UP News: 21 फीसदी दलित वोटर्स पर बीजेपी की नजर, क्या पश्चिमी यूपी में बदलेगी सियासी हवा? – INA

उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगभग 20 से 21 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला दलित मतदाता वर्ग एक बार फिर केंद्र में आ गया है. 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर का उद्घाटन और सहारनपुर-देहरादून में आयोजित कार्यक्रमों को विकास के साथ-साथ राजनीतिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देहरादून से इस कॉरिडोर को राष्ट्र को समर्पित किया, जबकि सहारनपुर में हुए रोड शो के दौरान भारी भीड़ उमड़ी और व्यापक जनसमर्थन देखने को मिला. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि इस कॉरिडोर के शुरू होने से सहारनपुर से दिल्ली और देहरादून की दूरी घटकर करीब ढाई घंटे रह जाएगी, जिससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में व्यापार, निवेश और पर्यटन को नई गति मिलेगी.
पश्चिमी यूपी की सीटों पर दलित मतदाताओं का प्रभाव
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ और बागपत जैसे जिलों की कई विधानसभा सीटों—जैसे पुरकाजी, रामपुर मनिहारान और सहारनपुर देहात-में दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. बिजनौर क्षेत्र की नगीना लोकसभा सीट पर भी इस वर्ग का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है. 21% मतदाता होने के चलते उत्तर प्रदेश की दर्जनों विधानसभा सीट ऐसी है जहां पर दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में है. 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक दल इस वोट बैंक पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.
सामाजिक संदेश और संगठनात्मक सक्रियता
भारतीय जनता पार्टी का फोकस 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी दलित मतदाताओं पर पूरा फोकस कर रही है और दलित मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए तमाम जुगत लगाई जा रही है. इसी क्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में सामाजिक समरसता पर जोर देते हुए कहा कि सरकार रविदास, महर्षि वाल्मीकि और बाबा साहेब अंबेडकर जैसे महापुरुषों की प्रतिमाओं पर छत्र स्थापित कराएगी. उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा कार्यकर्ता नियमित रूप से इन प्रतिमाओं और स्मारकों की साफ-सफाई करेंगे, जिससे समाज में सम्मान और जुड़ाव की भावना मजबूत होगी.
2024 के संकेत, 2027 की तैयारी
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के ‘संविधान बचाओ’ नारे को दलित मतदाताओं का व्यापक समर्थन मिला, जिससे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन को लाभ हुआ. वहीं बहुजन समाज पार्टी गठबंधन से बाहर रहने के कारण अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी. ऐसे में अब विकास परियोजनाओं, सामाजिक प्रतीकों और जनसंपर्क के जरिए दलित मतदाताओं के बीच पकड़ मजबूत करने की कोशिशें तेज हो गई हैं. कुल मिलाकर, दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर जहां विकास का प्रतीक है, वहीं इसके साथ जुड़े कार्यक्रम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति के बदलते समीकरणों की ओर भी संकेत कर रहे हैं.
21 फीसदी दलित वोटर्स पर बीजेपी की नजर, क्या पश्चिमी यूपी में बदलेगी सियासी हवा?
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