UP News: यूपी और बिहार-झारखंड की कांवड़ यात्रा से अलग-अलग तरह की तस्वीरें क्यों आती हैं? – INA

समुद्र मंथन से निकले हलाहल को जब भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया तो भोलेनाथ को शांत और शीतल करने के लिए उनके ऊपर देवताओं ने गंगाजल अर्पित किया. इस पौराणिक मान्यता ने अनंत काल से आज के वर्तमान समय तक की यात्रा पूरी की. नीलकंठ महादेव को प्रसन्न करने के लिए भक्त उनके ऊपर गंगाजल चढ़ाते हैं. सावन में होने वाली विशाल कांवड़ यात्रा इसी भावना से जुड़ी एक अद्भुत धार्मिक यात्रा है, एक तपस्या है.

लेकिन शिव को शांत करने वाले गंगा जल को लेकर जब कांवड़िए इस मार्ग से गुजरते हैं तो कई बार कुछ ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो मन को अशांत भी करती हैं, कुछ सवाल भी उठाती हैं. ये सवाल है कांवड़ यात्रा के समय होने वाले हुड़दंग और हिंसा की घटनाओं को लेकर.

देवघर और हरिद्वार कांवड़ यात्रा की तुलना

अब इसी कड़ी में RJD सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने 2 कांवड़ यात्राओं को लेकर तुलना की एक लकीर खींचने की कोशिश की है. मनोज झा ने सोशल मीडिया पर अपने पोस्ट में पश्चिम उत्तर प्रदेश से हरिद्वार तक की कांवड़ यात्रा और बिहार – झारखंड में होने वाली देवघर के बाबा वैद्यनाथ की कांवड़ यात्रा की तुलना की है. सबसे पहले उन्होंने जो लिखा है उसे देखते हैं –

मनोज झा ने अपने X हैंडल से पोस्ट करते हुए कहा, “यह गौर करने की बात है कि हर साल लाखों श्रद्धालु बिहार और देश के विभिन्न हिस्सों से झारखंड स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक करने पहुंचते हैं. इतनी विशाल भीड़ के बावजूद वे भयावह दृश्य विरले ही देखने को मिलते हैं, जो अक्सर नोएडा या गाजियाबाद जैसी जगहों से सामने आते हैं. इसका उत्तर केवल कानून-व्यवस्था में नहीं, बल्कि समाजशास्त्र में भी खोजा जाना चाहिए. आस्था जब तप, अनुशासन और सामूहिक उत्तरदायित्व का रूप लेती है, तब वह समाज को जोड़ती है; लेकिन जब वही आस्था पहचान के प्रदर्शन या शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम बनने लगती है, तब उसके सामाजिक परिणाम भी बदल जाते हैं. इसलिए सवाल किसी एक समुदाय, क्षेत्र या आयोजन का नहीं, बल्कि उस सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति का है जिसमें धार्मिक आचरण आकार लेता है.”

इस तरह से साफ-साफ उन्होंने ये कहा है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के मुकाबले देवघर की कांवड़ यात्रा शांतिपूर्वक, बिना किसी बवाल के और ज्यादा व्यवस्थित होती है. साथ ही उन्होंने इसके पीछे सामाजिक और राजनीतिक संस्कृति का हवाला देते हुए एक ऐसी टिप्पणी की है जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.I

तो सीधा सा सवाल ये उठता है कि हरिद्वार से जल लेकर चलने वाले कांवड़ यात्री और सुल्तानगंज से लेकर देवघर जाने वाली कावड़ियों में भी क्या कोई फर्क है? क्या दोनों की राजनीतिक और सामाजिक संस्कृति का अंतर इतना है कि मनोज झा एक के लिए भयावह शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो दूसरे के लिए अनुशासित और उत्तरदायी का संबोधन कर रहे है? सच क्या है चलिए ये समझते हैं तथ्यों के आधार पर. लेकिन आगे बढ़ने से पहले दोनों कांवड़ यात्रा के पीछे की पौराणिक मान्यता भी जान लेते हैं.

कहां से कहां तक का कांवड़ रूट

भगवान परशुराम ने हरिद्वार से गंगा जल लेकर बागपत के पुरा महादेव को जल चढ़ाया था तब से इस मार्ग पर ये कांवड़ यात्रा होती है. भगवान परशुराम को पहला कांवड़िया भी माना जाता है.

इसी तरह शिव भक्त रावण ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए सुल्तानगंज से गंगा जल लेकर देवघर में बाबा बैद्यनाथ को जल चढ़ाया जिसकी वजह से इस मार्ग पर कांवड़ यात्रा की परंपरा है.

दोनों कांवड़ यात्राओं से जुड़े तथ्य

कांवड़ रूट और दूरीः दिल्ली-NCR से हरिद्वार तक होने वाले कांवड़ यात्रा का रूट लंबा है और देवघर वाला रूट उससे छोटा. दिल्ली-NCR से हरिद्वार का रूट 150 km से 200 km तक का है जबकि सुल्तानगंज से देवघर का कांवड़ रूट 105 km का है. मतलब साफ है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में पुलिस और प्रशासन को ज्यादा लंबा रूट मैनेज करना होता है. ये अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. इतने लंबे रूट पर पूर्ण निगरानी दिल्ली और यूपी सरकार के लिए आसान नहीं होती.

ये अपने आप में एक बड़ा फैक्टर है. दिल्ली-NCR से जाने वाले कांवड़ रूट को देखिए
दिल्ली/NCR → गाजियाबाद → मोदीनगर → मेरठ → खतौली → मुजफ्फरनगर → रुड़की → हरिद्वार

ये सभी बहुत ही घनी आबादी और व्यस्त यातायात वाले जिले और मार्ग हैं. एक आबादी के घनत्व का आंकड़ा देखें तो- दिल्ली-NCR 11,000+ व्यक्ति प्रति वर्ग किमी तो गाजियाबाद में 4,0005,000 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी, मेरठ में 1,3001,500 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी, मुजफ्फरनगर में 8001,000 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी और रुड़की/हरिद्वार में 8001,200 व्यक्ति वर्ग किमी है.

कहां से कहां तक है देवघर रूट

इसी हिसाब से देवघर रूट को देखा जाए तो ये सुल्तानगंज (भागलपुर) → असर्गंज → तारापुर → कटरिया → देवघर (बैद्यनाथ धाम) जिलों से होकर जाती है. लेकिन ये जिले आबादी के घनत्व की दृष्टि से बहुत कम है.

भागलपुर/सुल्तानगंज में 1,2001,500 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है जो इस मार्ग में सबसे ज्यादा है. बाकी बचे इलाके जो बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाके में आते हैं उसमें अधिकतम 700 से 1000 व्यक्ति प्रति किमी का ही घनत्व है.

इस हिसाब से पश्चिम यूपी का कांवड़ मार्ग कई गुना ज्यादा घना है और ऐसे में पुलिस हो, प्रशासन हो, कांवड़ यात्री हों या यहां के आम लोग सबके लिए बड़ी चुनौती होती है.

दोनों कांवड़ रूट में बनावट का फर्क

दिल्ली-NCR का कांवड़ रूट ज्यादातर शहरी मार्ग है और राष्ट्रीय राजमार्गों से होता हुआ जाता है. नतीजा ये होता है कि इसमें दूसरे लोकल वाहनों की भी आवाजाही रहती है. ट्रैफिक जाम की वजह से स्थानीय लोगों को भी कई बार बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ता है. ज्यादातर झगड़े कांवड़ छू जाने, हल्की-फुल्की टक्कर होने , जल गिर जाने से होता है क्योंकि इसमें से किसी वजह से अगर यात्रा खंडित होती है तो कहा-सुनी झगड़े का रूप ले लेती है.

इसके ठीक विपरीत सुल्तानगंज से देवघर तक का कांवड़ रूट निश्चित है जो सिर्फ पैदल मार्ग है कांवड़ यात्रियों के लिए. इसे कच्ची कांवड़िया पथ भी कहा जाता है. साथ ही लगभग पूरा रास्ता ग्रामीण है तो ऐसे में वाहनों की टक्कर, लोकल लोगों से किसी बात की बहस या झगड़े, और मार्ग में बाधा जैसी कोई दिक्कत नहीं होती. ये पथ गंगा की लाई मिट्टी वाला होता है जिससे पैदल चलने वालों के पैरों को थोड़ी राहत होती है.

ये मार्ग सुल्तानगंज से सीधा देवघर तक 100 किलोमीटर तक का है जिस पर कोई गाड़ी नहीं चलती. निजी वाहन इसके ठीक बराबर में बने मुख्य पक्के मार्ग पर चलते हैं. मार्ग के दोनों तरफ सावन में लगने वाली अस्थायी दुकानें, कांवड़ियों के लिए बने कैंप और प्रशासनिक लोगों के कैंप होते हैं.

स्थानीय आबादी से कांवड़ यात्रियों को कोई सीधा संपर्क ही नहीं रहता. इसलिए लड़ाई झगड़े की संभावना बहुत कम होती है. ट्रैफिक जाम से मुख्य मार्गों पर बड़े जाम भी नहीं लगते. उल्टा ज्यादा ग्रामीण परिवेश की वजह से लोग बड़े समूह में एक-दूसरे को सहयोग भी कर पाते हैं.

मुस्लिम बहुल आबादी वाला रूट

वैसे तो ये मुद्दा कानून- व्यवस्था के हिसाब से बड़ा नहीं है. लेकिन किसी भी समुदाय की भावनाओं को कोई ठेस न पहुंचे, इसके लिए इस कांवड़ यात्रा में इसको लेकर भी अतिरिक्त दबाव प्रशासन पर होता है.

दिल्ली-NCR से हरिद्वार तक के रूट में पड़ने वाले जिलों में ज्यादातर मुस्लिम बहुल आबादी वाले जिले भी हैं. मुज्जफनगर, सहारनपुर, मेरठ और गाजियाबाद जिसमें मुज्जफरनगर और सहारनपुर में मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत या उससे ज्यादा ही है. इन जिलों में हर बार एक अलग चैलेंज होता है कि रास्ते में पड़ने वाले किसी धार्मिक स्थान की सुरक्षा और सम्मान बना रहे. डीजे बजाने को लेकर विवाद न हो और न ही कोई सांप्रदायिक तनाव हो. कांवड़ यात्रा जैसी धार्मिक यात्रा में पुलिस के ऊपर इसका भी एक अतिरिक्त दबाव रहता है.

इसके ठीक उलट देवघर वाले रूट में ये चुनौती नहीं है. रास्ते में मुस्लिम बहुत कोई जिला नहीं है और न ही ऐसे किसी विवाद का पुलिस के ऊपर दबाव है. इसके साथ ही देवघर की कांवड़ यात्रा जहां से शुरू होती है यानि सुल्तानगंज , वहीं जिस उत्तरायणी गंगा घाट से जल भरा जाता है, ठीक उसी घाट पर एक बड़ी शाही मस्जिद है जिसको लेकर ये भी दावा किया जाता है कि पहले ये पार्वती माता का स्थान था. फिर भी यहां से जो कांवड़िये जल भरते हैं वो सीधे देवघर को रुख करते हैं और कभी कोई घटना नहीं होती.

यूपी में ज्यादा दिन की कांवड़ यात्रा

दूसरी तरफ पश्चिम यूपी में सावन में हर बार ऐसे अनेक उदाहरण भी मिलते हैं जब कांवड़ यात्रियों का स्वागत मुस्लिम समाज के लोग करते है और इस यात्रा से सामाजिक से समरसता का संदेश देते है.

एक और कारण है दिल्ली-NCR में प्रशासनिक प्रबंधन के सामने जो बड़ी चुनौती है वो है रूट प्रबंधन. यहां का रूट 4 से 10 दिन का होता है जबकि देवघर वाली कांवड़ यात्रा का रूट 3 दिन का होता है. साफ है एक तरफ कांवड़ यात्रियों के लिए भी ज्यादा थका देने वाला मार्ग दूसरी तरफ चौबीसों घंटे पुलिस पर ज्यादा दबाव यात्रा को शांति से कराने का होता है.

कांवड़ यात्रियों की संख्या में भी बड़ा अंतर

ये बड़े अंतर दोनों कांवड़ यात्राओं में प्रशासनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखने की चुनौती को स्पष्ट करते हैं. साफ है कि यूपी सरकार पर कहीं ज्यादा बड़ा दबाव होता है. हाल के दिनों में कांवड़ यात्रा करने वालों की संख्या में भी बड़ा अंतर आया है. 2019 में जहां 3.5 करोड़ कांवड़ यात्री हरिद्वार आए थे वहीं 2025 में ये संख्या करीब 4.5 करोड़ की थी.

वहीं देवघर में कांवड़ यात्रा में ये संख्या 50 लाख से 1 करोड़ तक की रहती है. ये अंतर ही बताने के लिए काफी है कि हरिद्वार कांवड़ मार्ग प्रबंधन का तनाव कितना ज्यादा है.

क्या यात्रा के स्वभाव में अंतर है

एक हद तक ये बात कही जा सकती है कि सामाजिक बनावट, संसाधन के अंतर, मार्ग के स्वरूप का अंतर दोनों कांवड़ यात्राओं की स्वभाव को थोड़ा बदल देता है . इसका प्रभाव भी साफ दिखता है. जैसे पश्चिम यूपी में डीजे का कल्चर. अमूमन देखा गया है कि यूपी वाले रूट से कांवड़ यात्रा में हाई साउंड के डीजे अक्सर शामिल किए जाते हैं जो कहीं-कहीं असहज स्थिति पैदा करते हैं.

इसको लेकर कानून और नियम तो हैं पर इस लंबे रूट में कई बार ये पुलिस प्रशासन की निगरानी या पकड़ से छूट जाते हैं जिसकी वजह से तनाव और मारपीट तक की घटनाएं हो जाती हैं. ठीक इसके उलट देवघर वाले रूट में ये डीजे कल्चर नहीं पाया जाता क्योंकि न तो इसके लिए रूट है और न ही पैदल होने वाली कांवड़ यात्रा में लोगों की इसमें रुचि. कच्चा कांवड़ मार्ग किसी भी गाड़ी के लिए प्रतिबंधित है तो बड़े गाड़ियें पर ऐसे डीजे ले जाने का कोई कल्चर नहीं संभव हो पाता.

दोनों में शहरी और ग्रामीण परिवेश का भी एक फर्क है जिसकी वजह से कई मामलों में देवघर में विवाद की घटनाओं में कमी पाई गई है. बहुत सघन आबादी वाले पश्चिम यूपी से लाखों की संख्या में वाहन इसमें शामिल होते हैं ऐसे में किसी टक्कर या लड़ाई झगड़े का संभावना बढ़ जाती है.

संसाधनों की अधिकता यहां होने वाली कांवड़ यात्रा में कई बार के प्रतियोगी प्रदर्शन का रूप ले लेती है और इस होड़ में भी कभी-कभी स्थिति बिगड़ जाती है. उधर बिहार झारखंड के ग्रामीण परिवेश ज्यादातर लोग सीमित संसाधनों के साथ इस यात्रा को पूरा करते हैं तो वहां होड़ बिना किसी विवाद के जल्दी अपनी इस भक्ति यात्रा को पूरा करने की होती है. इसलिए वाहन, झांकी, डीजे या किसी और तरह की चीज पर कम ही ध्यान या खर्च होता है.

एक राजनीति रूप से भी सवाल जरूर आता है कि क्या यूपी में योगी सरकार के आने के बाद से कांवड़ यात्रा का उत्साह बढ़ा है. बढ़ती संख्या को देखकर ये कहा जा सकता है. पर ये भी देखना जरूरी होगा कि योगी सरकार ने कांवड़ यात्रा को लेकर लगातार सुविधा बढ़ाने और प्रशासनिक प्रबंधन में काफी ज्यादा ध्यान दिया है. कांवड़ कैंप की सुविधा हो या नई सड़कों को निर्माण जिससे कांवड़ का रूट निकलता है या फिर कांवड़ यात्रियों से सम्मान में हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा या बार-बार खुद सीएम की तरफ से कांवड़ यात्रा को लेकर अपने बायनों में प्रतिबद्धता दिखाना.

ये सब कांवड़ यात्रियों को प्रेरित करता है. कई बार इन वजहों से अतिउत्साह में कुछ कांवड़ यात्री असहज स्थिति पैदा कर देते हैं. हाल की कुछ घटनाओं में पुलिस वालों के साथ भी कांवड़ियों की झड़प तक होने की खबरें भी सामने आई हैं.

कांवड़ यात्रा में मीडिया कवरेज का असर

इसके विपरीत देवघर में पहले के मुकाबले सुविधाओं में सुधार तो हुआ है. लेकिन परंपरागत तौर पर यात्रा को स्वरूप वही रहा है और बिहार तथा झारखंड की सरकारों का ज्यादा फोकस यात्रा में मौलिक स्वरूप की सुविधाजनक बनाए रखने पर ज्यादा रहा है.

तो इतना साफ है हिंसा की होने वाली घटनाओं को सिर्फ राजनीतिक और सामाजिक संस्कृति की दृष्टि से ही देखना सही उत्तर नहीं हो सकता. कई दूसरे बड़े अंतर और कारण हैं जिसकी वजह से इस मार्ग पर तनाव की स्थिति बन जाती है.

हरिद्वार मार्ग पर यात्रा को मीडिया कवरेज भी बहुत ज्यादा मिलता है जिसकी वजह से हर छोटी-बड़ी घटना राष्ट्रीय मीडिया तक कवर होती है और संज्ञान में आती है. जबकि देवघर कांवड़ मार्ग की खबरों की पहुंच राष्ट्रीय मीडिया तक नहीं होती जिसकी वजह से अगर कुछ घटनाएं होती भी हैं तो उनको समाचारों में वो जगह नहीं मिल पाती जितनी चर्चा दिल्ली-एनसीआर से होने वाली यात्रा की होती है.

कांवड़ यात्रा ने पौराणिक काल से आधुनिक काल तक अपनी यात्रा पूरी की है. भोले बाबा की भक्त अपनी आस्था के बल पर इस कठोर यात्रा को हर साल पूरा करते हैं. लेकिन कुछ घटनाओं की वजह से कई बार कुछ असहज स्थिति पैदा होती हैं जो इस यात्रा और शिव भक्ति के मूल भाव से मेल नहीं खाती. एक तरफ आस्था का सैलाब तो दूसरी तरफ एक लंबा, थकाऊ और चुनौती पूर्ण प्रबंधन. वास्तव में ये सिर्फ भक्तों की नहीं सरकार और प्रशासन के लिए भी तपस्या और एक परीक्षा समान है.

यूपी और बिहार-झारखंड की कांवड़ यात्रा से अलग-अलग तरह की तस्वीरें क्यों आती हैं?


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