचे चीता या लेपर्ड वाहन पर सवार सब इंस्पेक्टर को लोग दीवान जी,और सिपाही जी कहने लगेंगे ,लेकिन वास्तविक और महत्वपूर्ण कार्य कहीं प्रशासनिक व्यवस्था के तले दब कर रह जाएगा।

इसलिए अब वह समय आ गया है। पुलिस विभाग SI/CP रैंकर परीक्षा कराया जाना आवश्यक है। *वरना विलुप्त की कगार पर पहुँचे सफेद बाघों की तरह SI/CP रैंकर दरोगा भी सिर्फ अजायबघरों में ही देखने को मिलेंगे* ।

आज सबसे आधुनिक पीढ़ी *जैंजि* का सिपाही ग्रेजुएट पोस्ट ग्रेजुएट और तकनीकी शिक्षा से लैस कंप्यूटर की एक्सपर्ट है। जबकि 2030 तक *अल्फा* पीढ़ी भी पुलिस विभाग में प्रवेश कर लेगी।

जबकि 20 वी सदी के सिपाही 10 वीं पास हुआ करते थे। और आधुनिक टेक्नोलॉजी से बेखबर थे। ग्रेजुएट पोस्ट ग्रेजुएट सिपाहियों की भारी कमी होती थी।

यही वह गंभीर संकेत है। जिसे समय रहते समझना अत्यंत आवश्यक है।

इसलिए मात्र चरित्र पंजिका (CR) के आधार पर बिना परीक्षा लिए सब इंस्पेक्टर के पद पर पदोन्नति प्रदान करना। नि:संदेह पुलिस विभाग की *व्यावसायिक दक्षता* को प्रभावित करता है।

इसलिए विभागीय पदोन्नति परीक्षाओं का पुन: आरंभ किया जाना आवश्यक है।

यह एक सामान्य विचार है जिसका व्यक्ति विशेष से कोई सम्बन्ध नही है।
साभार✍️

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