हादसे के वक्त दरोगा का सब्जी खरीदने का कोई इरादा नहीं था, बल्कि किस्मत उन्हें खींचकर उस मौत के मुहाने तक ले आई। पुलिस सूत्रों के अनुसार, जब दरोगा श्रवण कुमार मडराक थाने से अलीगढ़ की तरफ रवाना हुए थे, तब उन्होंने अपने साथियों से कहा था कि वे रास्ते में किसी होटल पर खाना खा लेंगे।
वीरपाल की दुकान पर रुकने का कोई प्लान नहीं था। जब वे अपनी बाइक से गुजर रहे थे, तो दुकान पर ताजी हरी सब्जियां रखी हुई देखकर अचानक उनका मन बदल गया। उन्होंने अपनी बाइक रोकी और सब्जी खरीदने के लिए वीरपाल की दुकान की तरफ बढ़ गए। प्रत्यक्षदर्शियों से मिली जानकारी के मुताबिक, दरोगा ने दुकान पर पहुंचकर कुछ सब्जियों के दाम पूछे। मोलभाव के दौरान यह कहते हुए वापस अपनी बाइक की तरफ लौटने लगे कि दाम ज्यादा हैं।
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तभी सब्जी विक्रेता वीरपाल ने उनसे कहा, जो चाहे दे देना, जो पसंद हो ले जाइए। वीरपाल की इस बात ने दरोगा को दोबारा रोक लिया और वे एक बार फिर मुड़कर सब्जी छांटने लगे। यदि दरोगा ने अपना इरादा नहीं बदला होता या वे वीरपाल की बात पर वापस न लौटकर अपनी बाइक से सीधे अलीगढ़ की ओर निकल जाते, तो शायद आज वे इस हादसे का शिकार होने से बच जाते। उनका वह चंद मिनटों का रुकना उनके जीवन का अंतिम पल साबित हुआ।