UP News: हर जिले में 70 लोगों की टीम तय करेगी प्रत्याशी! UP में BJP का प्लान – INA
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने टिकट बंटवारे को लेकर एक नई रणनीति बनाई है. हर जिले में करीब 70 लोगों की टीम बनाई जाएगी, जिसका काम दावेदारों का नाम तय करना होगा. इस टीम को जमीनी हकीकत से भी पार्टी हाईकमान को रूबरू कराना होगा. यानी टिकट की दावेदारी हो… संगठन की स्थिति हो… या स्थानीय नाराजगी… अब बीजेपी ऊपर से नीचे तक रिपोर्ट जुटाने की तैयारी में है.
हर जिले में 70 लोगों की कमेटी बनेगी. इसमे तीन बार (भूतपूर्व, पूर्व और वर्तमान) के मंडल अध्यक्ष, मंडल के पदाधिकारी और जिला अध्यक्ष के साथ जिला के पदाधिकारी के अलावा पूर्व सांसद और विधायक भी रहेंगे. सभी नेताओं के बीच कोआर्डिनेशन के लिए संयोजक की नियुक्ति होगी. यह कमेटी हर सीट के दावेदारों का पैनल बनाएगी… इस पैनल को राज्य कमेटी को भेजा जाएगा. इसके बाद केंद्रीय कमेटी को भेजा जाएगा.
नितिन नबीन के दौरे के बाद फैसला
दरअसल, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का यूपी दौरा सिर्फ नेताओं से मुलाकात का कार्यक्रम नहीं था… बल्कि संगठन की जमीनी स्थिति को समझने की कवायद भी थी. मेरठ और सहारनपुर के दो दिन के दौरे में उन्होंने बूथ, शक्ति केंद्र, मंडल और जिला स्तर की तैयारियों की समीक्षा की. पश्चिमी यूपी की करीब 137 विधानसभा सीटों पर संगठन की स्थिति को समझने के लिए बड़ी संख्या में शक्ति केंद्र पदाधिकारियों से संवाद हुआ.
हर जिले में 70 लोगों की टीम?
अब इसी फीडबैक मैकेनिज्म को और नीचे तक ले जाने की तैयारी है. पार्टी हर जिले में करीब 70 लोगों की टीम के जरिए फीडबैक जुटाने की व्यवस्था पर काम कर रही है. इस टीम का मकसद सिर्फ संगठन की मजबूती या कमजोरी जानना नहीं होगा… बल्कि संभावित उम्मीदवारों को लेकर भी जमीनी राय जुटाना बताया जा रहा है. कौन नेता लगातार क्षेत्र में सक्रिय है? किसकी संगठन में पकड़ है? किस नेता को कार्यकर्ताओं का समर्थन हासिल है?
साथ ही कहां स्थानीय स्तर पर नाराजगी है? कहां मौजूदा विधायक के खिलाफ शिकायतें हैं? और किन चेहरों को संगठन और जनता के बीच स्वीकार्यता मिल रही है? इन तमाम सवालों के जवाब एक जगह जुटाने की कोशिश होगी.
टिकट के लिए सिर्फ बड़े नेता की पैरवी काफी नहीं?
बीजेपी में टिकट का अंतिम फैसला केंद्रीय और पार्टी की निर्धारित प्रक्रिया के तहत होता है, लेकिन अगर हर जिले से बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों का फीडबैक जुटाया जाता है तो उम्मीदवार चयन की शुरुआती तस्वीर जमीनी रिपोर्ट से तैयार हो सकती है. यानी टिकट के दावेदारों के लिए सिर्फ लखनऊ या दिल्ली में लॉबिंग नहीं बल्कि जिले से आई की रिपोर्ट भी अहम हो सकती है.
‘विरोध किया था’ तो दरवाजा बंद नहीं होगा
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने संगठन के भीतर एक और संदेश दिया है. किसी विधायक या सांसद को सिर्फ इसलिए किसी नेता को बैठक से बाहर नहीं रखना चाहिए कि उसने कभी उसका विरोध किया था. यानी स्थानीय गुटबाजी… पुरानी राजनीतिक अदावत… चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ काम करने का इतिहास… इन सबके बावजूद संगठन में संवाद का रास्ता खुला रखने की कोशिश है.
पूर्व जनप्रतिनिधियों को क्यों जोड़ा जा रहा?
बीजेपी की इस कवायद में पूर्व सांसद और पूर्व विधायक के साथ पार्टी के पूर्व पदाधिकारी भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, क्योंकि चुनाव हारने के बाद भी कई पूर्व जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं. उनके पास स्थानीय कार्यकर्ताओं की जानकारी होती है… जातीय और सामाजिक समीकरणों की समझ होती है और चुनाव में हुई हार के कारणों को लेकर उनका अपना अनुभव होता है. यही वजह है कि नितिन नबीन ने मौजूदा जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ पूर्व जनप्रतिनिधियों और पार्टी पदाधिकारियों से भी बातचीत की.
हर जिले में 70 लोगों की टीम तय करेगी प्रत्याशी! UP में BJP का प्लान
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