पुराने बूढ़े कानूनों के साये में नई पीढ़ी की जेन-जी पुलिस

परदादा के जमाने में बनाए गए पुराने कानूनों और उसी दौर की कार्यप्रणाली के तहत, जब आज की आधुनिक, शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष पुलिस की युवा पीढ़ी काम करने को मजबूर हो, तो उसके भीतर पैदा होने वाले तनाव और असंतोष को उससे बेहतर कौन समझ सकता है ?

आज पुलिस का सिपाही केवल 10 वीं पास युवक नहीं है। वर्ष 2011 से पहले न्यूनतम शैक्षिक योग्यता 10 वीं थी, जबकि अब यह 12वीं है। निजी अनुभव और किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, आज बड़ी संख्या में कांस्टेबल स्नातक, परास्नातक, B.Ed., BCA, B.Tech. तथा अन्य तकनीकी योग्यताएँ रखते हैं।

आज पुलिस कर्मी ,इंटरनेट, डिजिटल तकनीक, साइबर अपराध, सोशल मीडिया और आधुनिक संचार व्यवस्था को समझते हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है। कि उनकी शैक्षिक योग्यता और तकनीकी क्षमता आधुनिक हो गई है। जबकि पुलिस की कार्य संस्कृति और व्यवस्था का बड़ा हिस्सा आज भी 165 साल वाले बाबा आदम के पुराने ढर्रे पर कायम है।

युग बदला, पुलिस बदली, अपराध का स्वरूप बदला और तकनीक भी बदली,लेकिन पुलिस कर्मियों से काम लेने का तरीका शायद उतनी तेजी से नहीं बदला।

जो सिपाही कभी 10 वीं पास होकर भर्ती हुआ करता था, वही सिपाही विभागीय परीक्षाओं और पदोन्नति के माध्यम से आगे बढ़ते-बढ़ते इंस्पेक्टर और थाना प्रभारी तक पहुँचा। इनमें से बहुत-से अधिकारियों ने समय के साथ अपनी सोच और कार्यशैली बदली, लेकिन कुछ आज भी उसी औपनिवेशिक काल की मानसिकता के साथ काम करते आ रहे हैं।

जिसमें अधीनस्थ पुलिसकर्मी को इंसान से पहले केवल एक ड्यूटी करने वाली मशीन समझ लिया गया है।

पुलिस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यही है। कि सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक के लिए आज भी पुलिस एक्ट जैसी औपनिवेशिक विरासत की छाप दिखाई पड़ती है।

चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली पुलिस व्यवस्था ने पुलिसकर्मी के निजी जीवन, परिवार, नींद, स्वास्थ्य और मानसिक शांति को अत्यधिक प्रभावित किया है।

कई थानों में ड्यूटी बदलने के दौरान ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती हैं। कि पुलिसकर्मी को लगातार अत्यधिक लंबे समय 24 घण्टे तक काम करना पड़ता है।

लेकिन सवाल केवल काम के घंटों का नहीं है। सवाल यह है कि उस पुलिसकर्मी की बात सुनेगा कौन?

एक सिपाही का सीधा संपर्क पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों से नहीं होता। उसका वास्तविक सामना थाना प्रभारी, चौकी प्रभारी और तत्कालीन पर्यवेक्षी अधिकारियों से होता है। इसके लिए सबसे ज्यादा जवाबदेही थाना स्तर के मुख्य अधिकारियों की बनती है

इसलिए यदि किसी पुलिसकर्मी की समस्या को प्रारंभिक स्तर पर ही गंभीरता से सुन लिया जाए, तो शायद कई संकट वहीं समाप्त हो सकते हैं। लेकिन क्या धरातल पर ऐसा हो रहा है।

दुर्भाग्य से सैनिक सम्मेलन, नियमित संवाद और अधीनस्थ कर्मचारियों की व्यक्तिगत समस्याएँ सुनने की पुरानी स्वस्थ परंपराएँ कई स्थानों पर कमजोर पड़ गई हैं। छुट्टी पुलिसकर्मी के लिए सुविधा नहीं, बल्कि कई बार संघर्ष बन रही है। CISF की ताजा घटना इसका उदाहरण है।

कब छुट्टी बंद हो जाए और कब अचानक कोई अतिरिक्त ड्यूटी आ जाए। इस संबंध में कुछ भी कहना संभव नहीं है

यहाँ एक बड़ा सवाल है। क्या पुलिसकर्मी के भी मानवाधिकार हैं?

जब हम अपराधी के मानवाधिकारों की रक्षा की बात करते हैं, जो कानून और संविधान की अनिवार्य जिम्मेदारी है, तो उसी संविधान के अधीन सेवा कर रहे पुलिसकर्मी के जीवन, सम्मान, स्वास्थ्य, विश्राम और पारिवारिक जीवन के अधिकारों पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार क्यूँ नहीं होना चाहिए ?

पुलिसकर्मी कानून लागू करता है। लेकिन क्या उसके ऊपर लागू व्यवस्था भी मानवीय नहीं होनी चाहिए ?

और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है। कि पुलिस संगठन के अलग अलग स्तरों पर सुविधाओं और कार्य परिस्थितियों में इतना अंतर क्यूँ है ? उदाहरण जैसे दिल्ली पुलिस में HRA 30% वही दिल्ली जैसे आधुनिक सिटी नोएडा में HRA ऊँट के मुहॅ मे जीरे के समान है। फूड अलाउंस और वहां भत्ते में भी काफी असमानताये दिखाई पड़ती है।

वरिष्ठ अधिकारियों के लिए आवास, वाहन, आधुनिक संसाधन, घरेलू सहयोग और साप्ताहिक अवकाश जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जबकि थाने के निचले स्तर पर कार्यरत पुलिसकर्मी अक्सर लंबे समय तक ड्यूटी, सीमित विश्राम, छुट्टी की अनिश्चितता और लगातार मानसिक दबाव के बीच काम करता है।

यह तुलना किसी अधिकारी के अधिकारों का विरोध नहीं है। लेकिन सवाल यह है। कि क्या एक ही संगठन में नीचे से ऊपर तक मानवीय कार्य परिस्थितियों का न्यूनतम स्तर भी सुनिश्चित नहीं होना चाहिए ?

एक पुलिसकर्मी भी किसी का बेटा है, किसी का पति है। और किसी का पिता है। उसके भी परिजन उसका बेसब्री से इंतजार करते हैं। उसके शरीर को भी नींद चाहिए, उसके मन को भी विश्राम की जरूरत है। उसकी समस्याओं को भी प्रमुखता से सुने जाने की आज सर्वप्रथम थाना स्तर पर थाना प्रभारी के द्वारा,प्रबल आवश्यकता है।

जब एक शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष युवा को आधुनिक अपराध से लड़ने के लिए नियुक्त किया जाता है। लेकिन उसे काम करने के लिए पुरानी मानसिकता, अत्यधिक कार्यभार और मानवीय संवाद की कमी मिलती है, तो उसके भीतर तनाव बढ़ना स्वाभाविक है।

हर आत्महत्या के पीछे एक ही कारण नहीं होता। व्यक्तिगत, पारिवारिक, आर्थिक, स्वास्थ्य संबंधी और व्यावसायिक,अनेक कारण हो सकते हैं।

इसलिए किसी भी पुलिसकर्मी की आत्महत्या को केवल विभागीय दबाव से जोड़ देना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि किसी संगठन में बार-बार ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं । तो आज के बदलते भारत कि नई आधुनिक व्यवस्था को आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए।

क्योंकि किसी जवान की मौत केवल एक परिवार का दु:ख नहीं है। बल्कि व्यवस्था के लिए भी एक यक्ष प्रश्न है।

बल्कि यह पूरे पुलिस संगठन से पूछा गया एक सवाल है! क्या हमने अपने पुलिस कर्मी को बचाने के लिए उतनी ही चिंता की, जितनी उससे समाज को बचाने की अपेक्षा की जाती है ?

अब समय आ गया है। कि पुलिस सुधार केवल अपराध नियंत्रण, नये आधुनिक हथियार, वाहन और तकनीक तक सीमित न रहें। पुलिस सुधार का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र स्वयं पुलिसकर्मी होना चाहिए।

उसे आधुनिक तकनीक दीजिए, लेकिन आधुनिक कार्य संस्कृति भी दीजिए। उसे कानून पढ़ाइए, लेकिन उसके अधिकार भी सुनिश्चित कीजिए। उससे अनुशासन मांगिए, लेकिन उसे सम्मान भी दीजिए।

उससे 24 घंटे उपलब्ध रहने की अपेक्षा कीजिए, लेकिन उसके शरीर और मन को विश्राम का अधिकार भी दीजिए। और सबसे बढ़कर उसकी आवाज ऊपर तक पहुँचने का रास्ता खुला रखिए।उसकी समस्याओं का निस्तारण थाना स्तर पर कीजिए।

वरना हम हर रोज शहीदों को श्रद्धांजलि देते रहेंगे, स्मारकों पर पुष्प चढ़ाते रहेंगे, और हर वर्ष पुलिस स्मृति दिवस मनाते रहेंगे। और मंचों से शहीदों की वीरता की गाथाएँ सुनाते रहेंगे।

लेकिन यदि अपने जीवित सिपाही दरोगा की पीड़ा हम उसके जीवित रहते नहीं सुन पाए, तो सवाल केवल इतना रहेगा।

कि शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।”

आज थानों पर साप्ताहिक ड्यूटी बदली मे लगातार मशीन की तरह 24 घण्टे ड्यूटी, साइकिल भत्ता ₹ 200,मोटरसाइकिल भत्ता ₹ 700 कितना प्रासंगिक है। इस पर विद्वान साथियों के विचारों की जरूरत है।

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