शिवसेना के भविष्य से पहले अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला हो:उद्धव गुट की सुप्रीम कोर्ट से अपील; चुनाव आयोग के आदेश को चुनौती दी है- INA NEWS

उद्धव ठाकरे गुट ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि शिवसेना का फैसला विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय के बाद होना चाहिए। उद्धव गुट का कहना है कि पहले यह तय हो कि बागी विधायक अयोग्य हैं या नहीं, इसके बाद चुनाव आयोग यह तय करे कि असली राजनीतिक पार्टी कौन-सा गुट है। यह दलील एडवोके कपिल सिब्बल ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने दी। बेंच उद्धव गुट की याचिकाओं पर छठे दिन दलीलें सुन रही थी। जिनमें चुनाव आयोग के एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना मानने और पार्टी का नाम और धनुष-बाण निशान देने के फैसले को चुनौती दी गई है। विधायकों की अयोग्यता पर फैसला पहले लेने की अपील सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग और महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष ने कानून को गलत तरीके से समझा। उन्होंने विधायकों की संख्या में बहुमत को ही राजनीतिक पार्टी मान लिया, जबकि दोनों अलग चीजें हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को यह तय करना चाहिए कि असली पार्टी कौन-सी है, लेकिन यह फैसला बागी विधायकों के खिलाफ चल रही अयोग्यता की कार्यवाही पूरी होने के बाद ही होना चाहिए। सिब्बल ने कहा, “अगर इन विधायकों को आखिर में अयोग्य ठहराया जाता है, तो विधानसभा में उनकी संख्या को नहीं गिना जाना चाहिए।” 39 विधायकों को अयोग्यता के नोटिस सिब्बल ने कहा कि अयोग्यता का सामना कर रहे बागी विधायकों की संख्या पहले 16 थी। बाद में यह 22 और आखिर में 39 हो गई। इन विधायकों पर अलग-अलग उल्लंघनों के आरोप थे। इनमें विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव और उसके बाद हुए विश्वास प्रस्ताव के दौरान पार्टी व्हिप का पालन नहीं करना भी शामिल था। 10 जनवरी 2024 के फैसले पर सवाल सिब्बल ने विधानसभा अध्यक्ष के 10 जनवरी 2024 के फैसले पर सवाल उठाया। अध्यक्ष ने अयोग्यता याचिकाएं खारिज कर दी थीं और विधानसभा में बहुमत के आधार पर शिंदे गुट को असली शिवसेना माना था। सिब्बल ने कहा कि अध्यक्ष ने शिवसेना के 2018 के नेतृत्व ढांचे को नजरअंदाज करके अपने अधिकार से बाहर जाकर फैसला किया। अध्यक्ष ने कहा था कि 2018 का पार्टी संविधान शिवसेना के वास्तविक ढांचे के अनुरूप नहीं था। सिब्बल ने इस दावे को संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत कानूनी आधार के बिना बताया। उन्होंने अध्यक्ष के इस निष्कर्ष पर भी सवाल उठाया कि पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे की इच्छा को पार्टी की इच्छा नहीं माना जा सकता। सिब्बल ने कहा, “यह माना गया है कि उद्धव पक्षप्रमुख हैं। उन्होंने उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। अब अध्यक्ष यह कैसे कह सकते हैं कि उन्हें मान्यता देने की जरूरत नहीं है?” विधायी दल में बंटवारा और राजनीतिक दल अलग सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के सुभाष देसाई मामले के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि विधायी दल में बंटवारे का मतलब अपने आप राजनीतिक दल में बंटवारा नहीं होता। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष ने विधानसभा में बहुमत को एकमात्र आधार बनाकर शिवसेना के संगठनात्मक पक्ष को नजरअंदाज किया। 13 अगस्त को भी उद्धव गुट ने कहा था कि संविधान के प्रावधानों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे उस “गलती” को बढ़ावा मिले जिसे रोकने के लिए दलबदल विरोधी कानून बनाया गया है। बेंच 2024 में दायर उद्धव गुट की दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं में चुनाव आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें धनुष-बाण निशान शिंदे गुट को दिया गया था। याचिकाओं में चुनाव आयोग के 17 फरवरी 2023 के उस आदेश को भी चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट को मूल शिवसेना माना गया था। मंगलवार को हुई सुनवाई में दलीलें पूरी नहीं हो सकीं। अब इस मामले पर बुधवार को फिर सुनवाई होगी।
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