UP News: आरक्षण की मांग या शक्ति प्रदर्शन? दिल्ली में संजय निषाद की रैली के पीछे क्या है सियासी कहानी – INA

आरक्षण की मांग, हजारों लोगों को जुटाने की तैयारी और 2027 के चुनाव से पहले बीजेपी पर दबाव बनाने की कोशिश! उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद आज दिल्ली में अपनी ताकत दिखाने जा रहे हैं. दिल्ली चलो के नारे के साथ निषाद समाज का यह कार्यक्रम दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हो रहा है. इसका नारा है- 12 साल बेमिसाल, मछुआरों का हुआ उत्थान.
इस शक्ति प्रदर्शन की मांग है निषाद समाज की उपजातियों को अनुसूचित जाति यानी SC में शामिल करने की. लेकिन इस कार्यक्रम की कहानी सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं है. संजय निषाद 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी से ज्यादा सीटें मांग रहे हैं. 2022 में निषाद पार्टी को 16 सीटें मिली थीं, जिनमें पार्टी और बीजेपी के चुनाव चिह्न पर लड़ने वाले उसके उम्मीदवारों ने कुल 11 सीटें जीती थीं. अब संजय निषाद को अपनी राजनीतिक ताकत दिखानी है.
सवाल है कि दिल्ली में जुटने वाली भीड़ आरक्षण की मांग को कितना मजबूत करेगी? क्या यह शक्ति प्रदर्शन बीजेपी को सीटों के बंटवारे पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर करने की कोशिश है? और निषाद समाज का वोट यूपी की कितनी सीटों पर चुनावी नतीजे बदल सकता है?
दिल्ली में निषाद समाज का जुटान, निशाने पर आरक्षण
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले निषाद पार्टी ने आरक्षण के मुद्दे पर अपनी मुहिम तेज कर दी है. पार्टी अध्यक्ष और यूपी सरकार में मंत्री संजय निषाद के आह्वान पर आज दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. संजय निषाद ने पार्टी कार्यकर्ताओं और समाज के लोगों से दिल्ली पहुंचने की अपील की है. पार्टी की मुख्य मांग है कि मछुआरा समुदाय की उपजातियों को अनुसूचित जाति का लाभ मिले.
निषाद पार्टी लंबे समय से इस मांग को उठाती रही है. पार्टी का कहना है कि मछुआरा और नदी से जुड़े समुदायों को उनका हक मिलना चाहिए. संजय निषाद का कहना है कि बीजेपी सरकार के साथ रहने के बावजूद वह अपने समाज के अधिकारों की मांग उठाते रहेंगे. पार्टी ने इस कार्यक्रम को सिर्फ आरक्षण की मांग तक सीमित नहीं रखा है. इसके जरिए समाज को एकजुट करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश भी हो रही है.
आरक्षण के साथ 2027 की सीटों का गणित
संजय निषाद की इस मुहिम के पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव का गणित भी अहम है. निषाद पार्टी बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा है, लेकिन अगले विधानसभा चुनाव में वह पहले के मुकाबले ज्यादा सीटों की मांग कर रही है. 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने निषाद पार्टी को कुल 16 सीटें दी थीं. इनमें 10 उम्मीदवार निषाद पार्टी के चुनाव चिह्न पर लड़े थे, जबकि 6 उम्मीदवार बीजेपी के चुनाव चिह्न पर जीतने में कामयाब रहे.
निषाद पार्टी के अपने चुनाव चिह्न पर छह उम्मीदवार जीते थे. इस तरह दोनों चुनाव चिह्नों पर लड़ने वाले कुल 11 उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुंचे. अब संजय निषाद चाहते हैं कि 2027 में उनकी पार्टी को ज्यादा सीटें मिलें. उनकी दलील है कि जिन सीटों पर निषाद समाज के वोट निर्णायक हैं और जहां बीजेपी लंबे समय से जीत नहीं पाई है, वहां निषाद पार्टी को मौका दिया जाना चाहिए. संजय निषाद ने पहले भी कहा है कि उनकी पार्टी एनडीए के साथ रहेगी, लेकिन समाज के अधिकारों के लिए लड़ाई भी जारी रखेगी.
आरक्षण की मांग से बीजेपी पर दबाव?
संजय निषाद की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से अहम रहा है. निषाद, मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप और दूसरी नदी से जुड़े जाति-समुदायों को एक मंच पर लाने की कोशिश उनकी पार्टी की रणनीति का हिस्सा रही है. अब दिल्ली में बड़े कार्यक्रम के जरिए संजय निषाद इस मांग को फिर से केंद्र में लाना चाहते हैं. पार्टी का कहना है कि मछुआरा समाज को उसके अधिकार मिलने चाहिए. संजय निषाद यह भी कहते रहे हैं कि सरकार में रहते हुए भी वह अपने समाज के मुद्दों को उठाने से पीछे नहीं हटेंगे.
यूपी की कितनी सीटों पर निषाद वोट का असर?
निषाद समाज की मौजूदगी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में है. गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीरनगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, प्रयागराज, फतेहपुर, देवरिया और कुशीनगर जैसे जिलों में इस समुदाय की अच्छी-खासी आबादी बताई जाती है. इसके अलावा बांदा, हमीरपुर और सहारनपुर जैसे इलाकों में भी मल्लाह और नदी से जुड़े समुदायों की मौजूदगी चुनावी समीकरणों में चर्चा का विषय रहती है.
निषाद समाज के नेताओं का दावा है कि उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 160 सीटों पर उनके समाज का कुछ न कुछ प्रभाव है. इनमें 50 से 80 सीटें ऐसी बताई जाती हैं, जहां निषाद वोट चुनावी मुकाबले में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
मल्लाह समाज की आबादी कितनी?
उत्तर प्रदेश में मल्लाह समाज की आबादी करीब 5 से 6 फीसदी मानी जाती है. मल्लाह समाज के साथ निषाद, केवट, बिंद, बाथम, कश्यप, साहनी और मांझी जैसे समुदायों को व्यापक समूह के रूप में जोड़कर देखा जाता है. अलग-अलग राजनीतिक दावों और अनुमानों में इन समुदायों की कुल आबादी करीब 9 फीसदी तक बताई जाती है. संजय निषाद की कोशिश इन समुदायों को एक साझा मंच पर लाने की है, ताकि आरक्षण की मांग को मजबूत किया जा सके और चुनाव के समय उनकी राजनीतिक दावेदारी भी बढ़े.
सत्ता में मौजूदगी, लेकिन प्रतिनिधित्व का सवाल
निषाद समाज के नेताओं का कहना है कि उनकी आबादी और कई सीटों पर प्रभाव के बावजूद विधानसभा में समाज का प्रतिनिधित्व कम है. उनका दावा है कि यूपी की 50 से ज्यादा सीटों पर मल्लाह समुदाय की आबादी 60 हजार से अधिक है. 2022 में उनकी पार्टी को 16 सीटें मिली थीं और पार्टी के चुनाव चिह्न या बीजेपी के चुनाव चिह्न पर लड़ने वाले कुल 11 उम्मीदवार जीते थे. अब 2027 के लिए उनकी मांग है कि निषाद समाज की आबादी और राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए पार्टी को ज्यादा सीटें मिलें.
NDA के नेताओं को बुलाकर क्या संदेश देना चाहते हैं संजय निषाद?
दिल्ली के कार्यक्रम में संजय निषाद ने एनडीए के सहयोगियों को भी आमंत्रित किया है. यह बात इसलिए अहम है क्योंकि वह बीजेपी से अलग होकर चुनाव लड़ने की बात नहीं कर रहे, बल्कि गठबंधन में रहते हुए अपनी मांग और राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं. संजय निषाद पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पार्टी 2027 में एनडीए के साथ रहेगी. साथ ही वह उन सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग कर रहे हैं, जहां निषाद समाज की मौजूदगी ज्यादा है और बीजेपी को पहले हार का सामना करना पड़ा है.
ऐसे में दिल्ली का कार्यक्रम समाज को एकजुट करने के साथ-साथ एनडीए के भीतर अपनी राजनीतिक अहमियत दिखाने का मौका भी है. अब देखना होगा कि दिल्ली के इस कार्यक्रम में कितनी भीड़ जुटती है, एनडीए के कौन-कौन से नेता पहुंचते हैं और आरक्षण के मुद्दे पर क्या बात सामने आती है.
आरक्षण की मांग या शक्ति प्रदर्शन? दिल्ली में संजय निषाद की रैली के पीछे क्या है सियासी कहानी
Copyright Disclaimer :-Under Section 107 of the Copyright Act 1976, allowance is made for “fair use” for purposes such as criticism, comment, news reporting, teaching, scholarship, and research. Fair use is a use permitted by copyright statute that might otherwise be infringing., educational or personal use tips the balance in favor of fair use.
Credit By :-This post was first published on https://www.tv9hindi.com/, we have published it via RSS feed courtesy of Source link,