डीएफओ साहब! कहा गये 1 करोड 20 लाख पौधे?

🔴हर साल पौधरोपण का रिकॉर्ड, फिर भी हरियाली गायब!

🔵डीएफओ साहब! पेड़ दिखाइए, सिर्फ आंकड़े नहीं

🔴 पौधे लगाए या फाइलें हरी कीं? वन विभाग पर उठे बड़े सवाल

कुशीनगर। जनपद में पिछले तीन वर्षों से वृक्षारोपण के नाम पर हर साल नए-नए रिकॉर्ड बनाए जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024, 2025 और 2026 को मिलाकर करीब 1 करोड़ 20 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य और उपलब्धि बताई जा रही है। हर वर्ष अभियान चलता है, विभागीय अधिकारी पौधे लगाते हैं, प्रेस नोट जारी होते हैं और दावा किया जाता है कि जिले में हरियाली बढ़ रही है। लेकिन सवाल यह है कि यदि वास्तव में 1 करोड़ 20 लाख पौधे धरती पर लगाए गए थे, तो उनका अस्तित्व आखिर कहां है? आखिर जिले की तस्वीर में वह हरियाली क्यों नहीं दिखाई दे रही है? जिसका दावा सरकारी फाइलों में किया जा रहा है?

🔴करोड़ों पौधे, फिर भी हरियाली गायब

जानकारों का कहना है तीन वर्षों में 1 करोड़ 20 लाख पौधे लगाए गए है, तो उनका असर जिले के हर ब्लॉक, हर ग्राम पंचायत, हर सड़क और हर सरकारी भूमि पर साफ दिखाई देना चाहिए था। गांवों की तस्वीर बदलनी चाहिए थी। लेकिन हकीकत यह है कि आज भी जिले के अधिकांश क्षेत्रों में हरियाली का वही पुराना संकट दिखाई दे रहा है।यही वजह है कि आम लोगों के बीच यह चर्चा जोरो पर है कि आखिर पौधे लगाए गए थे या सिर्फ उनका रिकॉर्ड तैयार किया गया था।

🔴जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?

बेशक! वृक्षारोपण कोई मुफ्त का अभियान नहीं है। एक पौधे को तैयार करने, उसे नर्सरी से लाने, गड्ढा खोदने, रोपण कराने, मजदूरी देने, खाद-पानी, रखरखाव, निगरानी, ट्री गार्ड आदि सुरक्षा व्यवस्था तक पर लाखो रुपये सरकारी धन खर्च होता है।यही कारण है कि अब सवाल सिर्फ पौधों का नहीं, बल्कि जनता के गाढी कमाई का भी है। 

🔴 आम जनमानस के जेहन मे उठ रहे सवाल 

पौधरोपण के लिए जिले मे तीन वर्षों में कुल कितना बजट खर्च हुआ?प्रति पौधा औसतन कितना खर्च आया?पौधे बचाने के लिए कितना धन अलग से खर्च हुआ?पौधों की सुरक्षा का जिम्मा किसके पास था?

🔴 पौधा लगाना आसान, पेड़ बनाना मुश्किल

वन विभाग हर वर्ष पौधे लगाने की संख्या बताता है, लेकिन  यह कभी नही सार्वजनिक किया कि उन पौधों में से कितने आज जीवित हैं।जानकारों का कहना है कि वृक्षारोपण का असली पैमाना पौधों की संख्या नहीं, बल्कि उनका सर्वाइवल रेट होता है।यदि लाखों पौधे कुछ महीनों में ही सूख गए, तो यह केवल प्राकृतिक कारण नहीं माना जा सकता। यह निगरानी, संरक्षण और जवाबदेही का भी विषय बनता है।

🔴 डीएफओ का बयान ही खड़े कर रहा सवाल

सूत्र बताते है कि प्रभागीय वनाधिकारी स्वयं सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके हैं कि हर वर्ष बड़ी संख्या में पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन पर्याप्त देखभाल नहीं होने से वे पेड़ नहीं बन पाते।यदि ऐसा है, तो फिर हर वर्ष वही व्यवस्था दोहराई क्यों जा रही है?जब विभाग को पहले से समस्या की जानकारी है, तो उसे दूर करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए?

🔴सर्वाइवल रेट सार्वजनिक क्यों नहीं?

वन विभाग यदि दावा करता है कि लाखों पौधे लगाए गए हैं, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि कितने पौधे जीवित हैं?कितने पेड़ बन चुके हैं?किस ब्लॉक में सबसे अधिक पौधे बचे?किस विभाग का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा?किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई?यदि यह जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है, तो पूरे अभियान की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

🔴 जांच हो तो दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा साफ

पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि अब केवल पौधों की संख्या गिनने से काम नहीं चलेगा।जरूरत इस बात की है कि किसी स्वतंत्र एजेंसी से पूरे जिले में तीन वर्षों मे लगाये गये 1 करोड 20 लाख पौधों का भौतिक सत्यापन कराया जाए।यदि पौधे जीवित हैं, तो उनकी सूची सार्वजनिक की जाए।यदि नहीं बचे हैं, तो कारण और जिम्मेदारी दोनों तय किए जाएं।

 🔴 सवाल पे सवाल, जबाब दे विभाग

तीन वर्षों में कुल कितना धन खर्च हुआ?प्रति पौधा औसतन कितना खर्च आया?1 करोड़ 20 लाख में से कितने पौधे आज जीवित हैं?कितने पौधे पेड़ बन चुके हैं?पौधों के संरक्षण की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी? कितने स्थानों का भौतिक सत्यापन कराया गया?यदि पौधे नहीं बचे, तो अब तक किसके खिलाफ कार्रवाई हुई? सवाल केवल 1 करोड़ 20 लाख पौधों का नहीं, बल्कि उन पर खर्च हुए सार्वजनिक धन, उनकी सुरक्षा और पूरे अभियान की जवाबदेही का है।डीएफओ साहब! यदि करोड़ों पौधे धरती पर जीवित हैं, तो उन्हें सार्वजनिक कीजिए और यदि वे जीवित नहीं हैं, तो बताइए कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद वह हरियाली कहां गायब हो गई?

🔵 रिपोर्ट – संजय चाणक्य 

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