अमेरिका के दुश्मनों को न्यूयॉर्क आकर बोलने की छूट क्यों:आज ईरानी राष्ट्रपति पजशकियान जाएंगे; पहले कब-कब ऐसा हुआ, 5 किस्से- INA NEWS

अमेरिका ने ईरान के साथ जंग छेड़ने के पहले ही दिन ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के घर पर हमला किया। इसमें खामेनेई और उनके 4 करीबी परिवारवालों की मौत हो गई। अब तक इस जंग में आधे से ज्यादा ईरानी लीडरशिप और 8 हजार से ज्यादा ईरानी मारे जा चुके हैं। अमेरिका के डर से ही नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई अब तक सामने नहीं आए हैं। लेकिन 7 महीने बाद अब ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान न्यूयॉर्क पहुंचने वाले हैं। वे हर साल होने वाले यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (UNGA) में आज भाषण देंगे। उनके साथ विदेश मंत्री अब्बास अरागची भी होंगे। इन नेताओं को अपना दुश्मन मानने वाले अमेरिका ने ही इन्हें वीजा दिया है। ऐसा पहली बार नहीं है कि अमेरिका ने अपने विरोधी नेताओं को UNGA में शामिल होने के लिए वीजा दिया हो और उन नेताओं ने न्यूयॉर्क आकर अमेरिका को कोसा हो। भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे, ऐसे ही 5 चर्चित किस्से… क्यूबा क्रांति के बाद जनवरी 1959 में फिदेल कास्त्रो ने सत्ता संभाली। अमेरिका इससे नाराज था। इतना कि मार्च 1960 में अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने अपनी खुफिया एजेंसी CIA से कास्त्रो सरकार को उखाड़ फेंकने को कहा। हालांकि, सितंबर 1960 में हो रही UNGA के लिए फिदेल कास्त्रो और उनके डेलिगेशन को वीजा देना पड़ा। 19 सितंबर को कास्त्रो न्यूयॉर्क पहुंचे। मैनहटन के शेल्बर्न होटल में उन्होंने बुकिंग कराई थी, लेकिन होटल ने उन्हें ठहराने से मना कर दिया। वे हार्लम के थेरेसा होटल में शिफ्ट हो गए। थेरेसा होटल में कास्त्रो की मुलाकात सोवियत लीडर निकिता ख्रुश्चेव, मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर और भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से हुई। सिविल राइट्स एक्टिविस्ट मैल्कम एक्स और कई अफ्रीकी-अमेरिकी नेता भी उनसे मिलने पहुंचे। 26 सितंबर 1960 को कास्त्रो ने UNGA में भाषण शुरू करते हुए कहा, ‘कहा जाता है कि मैं लंबे भाषण देता हूं, लेकिन आपको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं छोटा भाषण ही दूंगा।’ हालांकि कास्त्रो ने इसके उलट किया और UNGA के इतिहास का सबसे लंबा भाषण दे डाला। 269 मिनट यानी 4 घंटे 29 मिनट तक वो बोलते रहे। कास्त्रो ने अमेरिका पर लैटिन अमेरिका में दखल देने और तानाशाही को शह देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि क्यूबा क्रांति केवल एक तानाशाह (बतिस्ता) के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ थी, जिसने क्यूबा को अमेरिका का गुलाम बना रखा था। कास्त्रो ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जॉन एफ. कैनेडी और रिचर्ड निक्सन पर जमकर निशाना साधा। कैनेडी को ‘अनपढ़ और अज्ञानी करोड़पति’ तक कह डाला, जबकि निक्सन को राजनीतिक बुद्धि से कमजोर बताया। 1974 में फिलिस्तीन देश की मांग के लिए बने फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) को अमेरिका और इजराइल आतंकी संगठन मानते थे। लेकिन 14 अक्टूबर 1974 को UNGA ने PLO को फिलिस्तीनी जनता का आधिकारिक प्रतिनिधि मान लिया और उन्हें भाषण देने के लिए बुलाया। इजराइल और अमेरिका ने इसका विरोध किया, लेकिन अमेरिका को वीजा देना पड़ा। महीने भर बाद 13 नवंबर 1974 को PLO के मुखिया यासिर अराफात UNGA पहुंचे। ऐसा पहली बार हुआ कि UN के किसी गैर-सदस्य संगठन के नुमाइंदे को UNGA में भाषण देने मिला। 80 मिनट के भाषण में उन्होंने फिलिस्तीनियों के लिए आजाद देश की मांग की। अराफात ने कहा, ‘मैं एक विद्रोही हूं और आजादी ही मेरा मकसद है। क्रांतिकारी और आतंकवादी में फर्क सिर्फ इतना है कि कौन किस वजह से लड़ रहा है? जो कब्जा और शोषण करने वाले हैं वही असली आतंकी हैं, न कि वे जो आजादी के लिए लड़ते हैं।’ आखिर में उन्होंने कहा, ‘आज मैं एक हाथ में जैतून की डाली और दूसरे हाथ में एक स्वतंत्रता सेनानी की बंदूक लेकर आया हूं। जैतून की डाली को मेरे हाथ से गिरने मत दीजिए।’ अराफात की ये लाइनें आज भी मशहूर हैं। उनकी एक तस्वीर भी काफी चर्चित है, जिसमें उनकी जैकेट से एक होल्स्टर झांकता दिखता है। यह विवाद भी रहा कि मंच पर जाने से पहले उन्होंने पिस्तौल उतारी थी या नहीं। अराफात के भाषण के 9 दिन बाद 22 नवंबर 1974 को UNGA ने PLO को ऑब्जर्वर का दर्जा दे दिया। इसे फिलिस्तीनी मुद्दे को पहली बार दुनिया में मान्यता मिलने की शुरुआत माना जाता है। 19 सितंबर 2006 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने UNGA में भाषण दिया। उन्होंने इराक और अफगानिस्तान में जारी अमेरिकी जंगों को ‘आजादी और लोकतंत्र’ की लड़ाई बताया, जबकि दोनों देश अमेरिकी सेना के कब्जे में थे। अगले ही दिन 20 सितंबर को वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज उसी पोडियम पर पहुंचे। भाषण की शुरुआत में उन्होंने कैथोलिक क्रॉस बनाते हुए कहा, ‘कल यहां शैतान आया था। ठीक यहीं। आज भी यहां गंधक की बदबू आ रही है। कल अमेरिका के राष्ट्रपति, जिन्हें मैं शैतान कहता हूं, यहां आकर ऐसे बोले जैसे पूरी दुनिया के मालिक हों।’ शावेज ने बुश की पॉलिसी को ‘बमों और गोलियों से थोपा गया लोकतंत्र’ बताया। उन्होंने UN सिक्योरिटी काउंसिल में सुधार और वीटो पावर खत्म करने की मांग रखी। दिलचस्प बात है कि उस दिन UNGA में कोई सीनियर अमेरिकी एम्बेस्डर नहीं था, सिर्फ एक जूनियर नोट-टेकर मौजूद था। बाद में अमेरिका के तत्कालीन UN एम्बेस्डर जॉन बोल्टन ने शावेज के भाषण को अपमानजनक और अंतरराष्ट्रीय मामलों को देखने का ‘कॉमिक-स्ट्रिप’ नजरिया करार दिया, यानी बचकाना और कार्टूनिश बताया। सितंबर 1969 में लीबियाई सेना के कैप्टन मुअम्मर गद्दाफी ने राजा इदरीस प्रथम का तख्तापलट कर दिया। गद्दाफी ने अमेरिका विरोधी नीतियां अपनाईं और परमाणु प्रोग्राम शुरू किया। इससे नाराज अमेरिका ने लीबिया को ‘आतंकवाद प्रायोजक देश’ घोषित कर दिया। सत्ता संभालने के 40 साल बाद पहली बार गद्दाफी अमेरिका पहुंचे और 23 सितंबर 2009 को उन्होंने UNGA में पहला भाषण दिया। भूरे बेडुइन चोगे, काली टोपी, काला चश्मा, सीने पर अफ्रीका महाद्वीप जैसा ब्रोच पहने और लाल रूमाल लिए गद्दाफी ने खुद को ‘अफ्रीकी राजाओं का राजा’ बताया। गद्दाफी ने आरोप लगाया कि UN अपनी स्थापना के बाद से दुनिया में हुई 65 जंगें रोकने में नाकाम रहा। इसे सुरक्षा परिषद नहीं, बल्कि आतंक परिषद कहा जाना चाहिए। गद्दाफी को बोलने के लिए 15 मिनट मिले थे, लेकिन वे नोटबुक से फाड़े गए पीले-बिखरे पन्नों से 96 मिनट तक भाषण देते रहे। लंबे भाषण की वजह से साभागार आधा खाली हो गया। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और UN में अमेरिकी एम्बेस्डर सुजैन राइस तक बाहर चली गईं। पीछे सिर्फ जूनियर नोट-टेकर बैठे रहें। गद्दाफी का खुद का ट्रांसलेटर भी थक गया और उसने बीच में भाषण छोड़ दिया। UN स्टाफ को उसकी जगह लेनी पड़ी। भाषण के आखिर-आखिर में गद्दाफी ने UN चार्टर की एक कॉपी हाथ में उठाई, उसके कुछ हिस्से जोर से पढ़े और उसे हल्का-सा फाड़कर पीछे उछाल दिया। कहा कि सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों को मिला वीटो चार्टर की भावना के खिलाफ है। इसे खत्म होना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को ‘हमारा बेटा’ कहकर सराहा- ‘हम अफ्रीकी खुश और गर्वित हैं कि अफ्रीका का एक बेटा अमेरिका पर राज कर रहा है।’ उसी दिन बाद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने UNGA में जवाब दिया कि वे UN चार्टर को दोबारा स्वीकार करने आए हैं, उसे फाड़ने नहीं। UN की प्रवक्ता मिशेल मोंटास ने चार्टर के अपमान को अस्वीकार्य बताया। 23 सितंबर 2010 की सुबह ओबामा ने UNGA में ईरान से बातचीत की पेशकश करते हुए नरम लहजे में भाषण दिया। हालांकि कुछ ही घंटों बाद ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद मंच पर पहुंचे, तो माहौल पलट गया। अहमदीनेजाद ने 9/11 हमलों को लेकर 3 थ्योरी गिनाईं। पहली- एक ताकतवर आतंकी गुट ने अमेरिकी खुफिया तंत्र को चकमा देकर इसे अंजाम दिया; दूसरी- खुद अमेरिकी सरकार के कुछ लोगों ने डूबती अर्थव्यवस्था को संभालने, मिडिल-ईस्ट में पकड़ मजबूत करने और जायोनी शासन (इजराइल) को बचाने के लिए यह हमला रचा और तीसरी- यह किसी आतंकी गुट का काम था, जिसका अमेरिकी सरकार ने फायदा उठाया। अहमदीनेजाद ने 9/11 के लिए अमेरिकी सरकार को ही घेरते हुए दावा किया कि बहुसंख्यक अमेरिकी, दुनिया के ज्यादातर देश और नेता इससे (दूसरी थ्योरी) से सहमत हैं। उन्होंने इसकी जांच के लिए एक अंतरराष्ट्रीय फैक्ट-फाइंडिंग टीम बनाने की मांग भी रखी। दूसरी थ्योरी सुनते ही अमेरिका समेत 33 डेलिगेशन सागाभाग से बाहर निकल गए। इनमें कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कोस्टा रिका और यूरोपीय संघ के सभी 27 देश शामिल थे। अमेरिकी मिशन के प्रवक्ता मार्क कॉर्नब्लाऊ ने कहा कि अहमदीनेजाद ‘घटिया साजिश का दावा और यहूदी-विरोधी बकवास’ कर रहे हैं। वाइट हाउस ने भी बयान जारी किया कि राष्ट्रपति ओबामा को यह टिप्पणियां ‘बेहद आक्रामक और आपत्तिजनक’ लगीं, खासकर इसलिए क्योंकि यह उसी न्यूयॉर्क शहर में की गईं, जहां वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतें गिरी थीं। आखिर अमेरिका अपने सबसे बड़े दुश्मन को अपनी ही जमीन पर क्यों आने देता है? इसका जवाब 79 साल पुराने एक समझौते में है… यही वजह है कि जंग के बीच अमेरिका कानूनी तौर पर ईरानी डेलिगेशन को रोक नहीं सकता। हालांकि अमेरिका डेलिगेशन की आवाजाही सीमित कर सकता है। ऐसा हो भी रहा है। इस बार के UNGA के लिए पहुंचने वाला ईरानी डेलिगेशन सिर्फ UN मुख्यालय, ईरान के स्थायी UN मिशन, ईरानी राजदूत के आवास और जॉन एफ. कैनेडी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बीच आ-जा सकेंगे। कहीं और जाने के लिए उन्हें अमेरिकी सरकार से इजाजत लेनी होगी। अमेरिका ने ईरान से अपना डेलिगेशन छोटा रखने को कहा है। साथ ही उनके क्लब और बाजार जाने पर रोक लगा दी। लग्जरी शॉपिंग भी बैन कर दी। तो क्या अमेरिका विरोधी नेता को UNGA के लिए न्यूयॉर्क आने से रोक ही नहीं सकता? ‘हेडक्वार्टर एग्रीमेंट’ में अमेरिकी सरकार को एक अधिकार मिला है कि जिस व्यक्ति से ‘अमेरिका की सुरक्षा को खतरा’ हो, वे उसे रोक सकते हैं। इसी को आधार बनाकर अमेरिका ने 1988 में यासिर अराफात को वीजा नहीं दिया था। अमेरिकी विदेश विभाग ने तब कहा था कि PLO के आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के पुख्ता सबूत हैं। नतीजतन UNGA को उस साल अपना पूरा सत्र जिनेवा शिफ्ट करना पड़ा और अमेरिका को इसके लिए भारी आलोचना झेलनी पड़ी। अमेरिका ने 2025 और 2026 में भी फिलिस्तीनी अथॉरिटी के अध्यक्ष महमूद अब्बास को वीजा नहीं दिया। अमेरिका का कहना है कि PLO और फिलिस्तीनी अथॉरिटी अपने वादों पर खरे नहीं उतरे। वे इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के जरिए इजराइल-फिलिस्तीन विवाद को अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पिछली बार अब्बास ने UNGA में वर्चुअली भाषण दिया था। ऐसा इस बार भी होगा। हालांकि, अमेरिका को मिली इस छूट में बारीक फर्क है। दरअसल, अब्बास और PLO के अधिकारी UN के किसी पूर्ण सदस्य देश के प्रमुख नहीं, बल्कि एक गैर-सदस्य इकाई के नुमाइंदे हैं। इसलिए उन पर पाबंदी लगाना अमेरिका के लिए राजनीतिक और कानूनी तौर पर थोड़ा आसान है। ईरान जैसे किसी पूर्ण सदस्य देश के चुने हुए राष्ट्रपति को रोकना कहीं ज्यादा बड़ा कूटनीतिक कदम होगा और इससे अमेरिका पर ‘हेडक्वार्टर एग्रीमेंट’ तोड़ने का आरोप लगेगा। ————– ये खबर भी पढ़िए… चप्पल-लुंगी वाले हूती लड़ाके कौन, जिन्होंने सऊदी का F-15 जेट गिरा दिया; पाक-अमेरिका तक इनसे दूर क्यों भाग रहे पैरों में हवाई चप्पल, कमर में लुंगी, मुंह में कात दबाए हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब का F-15 फाइटर जेट गिरा दिया है। वो भी अपनी देसी बैलिस्टिक मिसाइल से। यमन की सऊदी समर्थित सेना की बख्तरबंद गाड़ियां छीन लीं और निशाना चूकी DF-15 मिसाइल भी उठा ले गए। हूतियों के हमले से इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का तक हाई अलर्ट पर है। पूरी खबर पढ़िए…

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