अंडों के भीतर विकसित हुए नन्हें कछुए बाहर आने के लिए हलचल (सरसराहट की आवाज) करते हैं, जिसे मदरकॉल कहा जाता है। मदरकॉल पर मादा कछुआ नेस्ट तक पहुंच जाती है, अपने पंजों से नेस्ट की बालू को हटाती है और अपने बच्चों को दुनिया में आने का रास्ता देती है। चंबल नदी के नंदगवा घाट पर हैचिंग में जन्मे ढोर और साल प्रजाति के कछुओं के 345 और पिनाहट घाट पर 100 बच्चे नदी में छोड़े गए हैं।
बाह के रेंजर कुलदीप सहाय पंकज ने बताया कि फरवरी-मार्च में मादा कछुआ नदी किनारे की बालू में करीब एक फुट गहरा गड्ढा अपने पंजों से खोद कर 10 से 30 अंडे देती है। कछुओं के पदचिह्न से वन विभाग की टीम नेस्ट की पहचान एवं जीपीएस से लोकेशन लेकर जंगली जानवरों से अंडों को बचाने के लिए लोहे की जाली लगा देती है। हैचिंग पीरियड शुरू होते ही मादा मदरकॉल पर नेस्ट के आसपास मंडराने लगती है तो जाली हटा दी जाती है।
चंबल नदी के नंदगवा घाट पर हैचिंग में जन्मे ढोर और साल प्रजाति के कछुओं के 345 और पिनाहट घाट पर 100 बच्चे नदी में छोड़े गए हैं। अब तक करीब 2 हजार बच्चे चंबल नदी की गोद में पहुंच गए हैं। बता दें कि कछुओं की साल प्रजाति सिर्फ चंबल नदी में बची है। ढोर प्रजाति की 98 प्रतिशत आबादी चंबल नदी में है। जबकि दो फीसदी आबादी गंगा और यमुना में है। कछुओं की दुर्लभ प्रजातियों से चंबल नदी समृद्ध है।