Sports- बिसात का बाजीगर: 17 साल के श्रेयस रॉयल ने तोड़ा 37 साल पुराना रिकॉर्ड, बने ब्रिटेन के सबसे युवा चैंपियन -#INA

अगस्त, 2024। इंग्लैंड का हल शहर। ब्रिटिश शतरंज चैंपियनशिप 2024 का 9वां और आखिरी राउंड चल रहा था। एक तरफ ब्रिटेन के सबसे महान दिग्गजों में शुमार ग्रैंडमास्टर माइकल एडम्स थे, तो दूसरी तरफ महज 15 साल का एक दुबला-पतला किशोर। दांव पर ब्रिटेन का सबसे कम उम्र का ग्रैंडमास्टर बनने का रिकॉर्ड था, जिसे डेविड हॉवेल ने बनाया था। खेल शुरू हुआ। सफेद मोहरों के साथ खेलते हुए एडम्स ने चालों का एक पेचीदा जाल बुनना शुरू किया कि किशोर की मुश्किलें बढ़ती गईं। लेकिन, खेल के निर्णायक मोड़ पर उसने ऐसी चाल चली, जिसने पूरी बाजी को पलट दिया।

उसकी उस चाल से एडम्स भी हैरत में पड़ गए और उन्होंने ड्रॉ स्वीकार कर लिया। इस तरह 15 साल, छह महीने और 26 दिन की उम्र में उस किशोर ने ब्रिटेन का सबसे कम उम्र का ग्रैंडमास्टर बनकर इतिहास रचा। उसका नाम है-श्रेयस रॉयल। आज वही श्रेयस एक बार फिर खेल व अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में सनसनी बने हुए हैं। इस बार महज 17 साल की उम्र में उन्होंने प्रतिष्ठित ब्रिटिश शतरंज चैंपियनशिप में अजेय रहते हुए न सिर्फ खिताब जीता, बल्कि माइकल एडम्स का 37 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर इतिहास के सबसे कम उम्र के ब्रिटिश चैंपियन भी बन गए हैं।

2018 का वह मोड़

श्रेयस का जन्म नौ जनवरी, 2009 को बंगलूरू, कर्नाटक में हुआ था। उनके माता-पिता जितेंद्र सिंह और अंजू सिंह हैं। जब श्रेयस करीब तीन साल के थे, तब उनके पिता की नौकरी के कारण पूरा परिवार भारत से ब्रिटेन चला गया। श्रेयस ने शुरुआत में ब्रिटेन के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई की। बाद में, शतरंज में उनके हुनर को देखते हुए उन्हें द पॉइंटर स्कूल, ब्लैकहीथ (लंदन) में छात्रवृत्ति पर पढ़ने का मौका मिला। हालांकि, 2018 में श्रेयस के पिता का वर्क वीजा खत्म होने वाला था और परिवार को भारत लौटना पड़ सकता था। पर, ब्रिटिश शतरंज जगत, सांसदों, अधिकारियों और इंग्लिश चेस फेडरेशन के अध्यक्ष के प्रयासों के चलते परिवार को ब्रिटेन में रहने की अनुमति मिल गई।

रॉयल नाम का किस्सा

श्रेयस रॉयल के पिता को उनके पारिवारिक ज्योतिषी ने सलाह दी थी कि उनके बच्चे के नाम की शुरुआत ‘एसआर’ से होनी चाहिए। परिवार राजपूत पृष्ठभूमि से था, इसलिए उनकी मां अंजू ने ‘श्रेयस रॉयल’ नाम चुना। बचपन में शतरंज श्रेयस की पहली पसंद नहीं थी। उनकी मां ने उन्हें व्यस्त रखने के लिए घुड़सवारी, जिमनास्टिक और तैराकी जैसी कई गतिविधियों में भेजा था। बाद में, उन्होंने सोचा कि बच्चे को कोई मानसिक गतिविधि भी करनी चाहिए। इसी वजह से करीब चार-पांच साल की उम्र में उन्होंने शतरंज खेलना शुरू किया और लगभग छह महीने के भीतर ही उन्होंने अपनी पहली बड़ी प्रतियोगिता में ट्रॉफी जीत ली।

जब कास्परोव ने परखी प्रतिभा

बचपन में गैरी कास्परोव और बॉबी फिशर श्रेयस के पसंदीदा खिलाड़ियों में थे, जबकि आठ साल की उम्र से वह मैग्नस कार्लसन के खेल के बड़े प्रशंसक बन गए। उन्होंने बिना कंप्यूटर की मदद के बोर्ड पर कास्परोव के क्लासिक खेलों को दोहराकर उनका विश्लेषण किया और उन्हें याद कर लिया। श्रेयस को विश्व चैंपियन गैरी कास्परोव द्वारा संचालित कास्परोव चेस फाउंडेशन (केसीएफ) के प्रतिष्ठित ‘यंग स्टार्स’ प्रोग्राम के तहत सीधे ट्रेनिंग का अवसर मिला। 2023 में यूरोपीय प्रशिक्षण शिविर के दौरान कास्परोव ने खुद कई कठिन खेलों और पहेलियों के जरिये श्रेयस का मूल्यांकन किया और उनकी क्षमता से प्रभावित होकर उन्हें व्यक्तिगत कोचिंग सहायता के लिए चुना। लंदन चेस क्लासिक के दौरान जब विश्व चैंपियन मैग्नस कार्लसन और भारत के दिग्गज विश्वनाथन आनंद का मुकाबला होना था, तब तकरीबन नौ वर्ष के श्रेयस रॉयल को बोर्ड पर औपचारिक पहली चाल चलने का विशेष सम्मान दिया गया था।

64 खानों से .

शतरंज के अलावा श्रेयस रॉयल की क्रिकेट, फुटबॉल और लॉन टेनिस जैसे खेलों में भी गहरी दिलचस्पी है। वह इंग्लैंड की क्रिकेट और फुटबॉल टीमों के प्रशंसक हैं। खाली समय में वह फिल्में देखना, संगीत सुनना और यूट्यूब पर वीडियो देखना पसंद करते हैं। ऑनलाइन गेमिंग, खासकर वॉरहैमर में भी उनकी बेहद रुचि है। इसके अलावा, उन्हें शतरंज के इतिहास और महान खिलाड़ियों के खेलों के बारे में पढ़ना-समझना पसंद है। यात्रा और प्रतियोगिताओं के दौरान उन्हें किताबें पढ़ना अच्छा लगता है, विशेष रूप से एंथनी होरोविट्ज की एलेक्स राइडर जैसी रोमांचक और जासूसी उपन्यास। वह फिश एंड चिप्स खाना पसंद करते हैं, हालांकि ज्यादा मसालेदार खाना उन्हें कम पसंद है। स्थानीय लंदन की वास्तुकला में भी उनकी रुचि है। अपनी दादी से स्काइप पर बात करते हुए वह सिर्फ ‘मैं अच्छा हूं’ ही हिंदी में बोल पाते हैं। बचपन में श्रेयस की शतरंज के प्रति दीवानगी इतनी ज्यादा थी कि वह सुबह जल्दी उठकर शतरंज की चालों पर काम करना शुरू कर देते थे। उनके माता-पिता को उन्हें सोने के लिए मनाना पड़ता था।

Credit By Amar Ujala

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