Tach – आपको बहरा करने का सामान घूम रहा सड़क पर, सामने खड़े नाच रहे बच्चे-बूढ़े

नई दिल्ली. क्या आपने कभी डीजे सिस्टम की धमक से दुकान पर रखा सामान नीचे गिरता देखा है? नहीं देखा तो सोशल मीडिया पर जाकर सर्च कीजिए, अभी बहुत सारी वीडियोज वायरल हैं. दवा की दुकान में आवाज से दवाएं नीचे गिरती दिख जाएंगी. सोचिए जो आवाज किसी स्लैब पर रखे सामान को हिला सकती है वह आपके कानों का क्या हाल करती होगी. इंसान के कान इतनी तेज आवाज सुनने के लिए नहीं बने हैं. जितनी तेज आवाज में वो गाने चलाते हैं वह आवाज कुछ ही देर में कानों को स्थाई नुकसान पहुंचा सकती है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि कान कितने डेसिबल की आवाज आराम से सुनते हैं और कब उन्हें परेशानी होने लगती है? आइए आपको बताते हैं.

कितनी तेज आवाज कानों के लिए खतरनाक है

आवाज की तीव्रता को डेसिबल यानी dB में मापा जाता है. आवाज जितनी तेज होती है, कानों पर उसका दबाव उतना ही ज्यादा बढ़ता जाता है.

  • 70 dB तक: सामान्य बातचीत और रोजमर्रा की ज्यादातर आवाजें इस स्तर के आसपास होती हैं. आमतौर पर इस स्तर पर लंबे समय तक रहने से सुनने की क्षमता को नुकसान का जोखिम कम होता है.
  • 85 dB: यहां से लंबे समय तक तेज आवाज सुनने पर सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है. 85 dB के आसपास का शोर अगर लंबे समय तक लगातार सुना जाए तो कानों पर असर पड़ सकता है.
  • 100 dB: यह काफी तेज आवाज है. इस स्तर पर लंबे समय तक रहने से कानों को नुकसान का खतरा तेजी से बढ़ जाता है. तेज आवाज में लगातार हेडफोन या डीजे के पास रहना इसलिए खतरनाक हो सकता है.
  • 120 dB: यह बेहद तेज आवाज का स्तर है. इतने शोर में कानों को बहुत कम समय में नुकसान पहुंच सकता है और कानों में दर्द या तेज घंटी बजने जैसी समस्या हो सकती है.
  • 140 dB या उससे ज्यादा: यह बेहद खतरनाक स्तर है. इतनी तेज आवाज अचानक सुनने पर कान के पर्दे को नुकसान पहुंच सकता है और स्थायी सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.

ट्रक वाला डीजे इतना खतरनाक क्यों

शादियों और जुलूसों में इस्तेमाल होने वाले बड़े डीजे सेटअप में सिर्फ तेज आवाज ही नहीं होती, बल्कि भारी लो फ्रिक्वेंसी बेस भी होता है. यही बेस आसपास की हवा में ज्यादा कंपन पैदा करता है. इसी वजह से खिड़कियों के शीशे, दरवाजे और दुकानों में रखा सामान तक हिल सकता है. ऐसे डीजे सिस्टम के बिल्कुल पास खड़े लोगों के कानों तक पहुंचने वाली आवाज काफी तेज हो सकती है. आवाज का स्तर डीजे से दूरी, स्पीकर की क्षमता और सेटअप की दिशा पर भी निर्भर करता है. इसलिए डीजे के सामने खड़े होकर घंटों नाचना कानों के लिए खास तौर पर जोखिम भरा हो सकता है.

बच्चों और बुजुर्गों पर भी असर

तेज आवाज का असर सिर्फ डीजे के सामने खड़े व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता. आसपास मौजूद बच्चों, बुजुर्गों और दूसरे लोगों को भी इसका सामना करना पड़ता है. छोटे बच्चे तेज आवाज से असहज हो सकते हैं और लंबे समय तक तेज शोर में रहने से उनकी सुनने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है. वहीं बुजुर्गों या पहले से सुनने में परेशानी वाले लोगों के लिए तेज शोर और ज्यादा परेशान करने वाला हो सकता है. लगातार तेज आवाज से सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, तनाव और नींद में परेशानी जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं.

भारत में आवाज की सीमा भी तय है

भारत में अलग अलग इलाकों के लिए शोर की अधिकतम सीमा तय है. आवासीय इलाकों में दिन के समय सीमा 55 dB और रात में 45 dB है. व्यावसायिक इलाकों में दिन के समय 65 dB और रात में 55 dB की सीमा निर्धारित है. यानी सड़क पर चलने वाला डीजे अगर बेहद ऊंचे स्तर पर आवाज पैदा कर रहा है, तो वह सामान्य शोर सीमा से कई गुना ज्यादा हो सकता है. खासकर रात के समय तेज डीजे लोगों की नींद और आसपास के माहौल को भी प्रभावित करता है.

कानों को बचाने के लिए क्या करें

अगर किसी कार्यक्रम में डीजे बहुत तेज बज रहा है तो स्पीकर के बिल्कुल सामने खड़े होने से बचें. जितनी दूरी बढ़ेगी, कानों तक पहुंचने वाली आवाज का स्तर उतना कम होगा. लंबे समय तक तेज आवाज में रहने के बजाय बीच बीच में शांत जगह पर जाना भी मददगार हो सकता है. अगर तेज आवाज सुनने के बाद कानों में घंटी या सीटी बजती रहे, कान बंद बंद महसूस हों या सुनने में कमी लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. बार बार ऐसी स्थिति होने पर कानों की जांच कराना बेहतर है.


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