Sports- नीरू की कहानी खास है: गांव में टिन के डिब्बों पर लगाती थीं निशाना, अब एशिया पर कर रहीं राज; ये सफर दिल छू लेगा -#INA

कभी हरियाणा के जींद में एक लड़की घर की डबल बैरल बंदूक से खाली टिन के डिब्बों पर निशाना साधती थी। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही लड़की एक दिन एशिया के सबसे बड़े खेल मंच पर 30 में से 28 निशाने लगाकर इतिहास रचेगी। नीरू ढांडा ने आइची-नागोया एशियन गेम्स में सिर्फ स्वर्ण पदक नहीं जीता, बल्कि भारतीय शूटिंग के इतिहास में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा दिया।
25 मई 2000 को हरियाणा के जींद जिले में जन्मी नीरू का परिवार खेती से जुड़ा था। शूटिंग ऐसा खेल है जिसमें महंगे उपकरण, कारतूस और अभ्यास के लिए शूटिंग रेंज की जरूरत होती है। ऐसे में शुरुआत से ही इस खेल को अपनाना आसान नहीं था, लेकिन नीरू के लिए मुश्किलों ने रास्ता नहीं रोका। साल 2018 में उन्होंने अपने ममेरे भाई लक्ष्य श्योराण को जकार्ता एशियन गेम्स में पुरुष ट्रैप स्पर्धा का रजत पदक जीतते देखा। उसी पल नीरू के मन में भी इसी खेल में . बढ़ने का सपना पैदा हुआ।
प्रोफेशनल शूटिंग रेंज तक तुरंत पहुंच नहीं थी, इसलिए शुरुआती अभ्यास का तरीका भी बिल्कुल अलग था। नीरू गांव के माहौल में परिवार की डबल बैरल बंदूक से खाली टिन के डिब्बों पर निशाना साधकर अपनी आंख और हाथ का तालमेल बेहतर करती थीं। उनकी प्रतिभा और एकाग्रता को भाई लक्ष और लक्ष्य श्योराण ने पहचाना। दोनों ने नीरू का साथ दिया और उन्हें प्रतिस्पर्धी शूटिंग की बारीकियां सीखने में मदद की।