खबर शहर , विश्व जैव विविधता दिवसः बाह के बीहड़ में टहल रहे तेंदुए और नदी में मिला घड़ियाल, चंबल बन रहा ईको टूरिज्म हब – INA

चंबल के जिस इलाके में डकैतों की दहशत रहती थी, वह इलाका ईको सेंसिटिव जोन के रूप में उभर रहा है। राजस्थान के जिस इलाके से बाह की सीमा में डकैत प्रवेश करते थे, उस इलाके में काले और चितकबरे हिरन कुलांचे भरते हुए दिखते हैं। इटावा से आने वाले डकैतों के बाह के इलाके में नदी किनारे सांभर टहलते हुए दिखते हैं। पूरी रेंज में तेंदुए की चहल कदमी भी किसी रोमांच से कम नहीं है। बाह रेंज का बीहड़ ही नहीं, चंबल नदी की भी जैव विविधता अनूठी है।
चंबल नदी ने दुनिया में दुर्लभ हुए घड़ियाल एवं इंडियन स्कीमर को नया जीवन दिया है। दुनिया की 80 फीसदी आबादी भी चंबल नदी में है। डकैतों की पनाहगार रही चंबल की अनूठी जैव विविधता का रोमांच पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है। यही बजह है कि वन विभाग ईको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए ऊंट सफारी से लेकर टेंट सिटी जैसी योजनाओं के प्रस्ताव पर अमल कर रहा है।
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चंबल – फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
वन विभाग के पिछले साल बाह और इटावा में हुए सर्वे में 43 तेंदुए, 67 सांभर, 117 चीतल, 128 कस्तूरी बिलाव (सिवेट), 235 विष खापर (मॉनीटर लिजार्ड), 83 जंगली बिल्ली, 1210 सियार, 141 लकड़ बग्घा, 171 सेही मिली थी। जबकि तीन राज्यों में होकर बहने वाली चंबल नदी में 2938 घड़ियाल, 1512 मगरमच्छ, 155 डॉल्फिन, 843 इंडियन स्कीमर मिली थी। घड़ियालों के लुप्तप्राय स्थिति में पहुंचने पर चंबल नदी में 1981 में संरक्षण का काम शुरू हुआ, तब नदी में महज 45 घड़ियाल थे। 5 अक्तूबर 2009 में शुरू हुए डॉल्फिन के संरक्षण के परिणाम भी सुखद रहे हैं, जबकि जरार में हुए बर्ड फेस्टिबल 2015 के बाद दुनिया में दुर्लभ हुई इंडियन स्कीमर का संरक्षण शुरू हुआ, कुनबा 843 हो गया है।