UP News: 100 साल पुराना, 150 लोगों के ठहरने का इंतजाम… कहानी दालमंडी के ऐतिहासिक मुसाफिरखाना की, जिस पर चला हथौड़ा – INA

Varanasi News: ‘असहयोग आंदोलन’ के समय बने और रोजी-रोजगार व व्यापार के सिलसिले में बनारस आने वाले लोगों को बहुत कम पैसे में रुकने की सहूलियत देने वाले मुसाफिरखाना के एक हिस्से पर आज ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई. 1920 के दशक में बने इस मुसाफिरखाना के आगे के हिस्से में बने मैरेज हॉल पर आज शाम चार बजे हथौड़ा चलना शुरू हो गया. पैरामिलिट्री फोर्स और कई थानों की पुलिस की मौजूदगी में ये कार्रवाई शुरू हुई.

बता दें कि 40 साल पहले वक्फ बोर्ड ने इस मुसाफिरखाना का संचालन अपने हाथ में ले लिया था. PWD के एक्सईएन केके सिंह ने बताया कि 12 दिन पहले मुसाफिरखाना के इस हिस्से (21 फुट) की रजिस्ट्री हो चुकी है. ACP दशास्वमेध अतुल अंजान त्रिपाठी ने बताया कि चौड़ीकरण के लिए जितना हिस्सा चाहिए था, उतने हिस्से पर ही कार्रवाई हो रही है.

दालमंडी के 45 भवनों पर बुलडोजर एक्शन

दालमंडी में बीते शनिवार को 45 भवनों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू हुई थी. मुसाफिरखाना के इस हिस्से पर कार्रवाई भी उसी का हिस्सा है. तीन जेसीबी और 60 मजदूरों को इस ध्वस्तीकरण अभियान में लगाया गया है. वीडीए और पीडब्लूडी के संयुक्त अभियान में जिन 45 भवनों पर कार्रवाई हो रही, उनमें से 25 भवनों की रजिस्ट्री हो चुकी है, जबकि 20 जर्जर घोषित किए गए हैं. अब तक 39 करोड़ रुपए मुआवजे में बांट दिया गया है.

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220 करोड़ के इस प्रोजेक्ट में 191 करोड़ मुआवजे में दिए जाने हैं. दालमंडी प्रोजेक्ट में जिसका शिलान्यास पीएम मोदी ने पिछले साल किया था. 650 मीटर लंबी गली को 17.4 मीटर चौड़ा करना है. दालमंडी में जमीन खाली कराने की डेड लाइन 31 मई है जबकि इस प्रोजेक्ट को 31 अगस्त तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.

मुसाफिरखाने को लेकर दालमंडी के लोगों ने क्या कहा?

दालमंडी में कारोबार करने वाले शकील अहमद बताते हैं कि मुसाफिरखाना ऐसे लोगों के लिए रुकने का इंतजाम करता है, जो होटल या महंगे लॉज में रुकने में असमर्थ हैं. यहां 100 कमरे और 50 अलमारी यानी कि कुल 150 लोगों के रुकने की व्यवस्था मुसाफिरखाना में है. कमरे का किराया करीब 150 और 50 रुपए में अलमारी मिल जाती है. आधार कार्ड दिखाकर कोई भी कमरा ले सकता है. हालांकि यहां 99% मुस्लिम ही रुकते हैं, लेकिन धर्म यहां कोई बाध्यता नहीं है. मैरिज हॉल जिस पर हथौड़ा चला है, ये कम पैसे में लोगों को शादी-ब्याह के लिए जगह उपलब्ध कराता था. इसके टूटने पर अफसोस तो है.

40 साल से वक्फ बोर्ड कर रहा इसकी देख-रेख

दालमंडी के ही आगा कमाल बताते हैं कि मुगलों के समय पहले ये एक सराय के रूप में था. जो नॉमिनल पैसे में परदेसी लोगों के रुकने के लिए बनाया गया था. ऐसे लोग जिनका बनारस में कोई रुकने का इंतजाम नहीं था, वो यहां रुकते थे. बाद में दो तीन फेज में ये मुसाफिरखाना के रूप में बना. करीब 40 साल पहले वक्फ बोर्ड ने इसके संचालन का जिम्मा ले लिया. आज के ध्वस्तीकरण में भी सिर्फ 21 फीट की जगह ही गई है, जिसमें मैरिज हॉल बना हुआ था.

अधिग्रहण की कार्रवाई के बाद गिराना था

दालमंडी के ही आमिर हफीज, जो कि एक वकील भी हैं, वो इस कार्रवाई से संतुष्ट नही हैं. आमिर हफीज कहते हैं कि वक्फ सम्पत्ति के किसी भी हिस्से पर चाहे वो मैरिज हॉल हो या फिर मस्जिद अगर आप कार्रवाई कर रहे हैं तो प्रॉपर अधिग्रहण की कार्रवाई के बाद ही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हो सकती है. वक्फ प्रॉपर्टी से होने वाली कमाई यतीमों/गरीबों के लिए है. अगर आप ऐसी प्रॉपर्टी पर कार्रवाई कर रहे हैं तो क्या वैसा ही हॉल कहीं और आपने बनाकर दिया?

अमित कुमार सिंह
अमित कुमार सिंह

पिछले 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय, 2008 सितम्बर में नई दुनियां अख़बार दिल्ली से पत्रकारिता शुरू की. अप्रैल 2009 में ज़ी मीडिया जॉइन किया. दिसंबर 2018 तक ज़ी मीडिया में बतौर ब्यूरो चीफ बनारस रहा. जनवरी 2019 से जनतंत्र टीवी में गए और 2021 तक जिम्मेदारी निभाई.

रोमिंग जर्नलिस्ट के तौर पर जनतंत्र टीवी के लिए स्पेशल करेस्पोंडेंट की हैसियत से दिल्ली, बिहार-झारखंड और लखनऊ में अपनी सेवाएं दीं. टीवी 9 यूपी का हिस्सा बनने से पहले न्यूज़ नेशन गोरखपुर में बतौर ब्यूरो चीफ़ की भूमिका में रहे. फिलहाल टीवी 9 यूपी (डिजिटल) के लिए बनारस से सेवाएं दे रहे हैं.

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