आगरा के सट्टा बाजार में लुटता गरीब और खामोश खड़ा लाचार सिस्टम, लोहामंडी इलाके में गेंगस्टर चला रहा गद्दी जिम्मेदार बेखबर ?

ताजनगरी आगरा को दुनिया मोहब्बत के प्रतीक के रूप में जानती है लेकिन इस शहर की एक दूसरी ही सच्चाई है जो इसकी तंग और अंधेरी गलियों में पनप रही है आगरा अब केवल ऐतिहासिक स्मारकों का शहर नहीं रह गया है बल्कि यह सट्टे और जुए के एक ऐसे मायाजाल का बड़ा केंद्र बन चुका है जहां हर रोज गरीबों की पसीने की कमाई को बहुत ही खामोशी से निगला जा रहा है शहर के अलग अलग कोनों में सट्टा माफियाओं ने अपना ऐसा मजबूत नेटवर्क बिछा लिया है जिसे भेद पाना स्थानीय प्रशासन और पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है यह एक ऐसा तंत्र है जो बिना किसी शोर शराबे के चलता है लेकिन इसकी गूंज उन अनगिनत गरीब परिवारों की सिसकियों में सुनी जा सकती है जो इस लत के कारण पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं जब जानकारी नकारात्मक और इतनी चिंताजनक हो तो स्थिति को उसी गंभीरता से देखा जाना चाहिए जिस गंभीरता से कोई मजदूर अपने घर का राशन न खरीद पाने पर रोता है आज की हमारी यह पड़ताल उसी सट्टा तंत्र की परतों को उधेड़ने का एक प्रयास है आखिर ये जो सिस्टम है ये किस तरह से काम कर रहा है कि गरीब आदमी और गरीब होता जा रहा है और सट्टा माफिया करोड़ों की कोठियां खड़ी कर रहे हैं

लोहामंडी में सट्टे का चरम और दिल्ली का कनेक्शन
सूत्रों की मानतो ​आगरा के थाना लोहामंडी क्षेत्र में सट्टे का करोबार इन दिनों अपने चरम पर पहुंच चुका है यह इलाका अब सट्टेबाजों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह सा प्रतीत होता है जहां हर रोज गरीबो की मेहनत का पैसा डकार रहे सट्टा माफिया और किसी को कोई खबर नहीं है आपको बता दें लोहामंडी के गोकुल पूरा निवासी शीतल कठेरिया उर्फ़ सिद्धार्थ पुत्र स्व सूरज भान कठेरिया जो मंदिर बाली गली वल्का वस्ती गोकुल पूरा का रहने बाला है उस पर गंभीर आरोप लगे है कि वह सट्टे की बहुत बड़ी गद्दी चलाता है और सिर्फ आगरा ही नहीं बल्कि दिल्ली के सट्टे का भी काम करता है यह कोई मामूली बात नहीं है एक व्यक्ति जिसका नेटवर्क दो राज्यों तक फैला हो वह कैसे बिना किसी रोक टोक के अपना कारोबार चला रहा है

​सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि शीतल कठेरिया पूर्व मे भी गेंगस्टर एक्ट मे जेल भी जा चूका है लेकिन जेल की सलाखें शायद ऐसे लोगों के लिए केवल एक विश्राम गृह की तरह होती हैं जहां से लौटकर वे फिर से अपने उसी पुराने धंधे में लग जाते हैं आप सोच कर देखिए कि एक व्यक्ति जिस पर गेंगस्टर एक्ट जैसी इतनी गंभीर धाराओं में कार्रवाई हो चुकी हो वह फिर से सट्टे की गद्दी कैसे सजा लेता है क्या उसे कानून का कोई खौफ नहीं बचा है या फिर उसे यह भलीभांति पता है कि सिस्टम की जो कमजोर कड़ियां हैं उन्हें कैसे अपने पक्ष में इस्तेमाल करना है जब कोई सट्टा माफिया किसी इलाके में इस तरह पनपता है तो वह केवल पैसे नहीं लूटता बल्कि वह उस पूरे इलाके की सामाजिक और आर्थिक संरचना को अंदर से खोखला कर देता है लोहामंडी जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जहां दिहाड़ी मजदूर रिक्शा चालक और छोटे व्यापारी रहते हैं वहां ये सट्टा माफिया उनका खून चूस रहे हैं

पुलिस को चकमा देने का हाईटेक और फिल्मी तरीका
​सटोरिए और जुआरी अब केवल छिपकर काम नहीं करते बल्कि वे पुलिस की निगरानी के लिए भी अपना खुद का खुफिया तंत्र विकसित कर चुके हैं थाना सदर क्षेत्र के नगला जस्सा में लक्ष्मी नारायण नाम का व्यक्ति लंबे समय से जुए का बहुत बड़ा अड्डा चला रहा था पुलिस जब भी वहां दबिश देने जाती उसे खाली हाथ ही लौटना पड़ता क्यो की जुआरियों तक पुलिस के आने की भनक पहले ही पहुंच जाती थी लक्ष्मी नारायण ने पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए रास्ते में कई बड़े बड़े ब्रेकर बनवा रखे थे और उन पर अपने गुर्गे तैनात कर दिए थे जैसे ही कोई सरकारी वाहन या पुलिस की गाड़ी दिखती ये गुर्गे फड़ पर बैठे जुआरियों को तुरंत अलर्ट कर देते थे इसके अलावा उसने अपने मकान और आसपास सीसीटीवी कैमरे भी लगा रखे थे

​यह किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं लगता जहां अपराधी ने पूरे इलाके की किलेबंदी कर रखी हो लेकिन इस बार पुलिस ने भी जुआरियों को चकमा देने के लिए एक नया और अनोखा तरीका अपनाया सदर पुलिस के एसीपी राम प्रवेश गुप्ता के नेतृत्व में पुलिसकर्मी अपना सरकारी वाहन छोड़कर एंबुलेंस और ऑटो में सवार होकर जुए के अड्डे पर पहुंचे इस अचानक हुई दबिश से जुआरियों में भारी भगदड़ मच गई और पुलिस ने मौके से 19 जुआरियों को गिरफ्तार कर लिया जिनके पास से 74790 रुपये और कई वाहन बरामद हुए हालांकि मुख्य आरोपी लक्ष्मी नारायण पुलिस के पहुंचने से पहले ही वहां से भागने में सफल रहा पुलिस ने बाद में उन ब्रेकरों को भी तुड़वा दिया जो निगरानी के लिए बनाए गए थे

​उत्तर प्रदेश गेंगस्टर और असामाजिक क्रियाकलाप रोकथाम अधिनियम 1986 एक बहुत ही सख्त कानून है जिसका मुख्य उद्देश्य गिरोहों और उनकी असामाजिक गतिविधियों को रोकना है इस अधिनियम की धारा 2 बी में गिरोह को बहुत स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है जो अनुचित आर्थिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से अपराध करते हैं और सार्वजनिक जुआ अधिनियम 1867 के तहत दंडनीय अपराध भी इसके दायरे में आ सकते हैं यदि वे संगठित रूप से किए जा रहे हों गेंगस्टर एक्ट की धारा 14 1 के तहत जिला मजिस्ट्रेट को यह पूरा अधिकार है कि वह अवैध तरीके से अर्जित की गई संपत्ति को कुर्क कर सके आगरा पुलिस द्वारा डेढ़ करोड़ से लेकर तीन करोड़ तक की इन संपत्तियों की जब्ती यह कड़ा संदेश देती है कि सट्टे की काली कमाई से बनाए गए ये महल किसी भी दिन ढह सकते हैं

​लेकिन यहां एक बड़ा सवाल कानून के जानकारों और अदालतों के नजरिए से भी उठता है हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने लाल मोहम्मद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में एक बहुत ही अहम टिप्पणी की थी कि यूपी गेंगस्टर एक्ट जैसे असाधारण विधानों को उत्पीड़न का हथियार बिल्कुल नहीं बनना चाहिए और इसका उपयोग निरंतर संगठित आपराधिक गतिविधि के साक्ष्य के बिना किसी अकेली घटना के लिए नहीं किया जाना चाहिए यद्यपि सट्टा माफियाओं के मामले में संगठित अपराध के साक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट प्रतीत होते हैं लेकिन पुलिस को यह सुनिश्चित करना होता है कि कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह से पालन हो ताकि ये अपराधी तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर अदालत से आसानी से बरी न हो जाएं

कानूनी पेंच 150 साल पुराना कानून और 50 रुपये का जुर्माना
​सट्टे और जुए के खिलाफ पुलिस की जो भी कार्रवाई होती है उसका आधार मुख्य रूप से सार्वजनिक जुआ अधिनियम 1867 है आप सोचिए यह कानून औपनिवेशिक काल का है अंग्रेजों के जमाने का और आज के इस डिजिटल मोबाइल युग में इसके प्रावधान कई बार बहुत ही बौने साबित होते हैं इस अधिनियम की धारा 13 पुलिस अधिकारी को यह अधिकार देती है कि वह बिना वारंट किसी भी व्यक्ति को जो किसी सार्वजनिक स्थान पर जुआ खेलते पाया जाए उसे गिरफ्तार कर सकता है और उसके जुआ उपकरणों को जब्त कर सकता है लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इस अपराध के लिए सजा क्या है अधिकतम एक महीने का कारावास या सिर्फ पचास रुपये का जुर्माना

​पचास रुपये का जुर्माना आज के समय में क्या मायने रखता है जब सट्टेबाज एक रात में लाखों करोड़ों रुपये का खेल कर रहे हों पचास रुपये में तो आज के समय में ढंग का खाना नहीं आता और हम उस जुर्माने से लाखों का सट्टा चलाने वालों को डराने की उम्मीद कर रहे हैं यह एक ऐसी कानूनी विसंगति है जो अपराधियों के मन से कानून का डर पूरी तरह खत्म कर देती है हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने कामरान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया इस मामले में सिकंदरा क्षेत्र के एक पार्क में ताश खेलते पकड़े गए आरोपियों ने यह दलील दी थी कि चूंकि इस अपराध में सजा तीन साल से कम है इसलिए यह असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और पुलिस मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना जांच या गिरफ्तारी कर ही नहीं सकती

​लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि चूंकि धारा 13 पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी का विशेष अधिकार देती है इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 सी के तहत यह एक संज्ञेय अपराध माना जाएगा और पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह से वैध है हालांकि दूसरी ओर एक अन्य पीठ ने कुछ पुराने मामलों में इसे असंज्ञेय भी माना था जिससे कानूनी स्थिति में कुछ जटिलता बनी रहती है इन कानूनी बहसों के बीच असली मुद्दा यह है कि एक 150 साल पुराने कानून के सहारे क्या 2026 के हाईटेक सट्टा माफियाओं पर कोई लगाम लगाई जा सकती है क्या वो समय नहीं आ गया है कि इन पुराने कानूनों में आमूल चूल परिवर्तन कर जुर्मानें और सजा को इतना कठोर बनाया जाए कि कोई भी व्यक्ति सट्टे की गद्दी सजाने से पहले सौ बार सोचे

​भ्रष्टाचार के खिलाफ पुलिस हेल्पलाइन और व्यवस्था की सच्चाई
​इन सबके बीच जब पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी बार बार सवाल उठते हैं तो आगरा के पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने एक सकारात्मक कदम उठाया है उन्होंने पुलिसकर्मियों के भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की शिकायत सीधे दर्ज कराने के लिए एक एंटी करप्शन हेल्पलाइन नंबर 7839860813 जारी किया है इस नंबर पर सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक कॉल कर कोई भी नागरिक पुलिसकर्मियों द्वारा अनुचित धन की मांग या भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज करा सकता है यह भी स्पष्ट किया गया है कि शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखी जाएगी और इस फोन में रिकॉर्डिंग की भी सुविधा मौजूद है ताकि रात में आए कॉल्स पर सुबह कार्रवाई की जा सके

​यह एक सराहनीय पहल जरूर है क्यो की अक्सर यह देखा गया है कि सट्टे और जुए के अड्डे बिना स्थानीय पुलिस की मिलीभगत के लंबे समय तक नहीं चल सकते जब कोई सट्टेबाज यह कहता है कि उसने पुलिस के न आने की गारंटी ले रखी है तो वह सीधे तौर पर पुलिस महकमे में मौजूद काली भेड़ों की ओर ही इशारा कर रहा होता है इस हेल्पलाइन नंबर के जारी होने से शायद उन पुलिसकर्मियों में कुछ खौफ पैदा हो जो चंद रुपयों के लालच में सट्टा माफियाओं को संरक्षण देते हैं आम जनता को भी जुआ और सट्टे के खिलाफ पुलिस को सूचना देने के लिए 112 नंबर डायल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है ताकि समाज को इस बुराई से बचाया जा सके

अंतहीन सवाल जो हमारी व्यवस्था को कठघरे में खड़े करते हैं
​इस पूरी भयानक तस्वीर को देखने के बाद मन में कई विचारोत्तेजक और व्यंग्यात्मक सवाल उठते हैं क्या यह संभव है कि गली मोहल्लों में 40 गुना मुनाफे का लालच देकर खुलेआम सट्टा खिलाया जा रहा हो और पुलिस की खुफिया इकाई को इसकी भनक तक न हो सोचिए वह कैसा पत्रकार होगा जो अपनी कलम छोड़कर सट्टे की गद्दी पर बैठ गया और मोबाइल ऐप से भाव तय कर रहा है क्या हमारे समाज ने अपराध को इतनी आसानी से स्वीकार कर लिया है कि अब कोई भी सफेदपोश पेशा इसका लबादा ओढ़ सकता है

​और वह सट्टेबाज जो होटल में महफिल सजाकर जुआरियों को यह गारंटी देता है कि पुलिस नहीं आएगी वह गारंटी आखिर किस भरोसे पर दी जाती है क्या उसने हमारा पूरा कानून खरीद लिया है या उसने व्यवस्था की कीमत लगा दी है जब पुलिस को जुआरियों को पकड़ने के लिए अपनी गाड़ी छोड़कर एंबुलेंस और ऑटो में छिपकर जाना पड़े तो यह पुलिस की चतुराई तो है लेकिन साथ ही यह भी दिखाता है कि अपराधियों का सूचना तंत्र राज्य के सूचना तंत्र से कितना ज्यादा मजबूत हो चुका है यह एक ऐसा व्यंग्य है जिस पर हंसा नहीं जा सकता बल्कि रोया जा सकता है क्यो की इस पूरे खेल में जो पैसा दांव पर लग रहा है वह उस दिहाड़ी मजदूर का है जिसके बच्चे घर में शायद भूखे सो रहे हैं

​कानून की किताब में आज भी पचास रुपये का जुर्माना लिखा है और हम उस जुर्माने से लाखों का सट्टा चलाने वालों को डराने की उम्मीद कर रहे हैं यह कैसा न्याय है और यह कैसी व्यवस्था है जहां एक तरफ गेंगस्टर एक्ट के तहत करोड़ों की कोठियां कुर्क हो रही हैं और दूसरी तरफ उसी शहर के दूसरे कोने में कोई नया शीतल कठेरिया कोई नया विजय जैन फिर से डायरी और पेन लेकर गरीबों की पर्चियां काट रहा होता है

एक धुंधला भविष्य और समाधान की उम्मीद
​सट्टे का यह जो कारोबार है वह केवल एक कानूनी अपराध नहीं है बल्कि यह एक बहुत बड़ी सामाजिक बीमारी है जो गरीबों की नसों में जहर की तरह फैल चुकी है आगरा पुलिस द्वारा लगातार की जा रही कार्रवाइयां गिरफ्तारियां और संपत्तियों की कुर्की यह तो दर्शाती हैं कि प्रशासन इस समस्या को लेकर अब कुछ गंभीर है लेकिन जब तक इस बीमारी की जड़ यानी उस लालच और संरक्षण को खत्म नहीं किया जाएगा तब तक यह समस्या हमेशा एक नए रूप में हमारे सामने आती रहेगी

​आज आवश्यकता इस बात की है कि केवल सट्टेबाजों पर ही नहीं बल्कि उन्हें संरक्षण देने वाले सफेदपोशों और भ्रष्ट अधिकारियों पर भी उतनी ही सख्ती से कार्रवाई हो पुलिस हेल्पलाइन 7839860813 जैसे कदम तभी सार्थक माने जाएंगे जब उन पर आने वाली शिकायतों पर बिना किसी भेदभाव के त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई होगी साथ ही 1867 के पुराने कानूनों को आधुनिक स्वरूप देकर उन्हें और अधिक कड़ा बनाने की सख्त आवश्यकता है ताकि कानूनी खामियों का फायदा उठाकर कोई भी अपराधी आसानी से न छूट सके।

​आगरा जो अपने सौंदर्य और इतिहास के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है उसे सट्टे के इस काले दाग से मुक्त करने के लिए समाज पुलिस और न्यायपालिका तीनों को मिलकर एक साझा लड़ाई लड़नी होगी अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब इस शहर की पहचान केवल उसके स्मारकों से नहीं बल्कि उसकी उन बर्बाद गलियों से होगी जहां कभी गरीबों के सपने सट्टे की पर्चियों पर दांव पर लगा करते थे और हार जाया करते थे यह स्थिति न केवल हमारे वर्तमान के लिए बल्कि हमारी भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी एक बहुत गंभीर चेतावनी है जिसे समय रहते समझा जाना चाहिए

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