पीछे छूटा वो सादा बचपन: एक पुलिस ऑफिसर की डायरी से
साथियों बचपन की यादों को ताजा करते स्व-रचित लेख को एक बार समय निकालकर जरूर पढ़े।

यह बात सन 1986/87 के पास की रही होगी। कि जब मैं कक्षा 5 का छात्र रहा हूंगा। उस समय लोगों के घरों में टीवी नहीं थे। रेडियो भी किसी किसी के घरों में मिला कर भी होती थी। मेरा गांव एक बहुत बड़ा गांव है। जिसमें मुश्किल से उस समय कुल मिलाकर दो ब्लैक एंड व्हाइट टीवी हुआ करते थे ।वह भी जो गांव के एक बनिया एवं एक किसान को उनके पुत्र की शादी में दहेज में मिले थे।
⏩ उस समय हफ्ते में बुधवार और शुक्रवार को ही चित्रहार आया करता था। और रविवार को एक फिल्म आया करती थी। जिसे देखने के लिए मेरे मोहल्ले के लड़के और लड़कियां बेताबी से कई दिन इंतज़ार कर TV देखने के लिए उनके के घरों में जाते थे।मूवी के बीच मे कोई विज्ञापन नही आते थे। हालांकि उनके आंगन में ज्यादा भीड़ होने के कारण वह बाद आने वालों को एंट्री नहीं दी जाती थी। नीचे जमीन पर बैठकर ही चित्र देखने का लुप्त मिल जाना ही हमारे लिए किसी थियेटर में मूवी देखने से कम न था। जितना ब्लैक एंड व्हाइट टीवी को देखने में मिलता था उतना आनंद शायद G 3 सिनेमा देखने में नहीं मिल सकता। वह शटर वाला ब्लैक एंड व्हाइट टीवी आज भी मुझे अच्छी तरह याद है। उस समय मरफ़ी टेलीवस्टा अप ट्रान की TV कंपनी भारत में ज्यादा प्रचलित थी।
⏩ उसे जमाने में कोई भी विद्यार्थी प्रेस के कपड़े नहीं पहना करता था । न ही किसी के घर में प्रेस हुआ करती थी। बिजली का पंखा भी मुश्किल से होता था। कूलर व मोटर साइकिल होना तो मुश्किल था। पर आम तौर पर साइकिल हुआ करती थी। एवं हवा के नाम पर कई हैंड फैन (बिजना) हुआ करता है जिस पर एक फिल्मी गाना भी फिल्माया गया है। मेरा 9 डांडी का बीजना…..पहली बार मेरे गांव में एक अमीर व्यक्ति ने अपनी बेटी की शादी में हीरो होंडा दहेज में दी थी। जिसे देखने के लिय गांव की महिलाओं और पुरुषों में होड़ सी लगी थी ।और यह चर्चा आम हो गई थी । कि फला ने अपनी लड़की के लिऐ कितना दहेज दिया है।हालांकि हीरो होंडा मोटर साइकिल 1985 में भारत में आई थी।
⏩ कोयले की धुक चूक धुक चूक करने वाली ट्रेन में यात्रा करने का जो आनंद था ।अब वह रेल के प्रथम श्रेणी कंपार्टमेंट में अब दिखाई नहीं पड़ता।
⏩ नौनिहालों के गडुलने के सामने अब आधुनिक नौनिहालों की आधुनिक साइकिल भी फीकी पढ़ने लगी है।
⏩ जीवन में चीजों की कमी तो तो जरूर थी । लेकिन खुशियों का एहसास था। आज चीजें है लेकिन खुशियां नहीं है।सभी लोग। सभी मिलकर किसी भी त्यौहार को बड़े सादगी से मानते थे।लड़कों अथवा लड़कियों की कमीज अथवा सूट में बिना प्रेस के सलवटे पड़ी रहती थी। किशोर अवस्था मे भी लड़के लड़किया एक दूसरे के संग खेलते थे।
⏩ उसी को दूर करने के लिए मेरे द्वारा एक नया प्रयोग करने का प्रयास किया गया था।और मैं एक बेल्ला ( पीतल का खाने का बर्तन) में आग राखी और कमीज में पड़ी सिलवटो को उस बर्तन में लगी गर्म आग के माध्यम से सही करने की कोशिश कर रहा था । कि इसी दौरान मेरी बड़ी बहन का स्कूल की ड्रेस जल गई थी। जिस कारण मुझे बड़ी बहन की पिटाई भी झेलना पड़ी थी। इस प्रकार की वैज्ञानिक सोच भी हमारे अंदर कूट कूट कर भरी थी। मोबाइल,इंटरनेट फेस बुक मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया से बेखबर थे।🤩
⏩ दहेज में भी लोगों का घड़ी और साइकिल रेडियो और टीवी देना एक बड़ी बात थी । मोहल्ले में जो VCR चलता था ।उसे पूरी रात भर बैठकर एक रात में तीन फिल्मों तक देख देते थे । इस बीच कुछ मित्र मित्र झपकी भी मारते थे ।और जब दिन निकले आता था तभी VCR का पीछा छोड़ते थे। हालांकि उसे घर वालों की डांट भी सुननी पड़ती थी। घर वाले स्वय घटना स्थल पर हमे गाली देने आते थे। उस समय जीवा, सुहाग, कुली,शोले आज का अर्जुन, घर द्वार, चंद्रावल, आदि मूवी रिलीज हुआ करती थी। जब नवरात्रि के त्यौहार आते थे। घर मे बड़ा उमंग का माहौल होता था।
⏩ तो मेरी बड़ी बहन के और भाई सारे मिलकर माता का जगराता करने के लिए दूर से चिकनी मिट्टी लेने जाते थे। और खुद दुर्गा माता की तस्वीर बनाते थे। फिर उसमें रंग भर कर सजाते थे।और नवरात्रों में किसी बाल्टी या घर के बाहर बनी अलमारी में जौ के दाने बोते थे। और बहन बड़े ही प्यार से हमारे कानों पर उन जौ के पौधों को रखा करती थी। हालांकि हमारे पास बहन को देने के लिय कोई गिफ्ट नहीं होता था। यह अब सब परंपराएं विलुप्त हो चुकी है।
⏩ हमारे जनपद मुज़फ़्फ़र नगर के कांधला कस्बे में जब रामलीला हुआ थी । घर से मुश्किल से ही ₹ 40 रुपए मिला करते थे । जिस मात्र चाट पकौड़ी का ही काम मुश्किल से चलता था । और रामलीला स्थल पास होने के कारण पैदल या ना जाना हो जाता था। 6 किलोमीटर किलोमीटर आना जाना हमें उतना नहीं अखरता था। साठे के पेड़ से कलम बनाया करते थे । रोशनाई के लिए टिकिया घोलकर उसे दावत में डालकर पानी मिलाकर स्याही बनाते थे। लकड़ी की तख्ती भी काले रंग की होती थी। जो हमारे लिए कभी कभी हथियार का भी काम किया करती थी।
⏩ मां के द्वारा सुबह रोटी बनाने के बाद तवे के पृष्ठ भाग पर लगी कालस से हम तख्ती पोता करते थे । हालांकि उसमें हमारे कपड़े,हाथ और मुंह भी काला हो जाया करते थे।
⏩ लेकिन फिर भी जीवन बहुत ही सुंदर एवं सुहाना हुआ करता था। नहाने के लिए कोई साबुन नहीं हुआ करती थी। घरों में घर में लगी रस्सी पर स्कूल की ड्रेस डालकर बस्ता इधर उधर फेंक कर सुबह फिर सुबह स्कूल के समय मां से पूछना वास्तव में ही उन दिनों की हमारी बड़ी लापरवाही को साबित करता था।
⏩ स्कूल की फीस या चाहे जेब खर्च का मां से मांगना । लेकिन पिताजी से डरना आज भी याद आता है। कपड़े धोने के की काली साबुन से भी हम कई बार मुंह धो लिया करते थे। स्कूल में मास्टर तभी हमारा पीछा छोड़ता था जब तक की 1 से 100 तक की गिनती और पहाड़े पूरे ना करवाले।
⏩ कभी-कभी जब स्कूल बंक करना होता था । तो मास्टर की मां को फर्जी रूप से मरा घोषित कर देते थे और वापस घर चले आते थे। और पूरा दिन खेलना कूदना और नहर में तेरा की कर शाम को वापस घर आते थे। कई बार मास्टर साहब स्कूल से मेरी गिरफ्तारी क्लासमेट्स की कमांडो फोर्स भी भेजते थे। जो मुझे बल पूर्वक हाथ और पैर पकड़ कर ले जाती थी। और मेरी मां भी गिरफ्तारी की गवाह नहीं बनती थी। वह टीम कई बार मानवाधिकारों का वायलेशन भी करती थी। क्यूँकि वह हमे कुटती थी। अफसोस उस टीम शिक्षा के महत्व का कुछ भी मालूम नहीं था।
⏩ अपने खेतों के गन्ने तोड़ने के बजाय दूसरे के खेतों से गन्ने तोड़कर चूसने वह जामुन आम बेल बेरी के पेड़ पर पत्थर मारकर फल तोड़कर खाने में जो असीम आनंद था । वह आज फल दुकानों से अलग खरीदने में नहीं मिलता।
⏩ कभी-कभी प्राइमरी स्कूल में जब हमारे पास घोटा भट्टा स्लेटी नामक लेखन सामग्री नहीं होती थी। तो हम किसी भी अखबार का या फिल्मी हीरोइन का एक सुंदर चित्र ले आते थे ।और क्लास में क्लास मेट्स को दिखाया करते थे। कि खड़िया में खेल खड़िया में खेल की उद्घोषणा किया करते थे। इस प्रकार हमें कुछ लेखन सामग्री मिल जाया करती थी।
⏩ लेकिन आज लोग लाखों रुपए वैध अवैध रूप से कमाकर भी संतुष्ट नहीं है। और ही वह खुशी उनके चेहरे पर दिखाई देती।कुछ तो ऐसे लोग है । जो थाना प्रभारी बने है,पैसे के पीछे पागल है। यदि उन्हे रोज पैसे ना मिले तो उनकी अकाल मृत्यु भी संभव है।
⏩ घर में कोई पंखा या कोई टीवी नहीं होता था। सिर्फ और बिजली का पंखा नहीं हुआ करता था । लैंप जलाकर या फिर डिबिया लालटैन से पढ़ना पड़ता था। कोई गुड नाइट या मच्छर भगाने की मार्टिन नहीं हुआ करती थी। सभी लोग घर के बाहर ही पेड़ के नीचे सोया करते थे। सुबह की धूप पड़ने पर स्वयं ही आंख खुल जा करती थी।
⏩ उसे जमाने में फिल्मी हीरो मिथुन की तरह लम्बे बाल रखने और फिल्म देखने का युवाओं में विशेष शौक हुआ करता था। और युवा कागज कलम दवात ला…मेरी छतरी के नीचे आजा क्यूँ कमला खड़ी खड़ी जैसे गाने सुनकर युवा मंत्र मुग्ध होते थे। उसे समय लोगों में सादगी हुआ करती थी । छल कपट और बेईमानी दूर तक नहीं थी।
⏩ कॉमिक्स चंचल चंपक सत्य कथा आदि जैसी मासिक पत्रिकाएं एवम् कानून मेरी मुट्ठी मे जैसे उपन्यास हमे पढ़ने में जो आनंद मिलता था। वह आनंद आज कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता
⏩ घर में सिर्फ 24 इंची ही साइकिल हुआ करती थी। जिसे हम कैंची से चलाने में ऐसा महसूस करते थे । लेकिन आज इतना तो हम ब्रिजा बालिनो, स्विफ्ट वैन्यू, क्रेटा थार, पंच,चलाने में इतना आनंद महसूस नहीं करते। उतना उस साइकिल को चलाने में महसूस करते थे।
⏩ उड़द अथवा सरसों की फसल को भी बैलों के सहारे रौंद कर अलग किया करते थे । मक्के के भुट्टे को सामूहिक रखकर पकने का इंतजार करते थे। घर में सब्जी ना हो तो मट्ठा या फिर दूध के साथ रोटी खाकर अपना दिन गुजार लेते थे।
⏩ गेंद या फूटबॉल खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे ।इसलिए पुराने कपड़े लपेटकर उसमें सुई से धागे की जाली बनाकर गेंद बनाने की हमें विशेष महारत हासिल थी।
⏩ मुड़े हुए नीम के पेड़ से हम हॉकी बनाने की काष्ठ कला में भी हम निपुण हुआ करते थे। तैरने की कला भी हमने तालाब में भैंस की पूछ पकड़ कर सीखी थी।
⏩ आज की तरह हम रोज-रोज नहीं नहाते थे। बल्कि मौका मिलने पर जैसे नदी नहर ट्यूबवेल राजवाहे में कभी-कभी दिन में तीन से चार बार भी नहा लिया करते थे।
⏩ उस समय आज की तरह आधुनिक शैलून नहीं थे। बल्कि नई खुद ही घर पर आकर बाल काट कर गंजा कर देता था ।और नीचे जमीन पर बैठकर ऐसी चलाता था । जैसे किसान खेत मे हल चलाता है। जब स्कूल मेट आपकी खोपडी मे अंगुली से चोट मारते थे। बाल कटिंग में नाई द्वारा हुई त्रुटि के कारण सर मे पड़ी बिलाई हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था।
⏩ लड़कियों लड़कियों अक्सर साथ खेला करते थे। उन खेलों में कुआं डंडा दाई मिचोना कबड्डी खो खो क्रिकेट और कपड़े वाली गेंदबाजी गिल्ली डंडा माचिस के तास और लड़कियों के लिऐ कंकड़ गेंद वाला खेल प्रमुख हुआ करते थे। उस समय कोई भी लड़की जींस और टॉप नहीं पहना करती थी।
⏩ उस समय मैरिज होम नहीं होते थे। बारात भी एक अथवा अधिक दिन रुकती थी।गांव में विवाह या शादी के समय मोहल्ले से खाट मांग कर इकट्ठी करने का प्रचलन था । जिस पर काले पेट से मल्लू की खाट,मांगे की खाट,और रामफूल खाट लिखने में जो आनंद आता था। इतना आनंद तो अब घटनास्थल का नक्शा नजरी बनाने में नहीं आता। 🤩
⏩ शादियों में सालियों के द्वारा शीशे रुमाल कंघे लोकल पर्स आदि छोटे-छोटे गिफ्ट देने में जो आनंद था। इतना अब अब महंगे गिफ्ट मिलने में नहीं आता। बारात मे भी युवा एवम् युवती एक दूसरे को दूर से देखकर प्रेम का ईजहार किया करते थे।
⏩ तितलियों को पकड़ना मधुमक्खी और वीडियो के चट्टे में पत्थर मारने में जो आनंद मिलता था वह अब एनकाउंटर में भी नहीं मिलता। बरसात के मौसम में गांव में जब लगातार बारिश की झड़ी चला करती थी। मेंढक टर्र -टर बोला करते थे। और घरों में आज की तरह आधुनिक किचन या टॉयलेट नहीं हुआ करते थे। बारिश में मेंढकों को कंकड़ मारने कागज की नाव बनाकर उसमें यात्री के रूप में चैटा बैठाना, कागज का जहाज उड़ाना, और आम के पौधे से एक विशेष संगीत यंत्र बनाना में जो आनंद प्राप्त होता था, शायद वह आनंद कहीं नहीं मिलता।आज भी हमें यान और विशेष संगीत यंत्र बनाने की कल हमें आती है।
⏩ ट्रेन के नीचे पटरी पर पांच का सिक्का 05 या 10 का सिक्के रखकर उठाकर देखने मैं भी सिक्के के आकार को देखने में हमें बड़ा आनंद आता था।
⏩ पढ़ाई को हम बोझ समझा करते थे। और अक्सर मां और बाप को कोसा करते थे, कि घर वाले हर वक्त हमारे पीछे पड़े रहते हैं। कि पढ़ लो पढ़ लो बड़े आदमी बन जाओगे। लेकिन उनकी बात हमें कभी समझ नहीं आती थी। अफसोस आज समझ आई है। लेकिन अब वक्त गुजर चुका है।
⏩ कभी भी किसी लड़की के घर से बाहर भाग जाने की सूचनाओं नहीं मिला करती थी।
हाँ,कभी कभी एक दो युवाओ की चिट्ठी (प्रेम पत्र) जरूर पकड़ जाती थी। उसका ईलाज भी ढंग से हुआ करता था। बड़े बुजुर्गो का अदब और लिहाज हुआ करता था। गावं मे प्रधान की बहुत इज्जत हुआ करती थी।
⏩ गांव में युवाओं के लिए कैरियर के नाम पर सिर्फ सरकारी मास्टर फौज या पुलिस में सिपाही बनने की प्रथम वरीयता हुआ करती थी। गांव के स्टूडेंट्स के लिए सिर्फ दरोगा ही अंतिम सबसे बड़ा पद हुआ करता था । डीएसपी SDM जज और आईपीएस आईएएस तक किसी की भी सोच नहीं हुआ करती थी। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उनके सपनों की दुनिया से बाहर थी।
⏩ फौजी अक्सर अपनी युवा पत्नियो को अक्सर चिट्ठी लिखा करते थे। उस जमाने में किसी ने मोबाइल फोन की कल्पना भी नहीं की थी। नीला अंतर्देशीय पत्र बैरंग और पीला लिफाफा और पोस्ट कार्ड का ही जमाना हुआ करता था। अक्सर फ़ौजी नव वधु को बहुत सारे अंतर्देशीय पत्र गिफ्ट कर जाते थे। साधारण खुला पत्र पोस्ट कार्ड मात्र 10 पैसे का आता था। जिसमें शोक संदेश भेजने के लिये उसका एक कोना काटा जाता था।
⏩ कई बार मुझे मोहल्ले की युवा चाचियां मेरे घर पर मां से कहती थी। कि भाभी जरा *के.पी.सिंह* को भेज दे कुछ काम है। हालांकि वह काम मुझे नहीं मालूम होता था। चाची मुझसे फौजी चाचा द्वारा लिखी गई मन की व्यथा अक्सर पढ़वाया करती थी। और फिर उसका जवाब में अपने मन के भाव एवं विरह के शब्दों का भी समायोजन कराती थी। हालांकि उस समय मुझे उन विरह रूपी भवनात्मक शब्दों का कुछ अर्थ मालूम नहीं था। क्यूंकि उस लडकियों को पढ़ाने का रिवाज बहुत कम था। इस लिए लड़कियां बहुत कम पढ़ती थी। उसकी योग्यता का आंकलन शिक्षा से नही बल्कि भौतिक सुन्दरता से लगाया जाता था। घर के चूल्हे चौके तक सीमित रखने की पुरातन अधिकतर सोच हुआ करती थी। लड़कियों के जन्म पर खुशी नही बल्कि अच्छा नही माना जाता था।
⏩ आज की 21 वी सदी मे भी गांव में पढ़े-लिखे विद्यार्थियों में इतनी जागरुकता नहीं है। जितना की शहरों में बच्चे और उनके माता पिता जागरुकता है। जब मैं एक आरटीसी में महिला रिक्रूटो को पढ़ाया करता था। तो 400 रिक्रूट मात्र मुश्किल से 15/20 12 वीं पास थी। बाकी सभी ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट थी।
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लेखक पुलिस विभाग मे सब इंस्पेक्टर के रूप मे कार्यरत है✍️