राम रहीम फिर जेल से बाहर,जुगाड़ की सत्ता और बेबस कानून: एक ‘खास’ कैदी की सुविधाजनक जेल यात्राओं का अंतहीन सिलसिला?

मोहम्मद शाहिद की कलम से: ​जब किसी देश का न्यायतंत्र और उसकी प्रशासनिक व्यवस्थाएं एक आम नागरिक और एक रसूखदार के बीच खुलेआम भेदभाव करने लगें, तो वह केवल एक व्यवस्था की विफलता नहीं होती, बल्कि पूरे लोकतंत्र के माथे पर एक गहरा और स्याह कलंक होता है। यह एक ऐसी विडंबना है जहाँ न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी केवल गरीबों और कमजोरों के लिए होती है, जबकि सत्ता और रसूख के सामने वह पट्टी अपने आप खिसक जाती है। यह कहानी किसी सामान्य मुजरिम की नहीं है। यह कहानी उस व्यक्ति की है जिस पर बलात्कार और हत्या की साजिश जैसे जघन्य आरोप सिद्ध हुए, जिसके जेल जाने पर पूरे राज्य में हिंसा की ऐसी आग भड़की जिसमें दर्जनों लोगों की जानें चली गईं, लेकिन जेल की वे दीवारें, जो आम कैदियों के लिए पत्थर की तरह सख्त होती हैं, इस खास कैदी के लिए मोम की तरह पिघलती नजर आती हैं। बात डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम की हो रही है, जिसके लिए जेल की सजा ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई असुविधाजनक ‘हॉलिडे पैकेज’ हो, जिसमें जब चाहे, सुविधा और राजनीतिक मौसम के अनुसार, बाहर आकर ‘पिकनिक’ मनाई जा सकती है। यह पूरा परिदृश्य इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि भारत में कानून का राज किस तरह पैसे, पावर और वोट बैंक की राजनीति के सामने नतमस्तक हो चुका है।

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​जुगाड़ की संस्कृति अगर किसी को समझनी हो, तो राम रहीम का मामला इसका सबसे सटीक और खौफनाक उदाहरण है। यह तथ्य किसी भी कानून-पसंद नागरिक के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है कि यह मुजरिम तीन से चार महीने से ज्यादा जेल के अंदर लगातार टिकता ही नहीं है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों और दस्तावेजों का अगर बारीकी से अध्ययन किया जाए, तो जेल से बाहर आने का एक ऐसा व्यवस्थित और निर्लज्ज पैटर्न दिखाई देता है जो व्यवस्था की पूरी कार्यप्रणाली पर ही सवालिया निशान लगा देता है। यह व्यक्ति अब तक 16 बार से ज्यादा पैरोल या फरलो के नाम पर खुली हवा में सांस लेने बाहर आ चुका है । एक ऐसे समय में जब देश भर की जेलों में लाखों विचाराधीन कैदी बिना सुनवाई के वर्षों से सड़ रहे हैं, एक सजायाफ्ता मुजरिम का यह ‘वीआईपी ट्रीटमेंट’ न्याय व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा तमाचा है।

​रिहाई के इस अंतहीन सिलसिले की तारीखों पर अगर एक नजर डाली जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कानून किस तरह अपनी ही बनाई गई खामियों का इस्तेमाल रसूखदारों को फायदा पहुंचाने के लिए करता है। इस खेल की शुरुआत बहुत ही दबे पांव हुई थी। अक्टूबर 2020 में महज 1 दिन के लिए उसे पैरोल मिली। इसके बाद मई 2021 में फिर से 1 दिन के लिए उसे बाहर आने की अनुमति दी गई । उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह एक बहुत बड़े सिलसिले की महज एक छोटी सी शुरुआत है। जैसे ही राजनीतिक और प्रशासनिक जमीन तैयार हुई, जेल के दरवाजे पूरी तरह से खोल दिए गए। फरवरी 2022 में उसे सीधे 21 दिनों की मोहलत मिली, फिर कुछ ही महीनों बाद जून 2022 में 30 दिन और अक्टूबर 2022 में 40 दिन के लिए वह शान से बाहर आया । यह कोई संयोग नहीं था कि जब वह बाहर आता था, तो बाहर का राजनीतिक माहौल भी किसी न किसी चुनाव या बड़े आयोजन से गरमाया होता था।

​साल 2023 में भी यह कहानी उसी बेशर्मी के साथ दोहराई गई। जनवरी 2023 में 40 दिन की पैरोल, उसके बाद जुलाई 2023 में 30 दिन की पैरोल और फिर नवंबर 2023 में 21 दिन की फरलो उसे दी गई । यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था कि जेल की सलाखें उसके लिए कोई मायने नहीं रखती थीं। साल 2024 आते-आते यह मियाद और लंबी होने लगी और व्यवस्था की निर्लज्जता भी अपने चरम पर पहुंचने लगी। जनवरी 2024 में उसे 50 से 60 दिनों की एक लंबी रिहाई मिली, जिसके बाद अगस्त 2024 में 21 दिन और ठीक उसके अगले ही महीने सितंबर-अक्टूबर 2024 के आस-पास फिर से 20 से 21 दिनों का समय उसने बाहर बिताया । यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। साल 2025 में व्यवस्था ने मानो उसे अपना स्थायी दामाद मान लिया। जनवरी 2025 में 30 दिन, अप्रैल 2025 में 21 दिन और अगस्त 2025 में 40 दिन के लिए उसे फिर से बाहर भेजा गया । हाल ही के घटनाक्रमों को देखें तो साल 2026 के जनवरी में 40 दिन और फिर अब मई 2026 में 30 दिन की पैरोल उसे दे दी गई है । अगर इन सभी दिनों को जोड़ा जाए, तो पता चलता है कि अपनी सजा के दौरान इस व्यक्ति ने 400 से अधिक दिन, यानी एक साल से ज्यादा का समय, जेल की सलाखों से बाहर रहकर ‘सत्संग’ करने और अपने अनुयायियों को ‘संदेश’ देने में बिताया है । आज फिर से वह 30 दिनों के लिए जेल से बाहर निकला है और व्यवस्था उसके स्वागत में पलकें बिछाए खड़ी है ।

​यह स्वाभाविक है कि दिमाग में यह सवाल हथौड़े की तरह बजे कि आखिर वह कौन सी ताकत, कौन सा जुगाड़ या कौन सा नियम है जिसके तहत यह व्यक्ति बार-बार जेल से बाहर आ जाता है? और अगर ऐसा कोई नियम है, तो वह भारत के प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक गरीब कैदी को क्यों लाभ नहीं देता? इस रहस्य का जवाब राजनीति, नौकरशाही और कानून की उस बारीक और खतरनाक लकीर में छिपा है जिसे ‘हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट, 2022’ कहा जाता है । यह वह जादुई छड़ी है जिसके जरिए राज्य सरकार जब चाहे, जिसे चाहे, पैरोल का वरदान दे सकती है। इस नए कानून के तहत, एक कैदी को एक कैलेंडर वर्ष (जनवरी से दिसंबर) में कुल 10 सप्ताह (लगभग 70 दिन) की पैरोल मिल सकती है, जिसे वह दो हिस्सों में ले सकता है । इसके अतिरिक्त, उसे 3 सप्ताह (21 दिन) की फरलो भी मिल सकती है । इसका सीधा सा अर्थ यह है कि कानूनी तौर पर एक कैदी साल में कुल 91 दिन जेल से बाहर रहने का अधिकार प्राप्त कर सकता है । राम रहीम और उसके वकील इसी कानूनी प्रावधान की आड़ लेते हैं। उनका तर्क बहुत ही सीधा और तकनीकी होता है कि पैरोल मांगना किसी भी कैदी का वैधानिक अधिकार है और इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है । वे बार-बार यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि वे केवल अपने कानूनी हक का इस्तेमाल कर रहे हैं।

​लेकिन इस कानूनी शब्दावली के पीछे एक बहुत बड़ा पेंच और एक बहुत गहरा षड्यंत्र छिपा है। हरियाणा सरकार के पुराने 1988 के अधिनियम और बाद में 2012-2013 में किए गए संशोधनों के अनुसार, ‘हार्डकोर प्रिजनर’ (खूंखार या दुर्दांत कैदी) को आसानी से पैरोल नहीं दी जा सकती । हार्डकोर कैदी की परिभाषा में वह व्यक्ति आता है जिसने सीरियल किलिंग की हो, या हत्या के साथ बलात्कार किया हो, या जो राज्य के लिए बड़ा खतरा हो । राम रहीम को अगस्त 2017 में दो साध्वियों के साथ बलात्कार के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा 20 साल की कड़ी सजा (लगातार 10-10 साल) सुनाई गई थी । इसके बाद जनवरी 2019 में पत्रकार राम चंदर छत्रपति और अक्टूबर 2021 में डेरा प्रबंधक रणजीत सिंह की हत्या के मामलों में भी उसे आपराधिक साजिश रचने का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी । एक आम इंसान की नजर में, जो व्यक्ति सैकड़ों महिलाओं के साथ यौन शोषण का आरोपी हो, जिस पर लोगों की हत्या करवाने के आरोप सिद्ध हुए हों, और जिसके जेल जाने पर उपद्रवियों ने 30 से ज्यादा लोगों की जान ले ली हो, वह निश्चित रूप से एक ‘खूंखार’ कैदी ही होगा।

​लेकिन यही वह मोड़ है जहाँ पैसा, पावर और राजनीति मिलकर कानून की आंखों में धूल झोंकते हैं। जब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने राम रहीम की बार-बार रिहाई का कड़ा विरोध करते हुए इसे चुनाव जीतने का राजनीतिक एजेंडा बताया और पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो हरियाणा सरकार ने जो जवाब दिया, वह रसूख के सामने कानून के नतमस्तक होने का सबसे शर्मनाक उदाहरण था । राज्य सरकार और सुनारिया जेल के अधीक्षक ने अदालत में पूरी बेशर्मी के साथ दलील दी कि राम रहीम ‘हार्डकोर’ कैदी की परिभाषा में आता ही नहीं है । सरकार का तर्क यह था कि राम रहीम ने खुद अपने हाथों से किसी की हत्या नहीं की है; उसे धारा 302 (हत्या) के तहत नहीं, बल्कि केवल धारा 120-B (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी ठहराया गया है । सरकार ने कहा कि दो अलग-अलग हत्याओं की साजिश रचने को ‘सीरियल किलिंग’ नहीं माना जा सकता और चूँकि वह ‘हार्डकोर’ नहीं है, इसलिए उसे अन्य ‘सामान्य’ कैदियों की तरह ही पैरोल का लाभ दिया जा रहा है । यह एक ऐसी दलील थी जो इंसानियत और न्याय के मूल सिद्धांतों को ही चुनौती दे रही थी। क्या दो लोगों की बेरहमी से हत्या की साजिश रचना और आस्था के नाम पर सैकड़ों महिलाओं का शारीरिक शोषण करना, कानून की नजर में इतनी ‘सामान्य’ बात है कि उसे एक साधारण चोर या लुटेरे के बराबर खड़ा कर दिया जाए? सत्ता और कानून की यह व्याख्या स्पष्ट करती है कि किस तरह शब्दों के हेरफेर, कोमा और फुलस्टॉप की बाजीगरी से एक प्रभावशाली अपराधी को रियायतें दी जाती हैं। अंततः पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने और बाद में फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी SGPC की जनहित याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह किसी व्यापक जनहित के बजाय एक व्यक्ति विशेष के खिलाफ लक्षित है, और कानून सरकार को यह विशेषाधिकार देता है कि वह किसे पैरोल दे । इन अदालती फैसलों ने उस तंत्र को और भी मजबूत कर दिया जो राम रहीम को बार-बार बाहर लाने का रास्ता बनाता है।

​इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे लौटना होगा और उस लंबे, अंधेरे और खौफनाक सफर को देखना होगा जहाँ से इस न्याय की लड़ाई की शुरुआत हुई थी। यह सिर्फ एक मुजरिम के जेल से बाहर आने की कहानी नहीं है; यह उन अधिकारियों, पत्रकारों और आम लोगों के उस गुमनाम संघर्ष का भी अपमान है जिन्होंने इस तथाकथित ‘भगवान’ को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी थी। कहानी की जड़ें साल 2002 में जाती हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक गुमनाम चिट्ठी मिलती है। इस चिट्ठी में किसी डरी हुई, सहमी हुई साध्वी ने डेरा सच्चा सौदा के भीतर चल रहे खौफनाक यौन शोषण, बलात्कार और धमकियों का काला सच बयां किया था । इस सच को जब स्थानीय प्रशासन, पुलिस और बड़े मीडिया घरानों ने दबाने की कोशिश की, तब सिरसा के एक स्थानीय सांध्य दैनिक अखबार ‘पूरा सच’ के निडर संपादक राम चंदर छत्रपति ने इसे छापने की जुर्रत की । इस अदम्य साहस की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। 24 अक्टूबर 2002 को, जब वे अपने घर के बाहर खड़े थे, उन्हें सरेआम गोलियों से भून दिया गया । घटना के बाद जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया और होश आने पर उन्होंने पुलिस को दिए बयान में राम रहीम का नाम मुख्य संदिग्ध के रूप में लिया, तो पुलिस की मिलीभगत का एक और गंदा चेहरा सामने आया। 21 नवंबर 2002 को अस्पताल में उनकी मौत हो गई । उनके 21 वर्षीय बेटे अंशुल छत्रपति ने जब पिता के अंतिम संस्कार के बाद पुलिस की एफआईआर देखी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। पुलिस ने राम रहीम का नाम ही एफआईआर से गायब कर दिया था । स्थानीय पुलिस ने इस सुनियोजित हत्या को एक साधारण संपत्ति विवाद का रूप देने की भद्दी कोशिश की थी। यह पूरी तरह से साफ था कि तत्कालीन राज्य सरकार और डेरा के बीच एक मौन, खौफनाक सहमति थी। पुलिस पर राजनीतिक आकाओं का इतना भारी दबाव था कि जांच की सुई डेरा की तरफ मुड़नी ही नहीं चाहिए थी ।

​अंशुल छत्रपति का संघर्ष किसी महाकाव्य की त्रासदी से कम नहीं था। पिता की हत्या से अब तक 17 सालों तक इस युवा ने धमकियों, बम की अफवाहों और हमलों के बीच न्याय की गुहार लगाई है। आखिरकार लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2003 में यह मामला देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी, सीबीआई को सौंपा गया। लेकिन यह सफर आसान नहीं था। सीबीआई के लिए यह जांच ‘गेम ऑफ विट्स’ यानी बुद्धि, धैर्य और तंत्र से लड़ने की एक भीषण परीक्षा थी। तत्कालीन डीआईजी (स्पेशल क्राइम्स) एम. नारायणन और जांच अधिकारी डीएसपी सतीश डागर ने इस जानलेवा चुनौती को अपने कंधों पर लिया । नारायणन ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि 2002 से लेकर 2007 तक, हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी। राम रहीम उस वक्त इतना ताकतवर था कि वह सत्ता के लिए “अछूत” (untouchable) बन चुका था । हर कोई उसे बचाना चाहता था क्योंकि उसके पीछे लाखों का वोट बैंक था। गवाहों को खुलेआम धमकाया जा रहा था, पीड़ितों के परिवारों पर मानसिक और शारीरिक दबाव डाला जा रहा था। जब सीबीआई ने अपनी जांच शुरू की, तो केवल गुमनाम चिट्ठी के आधार पर 18 लड़कियों को खोजा गया और उनसे पूछताछ की गई, लेकिन खौफ का आलम यह था कि केवल 2 लड़कियां ही अदालत के मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के तहत अपना बयान दर्ज कराने की हिम्मत जुटा पाईं ।

​डीएसपी सतीश डागर, जिन्होंने 2004 से 2012 तक इस मामले की जांच की, उन पर इस दौरान कैसा और कितना दबाव था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके वरिष्ठ अधिकारियों तक ने उनसे केस को बंद कर देने का इशारा किया था । तत्कालीन सरकारों—चाहे वह आईएनएलडी की हो या कांग्रेस की—के दौरान इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने की हर संभव कोशिश की गई। सीबीआई के भीतर ही कुछ अधिकारियों ने जांच में बाधा डालने की कोशिश की, जिसकी बाद में आंतरिक जांच भी हुई । लेकिन सतीश डागर और एम. नारायणन अडिग रहे। उन्होंने सबूत जुटाए, गवाहों को सुरक्षा का भरोसा दिया और 2007 में सीबीआई ने राम रहीम के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी ।

​कई वर्षों तक गवाहों की सुरक्षा, थका देने वाली अदालती प्रक्रिया और पल-पल होने वाले राजनीतिक हस्तक्षेप से लड़ते हुए, आखिरकार वह ऐतिहासिक दिन आया जब 25 अगस्त 2017 को पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम को बलात्कार का दोषी ठहरा दिया । इस फैसले के आते ही, जो हुआ वह भारत के इतिहास में किसी भी राज्य की कानून व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता के रूप में दर्ज है। डेरा के उपद्रवी अनुयायियों ने पंचकूला और हरियाणा के अन्य हिस्सों को आग के हवाले कर दिया। इन हिंसक झडपों में 31 से 38 लोग मारे गए और 120 से 300 के करीब लोग घायल हुए । राम रहीम को गिरफ्तार करने के बाद हेलीकॉप्टर के जरिए रोहतक की सुनारिया जेल ले जाया गया ताकि रास्ते में और कोई दंगा न हो । बाद में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट को सख्त आदेश देना पड़ा कि इस दंगे से हुए नुकसान की भरपाई डेरा की संपत्तियों को कुर्क करके की जाए । 28 अगस्त 2017 को राम रहीम को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई ।

​सजा होने के बाद एक पल के लिए ऐसा लगा था कि न्याय की जीत हुई है और यह एक नए युग की शुरुआत है जहाँ कोई भी खुद को भगवान समझने वाला अपराधी कानून से ऊपर नहीं हो सकता। लेकिन समय के साथ, रसूख का दीमक कानूनी साक्ष्यों को अंदर ही अंदर खोखला करने लगा। 2019 में पत्रकार राम चंदर छत्रपति हत्याकांड में और 2021 में डेरा प्रबंधक रणजीत सिंह हत्याकांड में विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम और उसके सहयोगियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी । लेकिन उच्च अदालतों में पहुंचते-पहुंचते यह पूरा मामला ताश के पत्तों की तरह ढहने लगा। मई 2024 में, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए 2002 के रणजीत सिंह हत्याकांड में राम रहीम और चार अन्य को बरी कर दिया। अदालत ने सीबीआई जांच में कई खामियों और साक्ष्यों के अभाव का हवाला दिया ।

​लेकिन न्याय के ताबूत में आखिरी कील ठुकी मार्च 2026 में। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की खंडपीठ (जिसमें मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल शामिल थे) ने पत्रकार राम चंदर छत्रपति हत्याकांड में भी राम रहीम की सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया । हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जो टिप्पणियां कीं, वे उन लोगों के लिए दिल तोड़ने वाली थीं जिन्होंने इस केस के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था। अदालत ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों की विश्वसनीयता संदिग्ध थी और जांच में कई लैप्स (lapses) थे। सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी मुख्य गवाह खट्टा सिंह के बारे में की गई। अदालत ने कहा कि कथित साजिश को लेकर उसका बयान “पिंग-पोंग बॉल की तरह इधर-उधर उछल रहा था” और वह एक भरोसेमंद गवाह नहीं था । इसलिए, यह मानते हुए कि जब अपराध के होने और निर्दोष होने की दोनों संभावनाएं मौजूद हों, तो मुजरिम को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of doubt) मिलना चाहिए, अदालत ने राम रहीम को मुख्य साजिशकर्ता के आरोप से मुक्त कर दिया ।

​यह फैसला भारत की न्याय प्रणाली की उस कड़वी और घिनौनी सच्चाई को उजागर करता है जहाँ समय बीतने के साथ गवाह टूट जाते हैं, दबाव में मुकर जाते हैं या उनकी याददाश्त को तेजतर्रार वकीलों द्वारा अदालतों में अविश्वसनीय साबित कर दिया जाता है। जब मुख्य साजिशकर्ता के खिलाफ सीधे तौर पर लिखित या भौतिक सबूत नहीं मिलते, तो कानून बेबस हो जाता है और सालों की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है। अंशुल छत्रपति, जिन्होंने 17-20 सालों तक अदालतों की सीढ़ियां घिसीं, उनके लिए यह फैसला एक बहुत बड़ा आघात था। उन्होंने अत्यंत निराशा और दर्द के साथ कहा, “जिस व्यक्ति के इशारे पर यह सब करवाया गया, और जो बाकी शूटर थे, उनका सिर्फ एक टूल (हथियार) के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। जिनके साथ हमारे पिता की कोई दुश्मनी नहीं थी। उन लोगों की सजा बरकरार रखना और मेन कॉन्स्पिरेटर (मुख्य साजिशकर्ता) को बाहर कर देना कहीं न कहीं बहुत निराशाजनक है” । एआईपीडब्ल्यूए (AIPWA) जैसी संस्थाओं ने भी इस फैसले की कड़ी निंदा की और इसे न्याय का मज़ाक बताया, यह याद दिलाते हुए कि राम चंदर छत्रपति ही वह पत्रकार थे जिन्होंने डेरा के काले सच को दुनिया के सामने लाने की हिम्मत की थी ।

​विडंबना का चरम देखिए कि एक तरफ राम रहीम जब पैरोल पर बाहर आता है तो उसे उच्च स्तरीय सुरक्षा (जेड प्लस जैसी सुरक्षा जो आमतौर पर बड़े राजनेताओं को मिलती है) दी जाती है , और दूसरी तरफ, इंसाफ के लिए लड़ने वाले अंशुल छत्रपति की पुलिस सुरक्षा 2025 के अंत में बिना कोई पूर्व नोटिस दिए चुपचाप वापस ले ली गई । यह व्यवस्था का एक ऐसा क्रूर व्यंग्य है जो चीख-चीख कर बता रहा है कि असल में पुलिस, प्रशासन और सत्ता की सहानुभूति किसके साथ है। जिन सीबीआई अधिकारियों ने इस मामले को अंजाम तक पहुंचाया, उन्हें भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। सतीश डागर, जिन्होंने अपना करियर दांव पर लगाकर जांच की थी, उन्हें 2019 में समय से पहले ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ (Voluntary Retirement) लेनी पड़ी । आधिकारिक तौर पर भले ही इसे ‘निजी कारण’ बताया गया हो, लेकिन सत्ता के गलियारों में यह चर्चा आम रही कि सिस्टम ऐसे ईमानदार और जिद्दी अधिकारियों को लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं करता । अंशुल छत्रपति ने अब हार न मानते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख करने और इस अदालती लड़ाई को आगे जारी रखने का फैसला किया है ।

​राम रहीम की यह सुविधाजनक जेल यात्रा और कानूनी बाजीगरी यहीं खत्म नहीं होती। उस पर कुछ अन्य खौफनाक और संवेदनशील मामले अभी भी लंबित हैं जो उसकी असलियत को और गहरा करते हैं। पहला मामला उसके ही 400 पुरुष अनुयायियों को नपुंसक (castration) बनाने का है। आरोप है कि ‘ईश्वर के करीब’ ले जाने और भगवान की प्राप्ति का झूठा झांसा देकर राम रहीम ने सिरसा आश्रम के अस्पताल में सैकड़ों अनुयायियों को जबरन नपुंसक बना दिया । हंस राज चौहान नामक एक याचिकाकर्ता की शिकायत और मेडिकल जांच में इस बात की पुष्टि होने के बाद, 2015 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने इस मामले में धारा 120-B (साजिश), 417 (धोखाधड़ी), 326 (खतरनाक हथियारों से गंभीर चोट पहुंचाना) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत केस दर्ज किया था । इस खौफनाक मामले की सुनवाई अभी भी चल रही है और यह दर्शाता है कि अंधविश्वास के नाम पर किस हद तक शारीरिक और मानसिक शोषण किया जा सकता है।

​दूसरा और राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा ज्वलंत मामला 2015 के गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी (Sacrilege) का है। पंजाब के फरीदकोट जिले के बरगाड़ी में गुरु ग्रंथ साहिब के पवित्र स्वरूपों की चोरी, उनके पन्ने फाड़कर गलियों में फेंकने और दीवारों पर भड़काऊ पोस्टर लगाने के मामले में डेरा अनुयायियों का नाम सामने आया था । इस घटना ने पूरे पंजाब की राजनीति में भूचाल ला दिया था, सिखों की भावनाएं आहत हुई थीं और पुलिस फायरिंग में लोगों की जान गई थी । पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मार्च 2023 में इस मामले में राम रहीम के खिलाफ चल रहे मुकदमे पर रोक लगा दी थी, जिससे पंजाब सरकार को बड़ा झटका लगा था। लेकिन अक्टूबर 2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को हटाते हुए राम रहीम के खिलाफ ट्रायल शुरू करने का रास्ता साफ कर दिया । इसके बाद पंजाब की भगवंत मान सरकार ने बिना देर किए राम रहीम के खिलाफ मुकदमा चलाने की अंतिम मंजूरी (Prosecution Sanction) दे दी । अब इस मामले में भी ट्रायल तेज होने की उम्मीद है, जो पंजाब की राजनीति का एक अहम मुद्दा है।

​इन सभी तथ्यों, तारीखों, अदालती फैसलों और लंबित मुकदमों का जब एक साथ रखकर गहन विश्लेषण किया जाता है, तो जो तस्वीर उभरती है, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए गहरी चिंता और शर्म का विषय होनी चाहिए। राम रहीम का इस तरह से बार-बार जेल से बाहर आना केवल एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है; इसके निहितार्थ (implications) समाज, राजनीति और न्याय व्यवस्था के लिए कहीं अधिक गहरे और खतरनाक हैं।

​सबसे पहला निहितार्थ यह है कि क्या इस देश में कानून वास्तव में सभी नागरिकों के लिए समान है? एक तरफ राम रहीम है, जिसे जब चाहे पैरोल मिल जाती है। दूसरी तरफ, हरियाणा की ही जेलों में बंद वे हजारों विचाराधीन और सामान्य कैदी हैं, जिनकी हालत पर नजर डालें तो रोना आ जाता है। मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार, हरियाणा की जेलों में सामान्य कैदियों को अपनी स्थिति जानने के लिए वकीलों या ई-कियोस्क (e-history kiosks) के भरोसे रहना पड़ता है । जब हरियाणा का कोई आम कैदी अपने बीमार पिता से मिलने, अपनी बेटी की शादी के लिए या किसी आपात स्थिति (Emergency Parole) में घर जाने के लिए आवेदन करता है, तो उसकी फाइलें जेल अधीक्षक से लेकर जिलाधिकारी (DC) और पुलिस अधीक्षक (SP) के दफ्तरों में महीनों तक धूल फांकती रहती हैं। कई बार पुलिस की रिपोर्ट यह कहकर उनकी पैरोल खारिज करवा देती है कि इस कैदी के बाहर आने से ‘शांति भंग’ हो सकती है या वह ‘फरार’ हो सकता है । लेकिन जब बात राम रहीम की आती है—एक ऐसा व्यक्ति जिसके जेल जाने पर राज्य में दंगे भड़क चुके हों—तो क्या राज्य प्रशासन, खुफिया एजेंसियों और पुलिस को उसके बाहर आने से ‘शांति भंग’ होने का कोई खतरा महसूस नहीं होता? एक आम कैदी और इस वीआईपी कैदी के बीच का यह अंतर इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि व्यवस्था केवल उन्हीं के लिए काम करती है जो उसे लाभ पहुंचा सकते हैं।

​दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण निहितार्थ ‘राजनीतिक अर्थव्यवस्था’ और वोटबैंक के अर्थशास्त्र से जुड़ा है। भारत के चुनावी लोकतंत्र में ‘डेरा’ हमेशा से एक बहुत बड़ा वोट बैंक माना जाता रहा है। डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों की संख्या लाखों में है, और इनका सीधा प्रभाव हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के दर्जनों विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में है । राजनीतिक दल चाहे कोई भी हो, चुनाव के समय इन डेरों के सामने सिर झुकाना और उनका आशीर्वाद लेना नेताओं की राजनीतिक मजबूरी बन जाता है। इस मजबूरी का फायदा उठाकर डेरा प्रमुखों, राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच एक बहुत मजबूत ‘गठजोड़’ (Nexus) बन जाता है । इस गठजोड़ में सभी को फायदा होता है (Win-Win Situation)। डेरा प्रमुखों को कानूनी मामलों में राहत, पैरोल और फरलो मिलती है, उनके अनुयायियों के सरकारी काम आसानी से हो जाते हैं, और बदले में राजनेताओं को चुनावों में एकमुश्त थोक वोट मिलते हैं।

​राम रहीम की पैरोल की तारीखों का अगर देश और राज्यों के चुनावी कैलेंडर के साथ मिलान किया जाए, तो जो सच सामने आता है वह महज एक संयोग नहीं हो सकता। यह एक सुनियोजित ‘बार्टर सिस्टम’ (वस्तु विनिमय प्रणाली) की तरह काम करता है। फरवरी 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उसे 21 दिन की फरलो दी गई । अक्टूबर 2022 में आदमपुर उपचुनाव और पंचायत चुनावों के समय वह 40 दिन के लिए बाहर था। नवंबर 2023 में राजस्थान विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उसे 21 दिन की मोहलत मिली। फिर अक्टूबर 2024 में हरियाणा विधानसभा चुनाव (5 अक्टूबर) से ठीक पहले उसे 20 दिन की पैरोल मिल गई । और अब, जनवरी 2025 में, जब 5 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव होने थे, तो उससे ठीक पहले उसे 30 दिन की पैरोल देकर सिरसा आश्रम में रहने की अनुमति दे दी गई । अंशुल छत्रपति ने एक बार मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर यह बात पूरे आंकड़ों के साथ बताई थी कि राम रहीम को 10 में से 6 बार चुनाव के समय ही रिहा किया गया है और वह 255 से ज्यादा दिन चुनावों के आस-पास ही जेल से बाहर रहा है । चुनाव के समय डेरा की तरफ से अनुयायियों को एक ‘संदेश’ या मैसेज भेजा जाता है कि किस पार्टी को वोट देना है। क्या भारत के लोकतंत्र में वोट हासिल करने का यह तरीका कानूनी या नैतिक रूप से सही है? क्या यह न्यायपालिका और चुनाव आयोग दोनों की गरिमा का हनन नहीं है?

​जब किसी देश का न्यायतंत्र, उसकी जेल नियमावली और उसकी सरकारें इतनी बेबसी से किसी रसूख और वोटबैंक के सामने लेट जाएं, तो सवाल पूछना सिर्फ एक पत्रकार का धर्म नहीं रहता, बल्कि हर उस नागरिक का कर्तव्य बन जाता है जो इस व्यवस्था का हिस्सा है।

​यह सोचना चाहिए कि क्या भारत के संविधान में लिखा ‘कानून के समक्ष समानता’ (Equality before the law) का सिद्धांत सिर्फ नागरिक शास्त्र की किताबों में रटने और परीक्षाओं में पास होने के लिए रह गया है? जब हरियाणा सरकार ने 2022 में अपने जेल कानूनों और ‘हार्डकोर कैदी’ के नियमों में बदलाव किया था, तो क्या यह जानबूझकर किसी खास ‘संत’ को लाभ पहुंचाने और उसे जेल की चहारदीवारी से बाहर निकालने का रास्ता तैयार करने के लिए किया गया था? जब एक व्यक्ति, जिस पर अपनी ही शिष्याओं के साथ बलात्कार करने और सच बोलने वाले पत्रकारों की हत्या की साजिश रचने के आरोप लगे हों, वह ‘अच्छे आचरण’ (Good Conduct) के नाम पर बार-बार जेल से बाहर आकर अपने आश्रमों में शाही जिंदगी जीता है, तो क्या यह उन दो पीड़िताओं के जख्मों पर सीधा नमक छिड़कने जैसा नहीं है? उन लड़कियों ने समाज के तानों, बदनामी और मौत की धमकियों के बावजूद अपने साथ हुए खौफनाक यौन शोषण की गवाही दी थी। व्यवस्था का यह रवैया उनके साहस को क्या संदेश दे रहा है?

​अगर राम रहीम ‘खूंखार’ या ‘हार्डकोर’ कैदी नहीं है, तो फिर भारत की जेलों में ठूंस-ठूंस कर भरे गए वे लाखों गरीब, आदिवासी और दलित विचाराधीन कैदी कौन हैं, जिन्हें सालों-साल जमानत तक मयस्सर नहीं होती और वे जेल के भीतर ही घुट-घुट कर मर जाते हैं? क्या पैसा और पावर ही वह असल ‘अघोषित संविधान’ है जिससे आज भारत की पूरी व्यवस्था, न्यायपालिका और कार्यपालिका संचालित हो रही है? अदालतें अक्सर यह कहकर मामलों को खारिज कर देती हैं कि गवाह मुकर गया है या गवाह अविश्वसनीय हो गया है (जैसा कि खट्टा सिंह के मामले में हुआ)। लेकिन क्या कभी कोई अदालत इस बात की गहराई से जांच करती है कि 15-20 साल लंबी उबाऊ और खर्चीली न्यायिक प्रक्रिया में एक आम गवाह, जिसके पास न धन है न बाहुबल और न ही राजनीतिक संरक्षण, वह रसूखदारों के दबाव, रोज मिलने वाली धमकियों और लालच के सामने कैसे और क्यों टूट जाता है?

​और इन सबसे बड़ा व्यंग्य तो यह है कि जो व्यक्ति खुद बलात्कार के मामले में सजा काट रहा हो, जिस पर सैकड़ों लोगों को नपुंसक बनाने के केस चल रहे हों, वह जेल से बाहर आकर ऑनलाइन ‘सत्संग’ करता है, समाज को बुराइयां छोड़ने का प्रवचन देता है, और हमारे माननीय राजनेता, बड़े-बड़े मंत्री और विधायक उस वर्चुअल सत्संग में हाथ जोड़े, सिर झुकाए खड़े नजर आते हैं । क्या कोई भी लोकतंत्र इससे अधिक नंगा और बेशर्म हो सकता है? यह एक ऐसा तमाशा है जिसे हम सब मूक दर्शक बनकर देख रहे हैं।

​राम रहीम का यह पूरा घटनाक्रम भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) के उस असाध्य रोग को उजागर करता है जिसका इलाज कोई भी राजनीतिक दल नहीं करना चाहता, क्योंकि बीमारी में ही उनका चुनावी स्वास्थ्य छिपा है। जिस तरह से मार्च 2026 में राम चंदर छत्रपति हत्याकांड और 2024 में रणजीत सिंह हत्याकांड से उसे एक के बाद एक बरी किया गया, वह इस बात का स्पष्ट और खतरनाक संकेत है कि समय के साथ न्याय की धार कैसे जानबूझकर कुंद कर दी जाती है। गवाहों को थका देना और सबूतों को मिटा देना इस तंत्र की पुरानी चाल है। जांच एजेंसी सीबीआई के अधिकारियों—नारायणन और सतीश डागर—ने जिस अदम्य साहस, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ इस मामले की नींव रखी थी, वह आज के समय में दुर्लभ है। लेकिन जब पूरी की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था ही उस नींव में पानी डालकर उसे कमजोर करने लगे, तो एक रिटायर हो चुका ईमानदार अधिकारी भी भला क्या कर सकता है?

​आगे की उम्मीद अब धुंधली जरूर है, लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। यह लड़ाई अब देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) की चौखट पर टिक गई है। अंशुल छत्रपति और अन्य पीड़ित परिवार हाईकोर्ट के निराशाजनक फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपनी लड़ाई जारी रखने का दृढ़ संकल्प ले चुके हैं । वे थके जरूर हैं, लेकिन हारे नहीं हैं। दूसरी तरफ, 2015 के बेअदबी मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में स्टे हटाया जाना एक सकारात्मक और आशावादी कदम है, जो यह दर्शाता है कि इंसाफ की प्रक्रिया अभी रुकी नहीं है ।

​हालाँकि, एक कड़वा सच यह भी है कि जब तक राज्यों की जेल नियमावली और पैरोल के कानूनों में रसूखदारों के लिए इस तरह के ‘चोर दरवाजे’ खुले रहेंगे, जब तक ‘हार्डकोर कैदी’ की परिभाषा को वकीलों की बहस में घुमाया जाता रहेगा, तब तक राम रहीम जैसे प्रभावशाली कैदी अपनी सजा को एक पिकनिक और हॉलिडे की तरह ट्रीट करते रहेंगे। एक सभ्य समाज में न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह साफ तौर पर होते हुए दिखना भी चाहिए। वर्तमान स्थिति में, न्याय आम और गरीब आदमी से अपना मुंह छिपाता हुआ और रसूखदारों के साथ खड़ा होकर मुस्कुराता हुआ नजर आ रहा है। यह स्थिति न केवल गहरी चिंताजनक है, बल्कि एक परिपक्व होने का दावा करने वाले लोकतंत्र के लिए एक बेहद गंभीर और डरावनी चेतावनी भी है। जब न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका का अंतर-संबंध केवल वोटबैंक की गणित और सत्ता की राजनीति से तय होने लगे, तो आम आदमी की डायरी में इंसाफ के नाम पर सिर्फ सुनवाई की नई तारीखें ही लिखी जाती हैं, असल इंसाफ नहीं।

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