Tach – कर्मचारियों की सैलरी से महंगा पड़ रहा AI, एनवीडिया से लेकर माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां को लगने लगा डर

पिछले दो सालों से पूरी दुनिया की टेक इंडस्ट्री (Tech Industry) में सिर्फ एक ही बात का शोर है. हर कोई कह रहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) के आने से कंपनियों का काम बहुत आसान हो जाएगा, कर्मचारियों पर निर्भरता कम होगी और कंपनियों का खर्च भारी मात्रा में घट जाएगा. शेयर बाजार को भी यह कहानी इतनी पसंद आई कि जिस भी कंपनी ने एआई अपनाने, छंटनी करने या ऑटोमेशन (Automation) की बात की, उसके शेयरों की कीमतें अचानक आसमान छूने लगीं. लेकिन अब जब दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इसे हकीकत में बड़े पैमाने पर लागू करना शुरू किया है, तो इसके नतीजे उम्मीद से बिल्कुल अलग और चौंकाने वाले आ रहे हैं. अब टेक जगत के बड़े एक्सपर्ट्स यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या एआई वाकई कंपनियों का खर्च बचा रहा है, या फिर यह खुद में एक बहुत बड़ा और अनियंत्रित खर्च बनता जा रहा है?
इस पूरे मामले को समझने के लिए सबसे पहले दिग्गज टेक कंपनी माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) में क्या हुआ है, उसे देखते हैं. माइक्रोसॉफ्ट ने अपने हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को कोडिंग, सॉफ्टवेयर की कमियां सुधारने मतलब डिबगिंग (Debugging) और कोड रिव्यू जैसे कामों के लिए ‘क्लाउड कोड’ (Claude Code) एआई टूल के इस्तेमाल करने की इजाजत दी थी. यह टूल काफी पावरफुल है. शुरुआती छह महीनों में इंजीनियरों ने इस टूल को खूब पसंद किया और इसका जमकर इस्तेमाल भी किया. लेकिन असली मुसीबत तब शुरू हुई, जब इस एआई टूल का इस्तेमाल करने का बिल कंपनी के सामने आया.
जब हजारों इंजीनियर दिन-रात इस टूल का इस्तेमाल करने लगे, तो इसका कुल खर्च माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनी के लिए भी एक बड़ा सिरदर्द बन गया. नतीजा यह हुआ कि माइक्रोसॉफ्ट ने अपने इंजीनियरों को इस महंगे टूल से हटाकर अपने ही खुद के सस्ते एआई टूल्स और गिटहब कोपायलट स्टैक (GitHub Copilot stack) पर शिफ्ट करने का फैसला किया. कई जगहों पर यह खबर छपी की माइक्रोसॉफ्ट ने अपने कर्मचारियों के एआई इस्तेमाल को बैन कर दिया है.
बैन तो नहीं किया, रास्ते बदल लिए!
हालांकि, इसे एआई पर बैन लगाना कहना पूरी तरह सही नहीं है. ज्यादा सटीक बात यह है कि कंपनी ने वेंडर कंसोलिडेशन (Vendor Consolidation) किया. बाहर के महंगे टूल की जगह अपने कंट्रोल वाले टूल्स को प्राथमिकता दी, ताकि खर्च को रोका जा सके. असली मुद्दा एआई की उपयोगिता नहीं, बल्कि उसकी प्रति यूनिट पर आने वाली लागत का था.
ऐसा ही कुछ दुनिया की सबसे बड़ी कैब सर्विस कंपनी उबर (Uber) के साथ भी हुआ. उबर ने दिसंबर 2025 में अपने इंजीनियरों के लिए इसी क्लाउड कोड टूल की शुरुआत की थी और मार्च तक कंपनी के 5,000 इंजीनियरों में से लगभग 84% इसका इस्तेमाल कर रहे थे. कंपनी के अंदर हालत यह थी कि सॉफ्टवेयर का करीब 70% कोड सीधे एआई सिस्टम से ही तैयार होकर आ रहा था. लेकिन इसका दूसरा और डरावना पहलू यह था कि एआई का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने वाले कुछ हैवी यूजर इंजीनियरों का अकेले का खर्च हर महीने 500 डॉलर से लेकर 2,000 डॉलर (करीब 40,000 रुपये से लेकर 1.6 लाख रुपये) तक आ रहा था.
उबर के चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर (Chief Technology Officer) प्रवीन नेप्पल्ली नागा (Praveen Neppalli Naga) ने इस पर बात करते हुए बताया कि कंपनी ने पूरे साल के लिए एआई का जो बजट तय किया था, वह अप्रैल तक आते-आते ही पूरी तरह खत्म हो गया. कंपनी ने जोश-जोश में कर्मचारियों के बीच एआई इस्तेमाल करने की होड़ मचाने के लिए इंटरनल लीडरबोर्ड (Internal Leaderboard) तक बना दिए थे, जहां इंजीनियरों को इस आधार पर रैंक किया जा रहा था कि वे एआई का कितना इस्तेमाल कर रहे हैं. मतलब ये कि एआई को अपनाने के लिए खेल जैसा माहौल तो बनाया गया, लेकिन खर्च को कंट्रोल करने का कोई मजबूत प्लान नहीं था.
क्या है एआई की ‘टोकन इकोनॉमिक्स’, क्यों बढ़ता है बिल?
आखिर एआई का इस्तेमाल करने पर इतना भारी-भरकम बिल आता क्यों है? दरअसल, क्लाउड कोड जैसे टूल्स टोकन-बेस्ड प्राइसिंग (Token-based pricing) पर काम करते हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि जब भी आप एआई से कोई सवाल पूछते हैं, कोड लिखवाते हैं या किसी बड़ी फाइल को चेक करवाते हैं, तो एआई उस पूरे टेक्स्ट को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट देता है जिन्हें ‘टोकन’ कहा जाता है.
आसान शब्दों में समझें तो एआई आपके हर एक शब्द, स्पेस और कॉमा को प्रोसेस करने के लिए पैसे लेता है. जैसे पुराने जमाने में पीसीओ से बात करने पर हर सेकंड का मीटर चलता था, ठीक वैसे ही एआई टूल में हर एक क्वेरी, हर एक कोड रिव्यू और हर एक डिबगिंग सेशन के साथ टोकन का मीटर घूमता है और उसकी लागत जुड़ती जाती है. जब एक या दो लोग इसे चलाएं तो खर्च का पता नहीं चलता, लेकिन जब किसी कंपनी के हजारों इंजीनियर चौबीसों घंटे बार-बार प्रॉम्प्ट चलाते हैं, तो टोकन की खपत लाखों-करोड़ों में पहुंच जाती है और बिल अचानक उम्मीद से कई गुना बड़ा हो जाता है.
इस बढ़ते खर्च को लेकर मशहूर इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) और रिसर्च कंपनी गार्टनर (Gartner) जैसी ऑर्गेनाइजेशन्स का अनुमान भी इसी तरफ इशारा करता है. आने वाले सालों में कंपनियों के अंदर टोकन की खपत कई गुना ज्यादा बढ़ सकती है. हालांकि एक राहत की बात यह है कि टेक कंपनियों के बीच बढ़ते कॉम्पिटिशन की वजह से प्रति टोकन की कीमत लगातार घट रही है, लेकिन इसके बावजूद कंपनियों का कुल बिल बढ़ सकता है. ऐसा इसलिए होगा क्योंकि आने वाले समय में एआई एजेंट्स (AI Agents) और ज्यादा पेचीदा काम करेंगे. जब काम बड़ा और मुश्किल होगा, तो एआई को उसे प्रोसेस करने में बहुत ज्यादा डेटा और टोकन खर्च करने पड़ेंगे. इसका मतलब ये हुआ कि प्रति टोकन की कीमत भले ही कम हो जाए, लेकिन एआई का कुल इस्तेमाल इतना ज्यादा बढ़ जाएगा कि कंपनियों का एआई बिल लगातार ऊपर ही जाएगा.
एनवीडिया के वीपी ने जो कहा, वो जरूर जानें
इस बीच दुनिया की सबसे बड़ी एआई चिप और जीपीयू (GPU) बनाने वाली कंपनी एनवीडिया (NVIDIA) के वाइस प्रेसिडेंट (Vice President) ब्रायन कैटानज़ारो (Bryan Catanzaro) ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही है. उन्होंने बताया कि उनकी खुद की टीम के लिए कंप्यूटर चलाने और डेटा प्रोसेस करने की लागत (Compute cost), इंसानी कर्मचारियों को दी जाने वाली सैलरी और उनके कुल खर्च से कहीं ज्यादा हो चुकी है. यह बयान इसलिए बहुत बड़ा है क्योंकि एनवीडिया खुद पूरी दुनिया को एआई चलाने के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) और चिप्स बेचती है. अगर एआई का ढांचा बनाने वाली कंपनी के अंदर ही कंप्यूट कॉस्ट कर्मचारियों से महंगा हो रहा है, तो बाकी कंपनियों के लिए यह चिंता और भी गंभीर हो सकती है.
इंसानों से महंगा कहना आधी-अधूरी बात!
हालांकि, इस चिंता के बीच एक मजबूत काउंटर-आर्ग्युमेंट भी है, जिसे सुना और समझा जाना जरूरी है. कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल यह कह देना कि “एआई इंसानों से महंगा पड़ रहा है”, आधी अधूरी बात है. इसके पीछे का असली गणित यह है कि अगर उबर का कोई हैवी एआई यूजर इंजीनियर साल भर में करीब 16,000 डॉलर का बिल बनाता है, और उस इंजीनियर की कुल सालाना सैलरी और सुविधाएं लगभग 577,000 डॉलर हैं, तो यह एआई खर्च उसकी सैलरी का 3% भी नहीं है. ऐसे में अगर वह एआई टूल उस इंजीनियर के काम करने की क्षमता को सिर्फ 3% भी बढ़ा देता है, तो एआई पर किया गया पूरा खर्च आसानी से वसूल हो जाता है. इसलिए असली समस्या यह नहीं है कि एआई महंगा है, बल्कि सवाल यह है कि क्या कंपनियों को एआई से मिलने वाला फायदा उसके खर्च से ज्यादा है या नहीं?
कंपनियों के लिए जरूरी होगा एआई गवर्नेंस!
माइक्रोसॉफ्ट और उबर की इन स्थितियों को देखकर यह समझ लेना कि कंपनियां एआई से पीछे हट रही हैं या इसे रिजेक्ट कर रही हैं, बिल्कुल गलत होगा. कोई भी कंपनी एआई का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं कर रही है, बल्कि वे अब इस बात पर काम कर रही हैं कि इस खर्च को अनुशासन के साथ कंट्रोल में कैसे रखा जाए. वैसे भी एआई मॉडल्स अब तेजी से सस्ते हो रहे हैं. डीपसीक (DeepSeek) जैसे नए चीनी मॉडल्स ने बाजार में आकर प्राइजिंग प्रेशर बढ़ा दिया है, जिससे बाकी कंपनियों को भी अपने दाम घटाने पड़ रहे हैं. खुद
गूगल का जेमिनी फ्लैश (Gemini Flash) जैसा मॉडल बहुत कम लागत पर बेहद मजबूत परफॉर्मेंस दे रहा है.
दुनिया भर की कंपनियों के लिए सबक यह है कि एआई को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए सिर्फ उसे अपनाना काफी नहीं है, बल्कि उसके खर्च पर लगाम लगाने के लिए मजबूत कॉस्ट गवर्नेंस (Cost Governance) अपनाना होगा. कंपनियों को अपने कर्मचारियों को बेहतर प्रॉम्प्ट डिसिप्लिन सिखाना होगा, ताकि वे बार-बार गैर-जरूरी सवाल पूछकर टोकन बर्बाद न करें. साथ ही, कंपनियों को यह तय करना होगा कि किस काम के लिए महंगा एआई टूल चाहिए और किस काम के लिए सस्ते या ओपन-सोर्स मॉडल से काम चल सकता है.
Source link








