UP News: चुनाव लड़ने वालों से संगठन छोड़ने को क्यों कह रहे हैं अखिलेश? अब तो इस्तीफे भी आने लगे – INA

समाजवादी पार्टी के लिए 2027 का चुनाव ‘डू ओर डाई’ वाला चुनाव है. सपा प्रमुख कोई भी पॉलिटिकल रिस्क लेने के मूड में नही हैं. अखिलेश यादव का ताजा फैसला कम से कम इसी ओर इशारा कर रहा है. समाजवादी पार्टी ने संगठन से जुड़े नेताओं के लिए अब ये फरमान जारी किया है कि अगर चुनाव लड़ना है तो संगठन से इस्तीफा दीजिए. रीबू श्रीवास्तव, मुनीन्द्र शुक्ला और बरेली के सपा अध्यक्ष शिवचरण कश्यप जैसे नेताओं ने इस पर अमल करते हुए चुनाव लड़ने के लिए संगठन से इस्तीफा भी दे दिया है. इस तरह मुजफ्फरपुर के जिला अध्यक्ष जिया चौधरी अखिलेश यादव मिलाकर चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर करते हुए इस्तीफे की पेशकश कर दी है.
हालांकि इस फैसले पर पार्टी की तरफ से कोई भी खुलकर बोलने से बच रहा है. लेकिन सपा सूत्रों का दावा है कि अखिलेश यादव के इस फैसले से संगठन में मजबूती बनी रहेगी. क्योंकि संगठन में रहकर अगर नेता चुनाव लड़ते हैं तो जिले में संगठन कमजोर होगा.
दूसरी बात ये है कि अपने दावेदारी के चक्कर में संगठन में गुटबाजी बढ़ेगी और इसके कारण जिले और प्रदेश दोनों जगहों पर संगठन असंतोष की भेंट चढ़ जाएगा. ऐसे में संगठन को मजबूत बनाए रखने और उसमें बेहतर समन्वयन बनाए रखने के लिए ये जरूरी है कि चुनाव लड़ने वाले संगठन से इस्तीफा दें.
फरमान के बाद सपा नेताओं का इस्तीफा
बिठूर से टिकट की दावेदारी करने वाले मुनीन्द्र शुक्ला 18 साल तक ग्रामीण जिला की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं, लेकिन जब उनको चुनाव लड़ना है तो पहले उन्होंने जिलाध्यक्ष के पद से इस्तीफा दिया.
समाजवादी महिला सभा की प्रदेश अध्यक्ष रहीं रीबू श्रीवास्तव ने भी अपना पद छोड़ दिया. उनको वाराणसी के कैंट से चुनाव लड़ना है.फिलहाल वो इसी विधानसभा की प्रभारी बनाई गई हैं. बरेली के जिलाव अध्यक्ष शिवचरण कश्यप इस्तीफा देकर बरेली की बिथरी चैनपुर विधानसभा से तैयारी कर रहे हैं, हालांकि उनके इस्तीफा के पीछे विवाद भी एक बड़ी है.
मुजफ्फरनगर के जिलाध्यक्ष जिया चौधरी ने भी मीरापुर से चुनाव लड़ने के लिए अध्यक्ष पद इस्तीफा देने की सपा प्रमुख से पेशकश करते हुए चुनाव लड़ने इच्छा जाहिर की. आने वाले दिनों में सपा प्रदेश से लेकर जिले संगठन तक कई और नेता इस्तीफा देकर विधानसभा चुनावी की तैयारी करते नजर आ सकते है.
लोकसभा चुनाव में भी अखिलेश ने किया था प्रयोग
हालांकि अखिलेश यादव ने ऐसा ही एक एक छोटा सा प्रयोग लोकसभा चुनाव में भी किया था. नरेश उत्तम पटेल को प्रदेश अध्यक्ष से इस्तीफा दिलवाकर लोकसभा का चुनाव लड़ाया था और नरेश उत्तम पटेल फतेहपुर से सांसद बने. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी का पूरा संगठन नरेश उत्तम पटेल को जिताने में जीजान से लगा था.फतेहपुर के उस चुनावी मॉडल को अखिलेश विधानसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर लेकर आ रहे हैं.
कुछ दिन पहले अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर एक बैठक की थी. बैठक में पार्टी के सभी बड़े और महत्वपूर्ण नेता मौजूद थे.उस बैठक में अखिलेश यादव ने सपा के जिलाध्यक्षों को चेतावनी दी थी और कहा था कि किसी को टिकट दिलाने का वे ठेका नहीं लें, यदि कोई शिकायत मिली तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने साथ में यह भी कहा था कि यदि कोई जिलाध्यक्ष चुनाव लड़ने का इच्छुक है तो वह पहले अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे और फिर अपनी मंशा के बारे में बताए. ऐसे मामलों पर विचार किया जाएगा. उसके बाद से पार्टी के अंदर सक्रियता तेजी से बढ़ी है.
सपा सूत्रों का दावा है कि समाजवादी पार्टी संगठन के पद पर रहते हुए किसी को भी चुनाव लड़ने की उम्र में नहीं है. हालांकि संगठन में रहते हुए अपनी टिकट की दावेदारी करेंगे तो जिले के नेताओं से तनाव उत्पन्न होगा.ऐसे में चुनाव के समय वोटरों में बिखराव होगा जो पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. 2022 के चुनाव में सपा कई ऐसी सीटें बहुत कम अंतर से हारी है. संगठन में सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो उन सीटों पर सपा जीत हासिल कर कर सकती है. अगर पार्टी में गुटबाजी हुई तो कई सीटे गवां भी सकती है. सपा का फोकस है कि संगठन में अगर गुटबाजी नहीं होगी तो सपा 2027 में सत्ता मे वापसी कर सकती है.
जानें अखिलेश के निर्देश की क्या वजह
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राजेंद्र कुमार ने टीवी 9 डिजिटल से बातचीत में कहा कि पूर्व के चुनावों से सबक लेते हुए अखिलेश यादव ने ये फैसला लिया है.समाजवादी पार्टी को इससे लाभ तो होगा लेकिन क्या इससे असंतोष खत्म हो जाएगा? ऐसा भी नही है. जो जिलाध्यक्ष या संगठन में कोई और नेता अगर चुनाव लड़ने का मन बना लिया है वो तो लड़ेगा ही. भले आप टिकट ना दें वो दूसरे विकल्पों पर विचार करेगा, लेकिन लड़ेगा. इसमें एक खतरा ये भी है कि अगर कोई जिलाध्यक्ष पद छोड़कर चुनाव लड़ता है और हार जाता है तो फिर दोनों जगह से गया.
लेकिन अखिलेश यादव की इस रणनीति से पार्टी को लाभ तो मिलेगा ही. ज्यादातर जिलाध्यक्ष टिकट दिलाने के जुगत को लेकर गुणा-गणित में लगे रहते हैं.स्थानीय सांसद से लेकर प्रदेश कार्यकारिणी तक के नेताओं को सेट करने में लगे रहते हैं. ऐसे नेताओं पर इस फैसले से लगाम लगेगी. इस फैसले का दूसरा बड़ा कारण मुझे जो लगता है वो है कांग्रेस को संदेश देना. समाजवादी पार्टी कांग्रेस को ये संदेश देना चाहती है कि हमारी तैयारी शुरू हो गई है और एक-एक सीट को लेकर हम गंभीर हैं.आगे चलकर यदि कांग्रेस और सपा में कोई गठबंधन होता भी है तो अखिलेश यादव के इस फैसले का असर उस गठबंधन पर भी दिखेगा.
सपा की 2027 की चुनाव पर नजर
सिर्फ पांच लाख वोटों का फर्क रहा है समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच. और अखिलेश यादव जानते हैं कि यदि संगठन में अंदरूनी कलह रूक जाए और बेहतर को-ऑर्डिनेशन के साथ वो 2027 के चुनाव में जाएं तो समाजवादी पार्टी यूपी में 2024 वाली सफलता दोहरा सकती है.
कुल मिलाकर देखा जाएं तो सपा ने 2027 की तैयारी के लिए अपना एजेंडा साफ कर दिया है.पार्टी और संगठन में जो लोग पदाधिकारी हैं और चुनाव भी लड़ना चाहते हैं. उनको पहले इस्तीफा देना होगा. उसके बाद विधानसभा में जाकर तैयारी करनी होगी. फिर टिकट पर विचार होगा. कुछ पदाधिकारी ने स्थिति देखकर विधानसभा में तैयारी शुरू कर दी है. माना जा रहा है कि इस बार अखिलेश यादव टिकट बंटवारे को लेकर कोई कंफ्यूजन नहीं चाहते है. बेहतर उम्मीदवार को ही टिकट मिले. साथ एक साथ दो पद ना हो इस बात का भी ध्यान रखने का फैसला किया गया है.
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चुनाव लड़ने वालों से संगठन छोड़ने को क्यों कह रहे हैं अखिलेश? अब तो इस्तीफे भी आने लगे
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