देश- 136 साल पुरानी मस्जिद में आज भी लगती हैं मजसिलें… इराकी कारीगरों की नक्काशी की गई आयतों के लिए मशहूर- #NA
पटना की ऐतिहासिक मस्जिद
पटना में ऐतिहासिक स्थलों की कमी नहीं है. यहां कदम-कदम पर अनेक ऐतिहासिक स्थल हैं. इनमें कुछ वक्त की मार नहीं झेल सके तो कुछ सरकारी उदासीनता के शिकार हो गए. लेकिन इनमें कुछ ऐसे भी एतिहासिक स्थल हैं, जो आज भी बुलंद हैं और गुजरे जमाने की यादों को समेटे हुए हैं. इनमें से ही एक है पटना सिटी इलाके का मीर फ़रहत हुसैन इमामबाड़ा और मस्जिद. इस मस्जिद में पिछले 136 सालों से मुहर्रम और चेहल्लुम में मजलिसें लगती आ रही हैं.
हज से वापस आने के बाद बना
राजधानी के सिटी इलाके में लाल इमली क्षेत्र के फ़िरदौज़ मंज़िल में स्थित इस ऐतिहासिक मस्जिद और इमामबाडे के बारे में जानकारी देते हुए वर्तमान में मुशर्रफ हुसैन बताते हैं कि उनके परदादा सन् 1881 के पहले हज यात्रा पर गये थे. वहां से जब वह 1881 में वापस अपनी सरजमीं पर आये तो इसका निर्माण किया. ये पूरी इमारत सुर्खी पर बनी हुई है. सालों बाद जब इसके ढांचे पर वक्त की मार का असर होने लगा तो 34 साल पहले 1990 में इसका पुनर्निर्माण कराया गया. इमारत की छत पहले लकड़ी की कड़ी और सुर्ख़ी पर बनी हुई थी. पुनर्निर्माण में उसे हटाकर ढलाई कराया गया.
इराकी कारीगरों ने की नक्काशी
मुशर्रफ हुसैन बताते हैं मस्जिद की दीवार और ऊपरी हिस्से में अरबी और फारसी भाषा में कुरान की आयतें लिखी गयी हैं, साथ ही इसके दीवारों पर तोग़रा (नक़्क़ाशी) की गयी है. इन सभी को तब विशेष रूप से इराक से आये कारीगरों ने उकेरा था. जो अभी तक सही सलामत है. जब इसका पुनर्निर्माण हो रहा था तब यह बात भी सामने आयी कि कहीं इन तोग़रा (नक़्क़ाशी) पर असर न पड जाए. जिसकी वजह से ये फ़ैसला लिया गया कि दीवार वही पुरानी रहेगी और सिर्फ़ छत ढाल दी जाएगी. मुशर्रफ़ हुसैन कहते हैं, वह पूरी शिद्दत से इसकी देख रेख खुद करते हैं. यह हमारी पुरानी विरासत है. कोशिश यही रहती है कि इस विरासत की देख रेख में कोई कमी न रह जाए.
1888 से लगातार जारी हैं मजलिसें
मुशर्रफ हुसैन बताते हैं पहली बार यहां 1888 में मुहर्रम के मौके पर मजलिस लगी थी. तब से लेकर अब तक मजलिसों का लगना लगातार जारी है. इतने सालों से बिना किसी साल रूके लगातार मजलिसें लगती हैं. यहां तक कि जब अपने देश में कोविड का दौर था तब भी चेहरे पर मास्क को लगा कर और सोशल डिस्टेंसिंग के साथ कोविड के नियमों का पालन करते हुए मजलिस जारी रहती थी.
कभी दफन होते थे ताजिये के फूल
मुशर्रफ हुसैन कहते हैं, एक दौर था जब इस इमामबाडे और मस्जिद में इलाके के ताजिये आते थे और यहां पर उनके पाक फूलों को दफन किया जाता था लेकिन धीरे धीरे अब वह दौर खत्म हो गया. अब न ताजिया आते हैं और नहीं अब फूल दफन होते हैं लेकिन आज भी यह मस्जिद और इमामबाड़ा पूरी रौनक के साथ कायम है. हां, यह जरूर है कि यहां मुहर्रम की एक से नौ तक मजलिस लगती है.
Copyright Disclaimer :- Under Section 107 of the Copyright Act 1976, allowance is made for “fair use” for purposes such as criticism, comment, news reporting, teaching, scholarship, and research. Fair use is a use permitted by copyright statute that might otherwise be infringing., educational or personal use tips the balance in favor of fair use.
यह पोस्ट सबसे पहले टीवी नाइन हिंदी डॉट कॉम पर प्रकाशित हुआ , हमने टीवी नाइन हिंदी डॉट कॉम के सोंजन्य से आरएसएस फीड से इसको रिपब्लिश करा है, साथ में टीवी नाइन हिंदी डॉट कॉम का सोर्स लिंक दिया जा रहा है आप चाहें तो सोर्स लिंक से भी आर्टिकल पढ़ सकतें हैं
The post appeared first on टीवी नाइन हिंदी डॉट कॉम Source link