विश्व गुरु भारत में मौत का आयात: इटली में हजारों लाशें बिछाने वाला ‘फॉरएवर केमिकल’ पीएफएएस (PFAS)भारत के रत्नागिरी में ‘विकास’ कैसे बन गया? जवाब नदारद

- रिपोर्ट मोहम्मद शाहिद कि कलम से
यह कहानी सिर्फ एक कारखाने के एक देश से दूसरे देश में जाने की नहीं है, बल्कि यह इस बात का खौफनाक दस्तावेज है कि कैसे ‘विकास’ और ‘विदेशी निवेश’ के नाम पर मौत का व्यापार किया जाता है। कल्पना कीजिए कि एक ऐसा रसायन है जो प्रकृति में कभी नष्ट नहीं होता, जो इंसान के शरीर में घुसकर उसकी रगों में सदियों तक जहर बनकर दौड़ता है, और जो पूरे के पूरे जल स्रोतों को एक लाइलाज बीमारी में बदल देता है। इटली के वेनेतो प्रांत में पीएफएएस (PFAS) नामक इसी रसायन को बनाने वाली मितेनी (Miteni) कंपनी ने लाखों लोगों की जिंदगियों को तबाह कर दिया, हजारों मौतों का कारण बनी और अंततः इटली की अदालतों ने इसे एक ‘पर्यावरणीय आपदा’ मानते हुए इसके अधिकारियों को 141 साल की जेल की सजा सुनाई । लेकिन पूंजीवाद के इस निर्मम दौर में जहर कभी मरता नहीं है; वह बस अपना भूगोल बदल लेता है। इटली में प्रतिबंधित और सील की जा चुकी इस जानलेवा फैक्ट्री की मशीनें, तकनीक और उसके पेटेंट चुपचाप समंदर पार कर भारत के महाराष्ट्र राज्य के रत्नागिरी जिले (लोटे परशुराम औद्योगिक क्षेत्र) में लाकर खड़े कर दिए गए हैं । भारत की लक्ष्मी ऑर्गेनिक इंडस्ट्रीज ने इसे नीलामी में खरीदा और देश के लचर पर्यावरण कानूनों का फायदा उठाते हुए इस मौत के कारखाने को फिर से चालू कर दिया है 3। जहां यूरोप इस ‘फॉरएवर केमिकल’ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है, वहीं भारत ने इसे अपने सीने से लगा लिया है। यह रिपोर्ट उसी ‘पर्यावरणीय उपनिवेशवाद’ की गहराई से पड़ताल करती है, जिसमें पश्चिमी देशों का कचरा और उनकी जानलेवा बीमारियां ग्लोबल साउथ के माथे मढ़ी जा रही हैं ।
इस पूरी त्रासदी को समझने के लिए हमें उस रसायन की फितरत को समझना होगा जो इस पूरी तबाही के केंद्र में है। विज्ञान की भाषा में इसे पीएफएएस (PFAS) यानी पर- और पॉलीफ्लोरोएल्काइल पदार्थ कहा जाता है । यह कोई एक अकेला रसायन नहीं है, बल्कि लगभग 15,000 से अधिक मानव-निर्मित रसायनों का एक विशाल और जटिल परिवार है । 1940 के दशक से ही औद्योगिक दुनिया ने इसे एक चमत्कारिक खोज मान लिया था क्योंकि इस रसायन का मुख्य काम चीजों को पानी, तेल, ग्रीस और अत्यधिक गर्मी से बचाना है । हमारे रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाले नॉन-स्टिक पैन, आग बुझाने वाले फोम, इलेक्ट्रॉनिक तारों की कोटिंग, वाटरप्रूफ जैकेट, छतरियां, और यहां तक कि त्वचा पर लगाए जाने वाले कॉस्मेटिक्स, हैंड सैनिटाइजर और वाटरप्रूफ मस्कारा में भी इसी रसायन का धड़ल्ले से उपयोग किया जाता है । लेकिन इस रसायन का जो गुण इसे उद्योगों के लिए इतना आकर्षक बनाता है, वही मानव जाति के लिए इसे सबसे बड़ा काल बना देता है। पीएफएएस रसायनों में कार्बन और फ्लोरीन का बॉन्ड इतना अभेद्य और मजबूत होता है कि यह प्रकृति में आसानी से टूटता या विघटित नहीं होता । इसी कारण इसे ‘फॉरएवर केमिकल्स’ (हमेशा रहने वाले रसायन) का खौफनाक नाम दिया गया है । यह पर्यावरण में सदियों तक ज्यों का त्यों बना रहता है। जब यह औद्योगिक कचरे के रूप में हमारी नदियों और जमीन में मिलता है, तो वहां से हमारे पीने के पानी और भोजन के जरिए सीधे हमारे शरीर में प्रवेश कर जाता है । हाल ही में बर्मिंघम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने यह भी साबित किया है कि कुछ छोटे कार्बन चेन वाले पीएफएएस रसायन तो त्वचा के जरिए भी सीधे हमारे रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं । यह रसायन शरीर के अंदर बायो-एक्यूमुलेट (bioaccumulate) होता है, यानी यह शरीर से बाहर नहीं निकलता बल्कि खून और अंगों में जमा होता रहता है । लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से गुर्दे (Kidney) और वृषण (Testicular) का कैंसर होता है, प्रजनन क्षमता नष्ट हो जाती है, प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ जाती है और हृदय रोग होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है । यह एक ऐसी खामोश मौत है जो इंसान को अंदर से खोखला कर देती है ।
इस ‘फॉरएवर केमिकल’ के विनाश का सबसे भयावह मंजर यूरोप के इटली में देखने को मिला। उत्तरी इटली के वेनेतो क्षेत्र के त्रिसिनो (विसेन्ज़ा) इलाके में मितेनी (Miteni S.p.A.) नाम की एक रासायनिक कंपनी थी, जिसे शुरुआत में 1960 के दशक में रीमार (RiMar) के नाम से स्थापित किया गया था 1। दशकों तक यह कंपनी रासायनिक और दवा उद्योगों के लिए इंटरमीडिएट्स और पीएफएएस रसायनों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करती रही । मुनाफे की अंधी दौड़ में इस कंपनी ने अपने जहरीले कचरे और रसायनों को चुपचाप आसपास की जमीन और पानी में रिसने दिया । 2013 के आसपास जब इटली के पर्यावरण और स्वास्थ्य अधिकारियों ने इसकी गहराई से जांच की, तो वे परिणामों को देखकर सन्न रह गए। पता चला कि मितेनी की लापरवाही के कारण यूरोप का दूसरा सबसे बड़ा भूमिगत जल स्रोत पूरी तरह से प्रदूषित हो चुका था । 100 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले इस दूषित पानी पर विसेन्ज़ा, वेरोना और पडुआ के करीब 21 कस्बों के 300,000 से 350,000 लोग निर्भर थे । लाखों बेगुनाह लोगों के शरीर में पीएफएएस का स्तर इटली के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (ISS) द्वारा तय की गई 8 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर (ng/mL) की सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक पाया गया । कंपनी के कुछ पूर्व कर्मचारियों के खून में तो यह स्तर 91,900 ng/mL तक दर्ज किया गया, जो कि किसी भी जीवित इंसान के लिए मौत के साये में जीने जैसा था । इस प्रदूषण का परिणाम यह हुआ कि उस क्षेत्र में पीएफएएस से जुड़ी हृदय संबंधी बीमारियों, किडनी कैंसर और टेस्टिकुलर कैंसर के कारण लगभग 3,800 से 4,000 अतिरिक्त मौतें (excess deaths) दर्ज की गईं । जब प्रशासन और सिस्टम सुस्त पड़ा था, तब वहां की आम जनता, विशेषकर माताओं ने इस मौत के खिलाफ एक अभूतपूर्व विद्रोह का झंडा बुलंद किया। ‘मामे नो पीएफएएस’ (Mamme No PFAS) यानी ‘मदर्स अगेंस्ट पीएफएएस’ के नाम से एक जमीनी आंदोलन खड़ा हुआ । ये वे माताएं थीं जिनके बच्चों के खून में जहर तैर रहा था। वे प्रदर्शनों में ऐसी टी-शर्ट पहनकर जाती थीं जिन पर उनके अपने शरीर में मौजूद पीएफएएस की मात्रा लिखी होती थी । इन माताओं के साथ ग्रीनपीस, आईएसडीई (ISDE – डॉक्टर्स फॉर द एनवायरनमेंट) और ‘मेडिसिना डेमोक्रेटिका’ जैसे संगठनों ने मिलकर सड़कों से लेकर अदालतों तक एक लंबी और थका देने वाली लड़ाई लड़ी । भारी जनदबाव, मुकदमों और वित्तीय संकट के चलते अंततः 2018 में मितेनी ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया और इतालवी अधिकारियों ने उस जानलेवा कारखाने को हमेशा के लिए बंद करवा दिया ।
कारखाना बंद होने के बाद विसेन्ज़ा की अदालत (Vicenza Court of Assizes) में एक ऐतिहासिक मुकदमा चला, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। चार साल तक चली 130 से अधिक अदालती सुनवाइयों और लगभग 300 नागरिक पक्षों के शामिल होने के बाद, 26 जून 2025 को अदालत ने अपना फैसला सुनाया । इस फैसले ने कॉरपोरेट जगत की चूलें हिला दीं। 15 आरोपियों में से 11 पूर्व अधिकारियों को पर्यावरण प्रदूषण, अवैध कचरा प्रबंधन और पानी में जहर घोलने जैसे संगीन अपराधों का दोषी पाया गया । इन दोषियों में मित्सुबिशी कॉर्पोरेशन और आईसीआईजी (ICIG) जैसे विशाल अंतरराष्ट्रीय समूहों के प्रबंधक भी शामिल थे 1। अदालत ने इन 11 अधिकारियों को कुल मिलाकर 141 साल जेल की कठोर सजा सुनाई, जिसमें व्यक्तिगत सजा 2 साल 8 महीने से लेकर अधिकतम 17 साल 6 महीने तक थी। इसके अलावा, अदालत ने दोषियों पर 58 मिलियन यूरो का भारी-भरकम जुर्माना लगाया, जो इटली के पर्यावरण मंत्रालय को मुआवजे के तौर पर दिया जाना था । नागरिक पक्षों और पर्यावरण संगठनों को भी भारी हर्जाना देने का आदेश दिया गया । एक अलग और मील का पत्थर माने जाने वाले फैसले में, अदालत ने मितेनी के एक पूर्व कर्मचारी पास्कुआलिनो ज़ेनेरे की मौत को सीधे तौर पर पीएफएएस के लंबे समय तक संपर्क से जुड़ा हुआ माना । इटली ने दुनिया को दिखा दिया था कि मुनाफे के लिए जनता की जान से खेलने वाले पूंजीपतियों को जेल की अंधेरी कोठरियों में भेजा जा सकता है।
लेकिन पूंजीवाद का चरित्र इतना शातिर है कि वह एक देश में अपनी मौत की घोषणा करता है और दूसरे देश में पुनर्जन्म ले लेता है। मितेनी की कहानी इटली में खत्म हो गई थी, लेकिन भारत के लिए वह बस एक शुरुआत थी। जब इटली में कारखाने को सील किया गया, तो उसकी मशीनें, उसकी तकनीक और उसके पेटेंट अभी भी सलामत थे । जून 2019 में दिवालिया हो चुकी मितेनी की संपत्तियों की नीलामी का आयोजन किया गया । इस नीलामी में बोली लगाने वाली एकमात्र कंपनी थी ‘वीवा लाइफसाइंसेज’ (Viva Lifesciences), जो कि भारत की एक प्रमुख रासायनिक कंपनी ‘लक्ष्मी ऑर्गेनिक इंडस्ट्रीज लिमिटेड’ की ही एक सहायक (subsidiary) कंपनी है । यह हैरानी की बात थी कि दुनिया के किसी और देश ने इस कलंकित कारखाने को खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन भारतीय कंपनी ने इसे अपने लिए एक ‘सुनहरे अवसर’ के रूप में देखा। लक्ष्मी ऑर्गेनिक ने मितेनी की प्रमुख मशीनरी, उत्पादन इकाइयां (जिसमें परफ्लूरिनेटेड पदार्थ, फ्लोरोएरोमैटिक्स और एक पायलट प्लांट शामिल था), तकनीकी दस्तावेज और पेटेंट खरीद लिए । 2021 से 2023 के बीच, इटली में इस प्रतिबंधित कारखाने को खोला गया, उसके कलपुर्जों को जहाजों पर लादा गया और चुपचाप मुंबई के बंदरगाह पर उतार दिया गया । महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में स्थित लोटे परशुराम औद्योगिक क्षेत्र (MIDC Lote Parshuram) की लाल पहाड़ियों और हरे जंगलों के बीच, इस इतालवी कारखाने का नया ढांचा फिर से खड़ा कर दिया गया । लक्ष्मी ऑर्गेनिक की मंशा बिल्कुल साफ थी—उसे पीएफएएस रसायनों के उस वैश्विक बाजार पर कब्जा करना था जो मितेनी के बंद होने से खाली हुआ था। 2024-2025 तक इस नई भारतीय फैक्ट्री में उत्पादन शुरू हो गया । जांच रिपोर्टों से यह पुख्ता हो गया कि कंपनी ने अपनी प्रयोगशालाओं और ‘पायलट प्लांट’ में पीएफएएस का निर्माण शुरू कर दिया है और मितेनी के पुराने ग्राहकों (जैसे ड्यूपॉन्ट, केमोर्स आदि) को व्यावसायिक नमूने भी भेज दिए हैं ।
इस पूरे घटनाक्रम में कॉरपोरेट की बेशर्मी और व्यवस्था की मिलीभगत साफ नजर आती है। लक्ष्मी ऑर्गेनिक के अध्यक्ष हर्षवर्धन गोयनका ने शेयरधारकों को यह कहकर गुमराह करने की कोशिश की कि इटली में मितेनी बिना किसी परेशानी के यूरोपीय मानकों के तहत चल रही थी । यह एक सफेद झूठ था जिसे 141 साल की जेल की सजा पहले ही बेनकाब कर चुकी थी। इससे भी अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि 2021 में स्थापित ‘लक्ष्मी ऑर्गेनिक इटली’ के निदेशक मंडल में एंटोनियो नार्डोन को बैठाया गया । यह वही एंटोनियो नार्डोन है जो मितेनी का अंतिम मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) था और जिसे इटली की अदालत ने पर्यावरण प्रदूषण के अपराध में 6 साल 4 महीने की जेल की सजा सुनाई थी । एक सजायाफ्ता अपराधी के साथ व्यापारिक गठजोड़ करना यह दर्शाता है कि मुनाफे के लिए हमारी कंपनियां किस हद तक गिर सकती हैं। पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance – EC) हासिल करने में भी कानूनी छिद्रों का भरपूर इस्तेमाल किया गया। शुरुआत में लक्ष्मी ऑर्गेनिक ने रत्नागिरी की इस फैक्ट्री के लिए महाराष्ट्र राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) से मंजूरी प्राप्त की । लेकिन विवादों से खुद को बचाने के लिए, इस मंजूरी को बड़ी ही चालाकी से अपनी ही 100% सहायक कंपनी ‘येलोस्टोन फाइन केमिकल्स प्राइवेट लिमिटेड’ के नाम पर स्थानांतरित (transfer) कर दिया । 2025 में इसी येलोस्टोन कंपनी ने उत्पादन के विस्तार के लिए भी मंजूरी हासिल कर ली । लोटे परशुराम औद्योगिक क्षेत्र का इतिहास पहले से ही बेहद दागदार रहा है। 1986 में इसके निर्माण के बाद से वहां के मछुआरों की आजीविका औद्योगिक कचरे के कारण पूरी तरह तबाह हो चुकी है । वहां का केंद्रीय जल उपचार संयंत्र आए दिन ग्रामीण बिजली कटौती के कारण बंद पड़ जाता है, और कारखाने अपना जहरीला, बिना उपचारित पानी सीधे स्थानीय नदियों और नालों में उड़ेल देते हैं । इसी बीमार और कमजोर व्यवस्था पर अब ‘फॉरएवर केमिकल’ का अतिरिक्त और जानलेवा बोझ डाल दिया गया है।
जब खोजी पत्रकारों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह ने ‘इनसाइड द ग्लोबल ट्रेड दैट मूव्स पीएफएएस डाउनस्ट्रीम’ (Inside the Global Trade that Moves PFAS Downstream) नाम से इस खौफनाक विस्थापन का पर्दाफाश किया, तो भारत में हाहाकार मच गया । स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने लोटे परशुराम में फैक्ट्री के गेट के बाहर भारी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए । उनकी मांग स्पष्ट थी—इस खतरनाक कारखाने की तुरंत जांच हो और इसे स्थायी रूप से बंद किया जाए। लोगों ने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो रत्नागिरी यूरोप के खतरनाक औद्योगिक कचरे का एक डंपिंग ग्राउंड बन जाएगा । सोशल मीडिया पर यह मामला एक तूफान की तरह फैल गया। इसे ‘पर्यावरणीय उपनिवेशवाद’ का खुला उदाहरण बताया गया । इंस्टाग्राम पर एक वीडियो को 17 लाख से ज्यादा लोगों ने लाइक किया, जबकि यूट्यूब पर एक अन्य वीडियो को 85 लाख लाइक्स और हजारों कमेंट्स मिले । चेंज डॉट ओआरजी (Change.org) पर याचिकाएं दायर की गईं।
सड़कों से शुरू हुआ यह बवाल जल्द ही राजनीति के गलियारों तक पहुंच गया। महाराष्ट्र के विधायक रोहित पवार ने खुलेआम रत्नागिरी के कारखाने पर प्रतिबंधित इतालवी उपकरणों का उपयोग करने और जानलेवा रसायनों का उत्सर्जन करने का आरोप लगाया और राज्य सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की । लेकिन सत्ता का रवैया हमेशा की तरह कॉरपोरेट के पक्ष में ही दिखा। महाराष्ट्र के तत्कालीन उद्योग मंत्री उदय सामंत ने मीडिया और जनता की चिंताओं को खारिज करते हुए इसे ‘राजनीतिक अतिशयोक्ति’ (political exaggeration) करार दिया । उन्होंने महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि कारखाने में ‘अब तक’ (so far) पीएफएएस रसायनों का निर्माण नहीं हुआ है । लेकिन खोजी पत्रकारों की रिपोर्ट ने सबूतों के साथ यह साबित कर दिया था कि कंपनी अपने ‘पायलट प्लांट’ में पीएफएएस का निर्माण कर चुकी है और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को इसके व्यावसायिक नमूने भेज रही है ।
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब इसकी गूंज देश की सर्वोच्च पंचायत यानी संसद तक पहुंची। 5 फरवरी 2026 को राज्यसभा में सांसद प्रमोद तिवारी ने एक अतारांकित प्रश्न (संख्या 699) के जरिए सरकार से सीधा सवाल किया कि क्या रत्नागिरी के रासायनिक संयंत्र में उस इतालवी फर्म मितेनी की मशीनरी और तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसे पीएफएएस प्रदूषण घोटाले के बाद बंद कर दिया गया था, और क्या देश में पीएफएएस पर प्रतिबंध लगाने वाला कोई कानून मौजूद है? पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने जो लिखित जवाब दिया, वह किसी भी संवेदनशील नागरिक को डराने के लिए काफी था। मंत्री ने स्वीकार किया कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की जानकारी के अनुसार, लक्ष्मी ऑर्गेनिक इंडस्ट्रीज ने 2021-22 के दौरान इटली की मितेनी स्पा से विनिर्माण बुनियादी ढांचा खरीदा था । लेकिन सबसे बड़ी और खौफनाक सच्चाई यह थी जो मंत्री ने आगे बताई—”भारत में पीएफएएस (PFAS) के निर्माण पर प्रतिबंध लगाने वाला कोई विशिष्ट पर्यावरणीय नियम नहीं है” । उन्होंने बताया कि कृषि मंत्रालय के अनुसार कीटनाशक अधिनियम 1968 की अनुसूची में कुल 126 पीएफएएस सक्रिय पदार्थों (जिनमें 106 ट्राइफ्लोरो, 19 टेट्राफ्लोरो और 1 परफ्लोरो पदार्थ यानी लिथियम परफ्लूरो-ऑक्टेन सल्फोनेट शामिल हैं) को सूचीबद्ध किया गया है, और इनमें से करीब 44 का उपयोग देश में कीटनाशकों, कवकनाशकों और शाकनाशियों के रूप में किया जा रहा है । मंत्री ने कहा कि सरकार इनकी समीक्षा करती रहती है और फिलहाल केवल ट्राइफ्लुरलिन (Trifluralin) और ऑक्सीफ्लोरफेन (Oxyfluorfen) जैसे पीएफएएस कीटनाशकों का उपयोग प्रतिबंधित दायरे में है । उन्होंने यह भी दावा किया कि महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कारखाने को संचालन की सहमति (Consent to Operate) दी है और नवीनतम निरीक्षण (4 नवंबर 2025) के अनुसार वहां उत्सर्जन मानकों के भीतर है । यह जवाब अपने आप में एक विरोधाभास था; जब देश में पीएफएएस रसायनों को मापने, उन्हें नियंत्रित करने या उनके निर्माण पर रोक लगाने का कोई स्पष्ट और विशेष कानून ही नहीं है, तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आखिर किन मानकों के तहत कारखाने को क्लीन चिट दे रहा है? यह स्पष्ट था कि कानून में मौजूद इसी अंधे कुएं का फायदा उठाकर मौत का यह कारखाना भारत में अपनी जड़ें जमा रहा था।
जब हम इस पूरी जानकारी का गहराई से विश्लेषण करते हैं, तो इसके निहितार्थ (implications) अत्यंत भयावह और चिंताजनक नजर आते हैं। यह घटना महज दो कंपनियों के बीच मशीनरी की खरीद-फरोख्त का मामला नहीं है। यह ‘पर्यावरणीय उपनिवेशवाद’ (Environmental Colonialism) के उस सुनियोजित और क्रूर ढांचे का पर्दाफाश करती है जो आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था की कड़वी सच्चाई है ।
पश्चिमी देश, विशेषकर यूरोप और अमेरिका, अब पीएफएएस रसायनों के विनाशकारी परिणामों को लेकर बेहद सतर्क हो चुके हैं। यूरोपियन केमिकल एजेंसी (ECHA) ने हाल ही में 10,000 से अधिक प्रकार के पीएफएएस रसायनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए एक सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया (public consultation) शुरू की है, जिस पर जल्द ही अंतिम फैसला आने वाला है । पश्चिम में सख्त होते पर्यावरण कानूनों, कड़े उत्सर्जन मानकों और आम जनता की जागरूकता के कारण बहुराष्ट्रीय रासायनिक कंपनियों का वहां टिके रहना नामुमकिन होता जा रहा है। 58 मिलियन यूरो के जुर्माने और 141 साल की जेल जैसी सजाओं ने इन कंपनियों में दहशत पैदा कर दी है । इसका परिणाम यह हो रहा है कि ये कंपनियां अब अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर भारत जैसे ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के विकासशील देशों की ओर भाग रही हैं, जहां पर्यावरण कानून या तो बहुत कमजोर हैं या उनका पालन करवाने वाली संस्थाएं भ्रष्टाचार और सरकारी दबाव में पंगु हो चुकी हैं ।
भारत के लिए इसका सीधा अर्थ यह है कि हम विदेशी निवेश और ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (Ease of Doing Business) के नाम पर पश्चिमी दुनिया का वह कचरा और वह मौत अपने यहां ला रहे हैं, जिसे वहां के लोग अपने घरों से बाहर फेंक चुके हैं। रत्नागिरी के लोटे परशुराम जैसे औद्योगिक क्षेत्रों का पहले से ही लचर बुनियादी ढांचा इस नए और अजेय जहर का सामना करने में पूरी तरह असमर्थ है । इटली में मितेनी का कारखाना उस जगह पर था जहां का पर्यावरण ठंडा है और पानी के स्रोत विशाल हैं, फिर भी वहां 3,800 से ज्यादा लोगों की जान चली गई । इसके विपरीत, भारत के घनी आबादी वाले राज्य महाराष्ट्र में, जहां बारिश के दिनों में बाढ़ और गर्मियों में पानी की किल्लत रहती है, वहां अगर यह ‘फॉरएवर केमिकल’ भूजल में प्रवेश कर गया, तो तबाही का मंजर इटली से कई गुना ज्यादा वीभत्स होगा।
पीएफएएस पानी के जरिए हमारी कृषि प्रणाली में प्रवेश करता है। अगर उस दूषित पानी से सिंचाई की गई तो खेतों में उगने वाली सब्जियां और अनाज भी जहरीले हो जाएंगे । जब यह रसायन एक बार भारत की विशाल खाद्य श्रृंखला (food chain) में प्रवेश कर जाएगा, तो इसे पीढ़ियों तक इंसानी खून से बाहर निकालना विज्ञान के लिए भी असंभव हो जाएगा । राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की भूमिका भी इस मामले में सिर्फ ‘कागजी बाघ’ जैसी साबित हुई है । जब संसद में खुद सरकार स्वीकार कर रही है कि पीएफएएस को प्रतिबंधित करने का कोई विशेष कानून ही नहीं है, तो MPCB का यह दावा कि “उत्सर्जन मानकों के भीतर है”, एक क्रूर मजाक से ज्यादा कुछ नहीं लगता । सिस्टम का यह रवैया दिखाता है कि आर्थिक विकास के आंकड़ों को चमकाने के लिए सरकार अपने ही नागरिकों की स्वास्थ्य सुरक्षा को कॉरपोरेट मुनाफे की वेदी पर चढ़ाने के लिए तैयार है।
जब कोई खबर इतनी गंभीर, इतनी त्रासद और इतनी विरोधाभासी हो, तो कई व्यंग्यात्मक और विचारोत्तेजक सवाल खुद-ब-खुद उठ खड़े होते हैं। एक ऐसा देश जो खुद को ‘विश्वगुरु’ कहता है, वह विदेशी मौत का कबाड़खाना कैसे बन गया?
- क्या इटली के फेफड़ों और रत्नागिरी के फेफड़ों में जाने वाली हवा अलग है? जो मशीनें, जो रसायन और जो तकनीक इटली में लोगों के गुर्दे और जिगर को गला रही थी, क्या रत्नागिरी की आबोहवा में आते ही वे रसायन ऑक्सीजन उगलने लगेंगे? इटली में जो पदार्थ ‘पर्यावरणीय आपदा’ घोषित हो चुका है, वह भारत के उद्योग मंत्री की नजर में ‘विकास का प्रतीक’ और ‘राजनीतिक अतिशयोक्ति’ कैसे बन जाता है? क्या हमारे देश में मौत का कोई अलग मापदंड है?
- नैतिकता के किस गटर में बैठी है हमारी कॉरपोरेट दुनिया? इटली की जिस अदालत ने एंटोनियो नार्डोन को पर्यावरण को बर्बाद करने के अपराध में 6 साल से ज्यादा की सजा सुनाई, उसी सजायाफ्ता व्यक्ति को भारत की एक कंपनी अपने इटली के निदेशक मंडल में बड़े ही सम्मान के साथ बैठाती है । क्या कॉरपोरेट की दुनिया में बेशर्मी का कोई वैश्विक पुरस्कार भी होता है जिसे जीतने के लिए हमारी कंपनियां इतनी बेताब हैं?
- क्या हमारे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केवल मुहर मारने की मशीनें रह गए हैं? जिस प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को यह भी नहीं पता कि पीएफएएस रसायनों का परीक्षण कैसे किया जाता है, क्योंकि देश में इसका कोई कानून ही नहीं है, वह किस आधार पर कंपनी को ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ (Consent to Operate) बांट रहा है? क्या MPCB वास्तव में पानी की जांच कर रहा है, या इस देश की जनता के सब्र और उनकी खामोशी की जांच कर रहा है?
- क्या विकास की भूख में हम पश्चिमी देशों का कूड़ादान बन गए हैं? यूरोप जिस कचरे को अपने यहां बैन कर रहा है, हम उसे नीलामी में पैसा देकर खरीद कर ला रहे हैं। क्या ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का मतलब अब यूरोप के छोड़े हुए और अदालत से सजा पाए हुए जानलेवा कारखानों को अपने माथे पर सजाना रह गया है?
- क्या ‘कानून नहीं है’ कहकर सरकार मौत का लाइसेंस बांट सकती है? संसद में मंत्री जी बड़े शांत भाव से कहते हैं कि पीएफएएस पर रोक लगाने का कोई विशेष कानून भारत में नहीं है । जब आपको पता है कि यह जहर है, जब पूरी दुनिया इसे हमेशा के लिए बैन कर रही है, तो आपको कानून बनाने से किसने रोका है? क्या कानून तब बनाया जाएगा जब रत्नागिरी के हर घर में कैंसर का एक मरीज तड़प रहा होगा और बच्चे बिना इम्युनिटी के पैदा हो रहे होंगे?
इटली के त्रिसिनो शहर से शुरू हुआ मौत का यह खौफनाक सफर भारत के रत्नागिरी में आकर भले ही अपना डेरा जमा चुका है, लेकिन इस त्रासदी का अंत अभी तय नहीं है। लक्ष्मी ऑर्गेनिक और उसकी सहायक कंपनी येलोस्टोन फाइन केमिकल्स द्वारा स्थापित इस कारखाने का उत्पादन शुरू होना सिर्फ एक व्यावसायिक खबर नहीं है; यह भारत के पर्यावरणीय भविष्य, नागरिकों के स्वास्थ्य और हमारी आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा पर बज रही खतरे की एक विशाल घंटी है।
यह पूरी स्थिति स्पष्ट रूप से यह साबित करती है कि भारत के पर्यावरण कानून और नीतियां वैश्विक मानकों से दशकों पीछे चल रहे हैं। ‘विकास’ और ‘विदेशी निवेश’ के नशे में हम यह भूल गए हैं कि बिना सख्त नियमों के लाया गया औद्योगिक विकास अंततः एक सामूहिक आत्महत्या का रूप ले लेता है। जब तक भारत सरकार पीएफएएस और ऐसे अन्य ‘फॉरएवर केमिकल्स’ पर एक स्पष्ट, सख्त और पारदर्शी नियामक नीति (regulatory policy) नहीं लाती, तब तक विदेशी कंपनियों और मुनाफे के भूखे उद्योगपतियों के लिए भारत एक बेहद सुरक्षित और सस्ता ‘डंपिंग ग्राउंड’ बना रहेगा 4।
हमें इटली की उन जुझारू माताओं (‘Mamme No PFAS’) से सीखना होगा, जिन्होंने अपने बच्चों की रगों में दौड़ते जहर को देखकर चुप बैठना या नियति को दोष देना स्वीकार नहीं किया । उन्होंने सड़कों पर उतरकर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और व्यवस्था से न्याय छीन कर लिया । आज वक्त की मांग है कि रत्नागिरी में उठ रही विरोध की आवाजों को दबाने के बजाय उन्हें गंभीरता से सुना जाए । उद्योग और निवेश किसी भी देश के विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन अगर उस विकास की कीमत नागरिकों की जान, कैंसर से तड़पते बच्चों, दूषित पानी और हमेशा के लिए बंजर हो चुकी जमीन से चुकानी पड़े, तो ऐसा विकास हमें नहीं चाहिए।
अगर आज हमने इस ‘हमेशा रहने वाले’ जहर को रत्नागिरी की लाल मिट्टी में ही नहीं रोका, तो कल हमारी आने वाली पीढ़ियां हमारे विकास के इन खोखले दावों पर नहीं, बल्कि उस पानी पर रोएंगी जो उनकी प्यास बुझाने के बजाय उनकी उम्र को कम कर रहा होगा। फैसले का वक्त अब आ चुका है। भारत सरकार, न्यायपालिका और समाज को तय करना है कि वे अपनी नदियों में जीवन बहते हुए देखना चाहते हैं, या फिर कॉरपोरेट मुनाफे से भरा हुआ फॉरएवर जहर। उम्मीद है कि यह देश उस दिन का इंतजार नहीं करेगा जब रत्नागिरी की माताएं भी अपने खून में घुले पीएफएएस का पोस्टर लेकर दिल्ली की सड़कों पर न्याय की गुहार लगाने के लिए मजबूर हो जाएं।