खबर शहर , UP: मोबाइल ने बहुत कुछ छीन लिया, क्या याद हैं आपको सावन के झूले? अब न रहे वो गीत; सूनी पड़ी पेड़ों की डालियां – INA

आधुनिकता की अंधी दौड़ और मोबाइल के बढ़ते चलन के कारण अब परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं। गांवों की गली-गली में सावन का एहसास कराने वाले झूले अब नदारद हैं। मोबाइल के . बच्चों में भी झूलों के लिए उत्सुकता नहीं है। अब सिर्फ बुजुर्गों की स्मृतियों में परंपराओं के अवशेष बचे हैं।
एत्मादपुर क्षेत्र के कुबेरपुर, रहनकला, रायपुर, सुरहरा, छिरवाई गारापुर और नगला गंगाराम जैसे गांवों में झूले नजर नहीं आते। जिन बाग-बगीचों में कभी सावन के गीतों की गूंज रहती थी। वहां अब सन्नाटा पसरा है। पेड़ों की डालियां सूनी हैं। दो दशक पहले तक सावन आते ही महिलाएं मायके आ जातीं थीं और सहेलियों के साथ मिलकर झूले डालती थीं। पीपल, नीम और बरगद के पेड़ों पर दिनभर लोग झूला झूलते थे। संवाद
महिलाओं ने जताई चिंता
– सुरहरा ग्राम प्रधान लौंगश्री देवी का कहना है कि पहले सावन में हर ओर गीत गूंजते थे। अब बच्चे-महिलाएं सब फोन में लगे रहते हैं। किसी को परंपराओं की चिंता नहीं है।
– भाजपा नेता स्वदेश बघेल का कहना है कि परंपराओं को बचाना हम सब की जिम्मेदारी है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी इन्हें सिर्फ किताबों में ही पढ़ेगी।
– रहनकलां ग्राम प्रधान हेमलता निषाद ने बताया कि मैं सहेलियों संग सावन की मल्हार और झूलों का खूब आनंद लेती थी। अब लोगों में मेल-जोल काफी कम हो गया है।
– एएनएम संगीता यादव का कहना है कि संयुक्त परिवारों का टूटना, शहरों की ओर पलायन और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई भी परंपराओं के खत्म होने की बड़ी वजह है।
समाज से जोड़े रखती हैं परंपराएं
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. मोहम्मद अरशद ने कहा कि छोटे-छोटे त्योहार हमारी परंपराओं को . बढ़ाते हैं। इससे समाज एक-दूसरे से जुड़ा रहता है। आने वाले पीढ़ी को त्योहारों के माध्यम से ही हम अपनी परंपराओं से जोड़ सकते हैं। झूले जैसी गतिविधियां शारीरिक विकास में भी मददगार होती हैं।