UP News: रूसी क्रांति ने जगाई उम्मीदें, कानपुर बना आंदोलन का अड्डा और नोएडा में दमन चक्र… अब बस यादों में मई दिवस – INA

आज एक मई है, यानी मजदूर दिवस. एक जमाने में इसे मनाने के लिए मजदूरों को पुलिस या प्रशासन से न तो अनुमति लेनी होती थी न मजदूर संगठनों की रैली पर पुलिस निगाह रखती थी. मई दिवस मनाना मजदूरों का अधिकार है और इसका आयोजन उसी हंसी-खुशी से होता था जिस तरह दीवाली, होली, ईद और क्रिसमस डे. पर आज नोएडा में इतनी सख्ती है कि पुलिस हर आने-जाने वाले पर सख्त निगाह रखे हुए है. कई जगह बैरियर लगे हैं. फेज टू तो जाना मुश्किल है.

सरकार को शक है कि मजदूर आंदोलन में कुछ नक्सल तत्त्व जुड़े हुए हैं. नोएडा बना ही इसलिए था ताकि दिल्ली के नजदीक होने का लाभ उठाकर दिल्ली के कारखाने नोएडा शिफ्ट कर दिए जाएं. इससे राजधानी पर कारखानों का बोझ कम होगा. कालांतर में नोएडा इसी नजदीकी का लाभ उठा कर रिहायशी इलाका बन गया. कारखानों के नाम आवंटित भूखंडों का इस्तेमाल व्यापार के लिए होने लगा.

13 अप्रैल के बाद का दमन चक्र

अब नोएडा में अधिकांश फैक्टरियां फेज टू में हैं और वहां किसी भी श्रम कानून का पालन फैक्ट्री मालिक नहीं करते. काम के घंटे तय नहीं हैं. ओवर टाइम मिलता नहीं, बोनस कोई मालिक देता नहीं और इंक्रीमेंट भी कोरोना काल से बंद हैं. इसीलिए अभी 18 दिन पहले 13 अप्रैल को मजदूरों का गुस्सा फूट पड़ा और आंदोलनकारियों ने गाड़ी फूंक दी. इसके बाद जो दमन चक्र चला वैसा अतीत में कभी नहीं देखा गया.

नक्सल तत्त्वों के नाम पर पुलिस ने अनेक लोगों को जेल में ठूंस दिया. उनको भी जो न मजदूर थे न उनके आंदोलन में शरीक थे. मीडिया को कोई जानकारी नहीं दी गई. पुलिस अधिकारी मीडिया से बात तक करने को तैयार नहीं है. यह सब उत्तर प्रदेश में हुआ जिसके मजदूर आंदोलनों का लंबा इतिहास है किंतु इसके पहले कभी भी पुलिस ने वैसा तांडव नहीं किया जैसा नोएडा में देखने को मिला.

अब May-Day पर हर ओर पसरा सन्नाटा

एक जमाने में कानपुर को उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी और उत्तर भारत का मैनचेस्टर कहा जाता था. कानपुर में तो हर साल एक मई को मजदूर दिवस (मे डे) का आयोजन होता था. इस अवसर पर फूल बाग का मैदान खचाखच भरा होता. उस दिन शहर के सारे कारखाने बंद रहते, मजदूरों को उस दिन का अवकाश मिलता, यहां तक कि व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भी. किंतु वहां भी आज मजदूर दिवस बस कागजों में रह गया है.

फूलबाग के मैदान में अब कोई रैली नहीं होती और कानपुर के श्रमिक नेताओं में भी अब कोई नहीं बचा है. क्योंकि जब मजदूर ही नहीं हैं तो उनकी यूनियन कहां से बने! कानपुर में अनगिनत सूती मिलें थीं, जिनमें लाखों की संख्या में मजदूर थे. पर अब वे भुतही इमारतों की तरह खंडहर बन चुकी हैं. हिंदी पट्टी में कानपुर ही एक ऐसा शहर था, जहां पहली सूती मिल 1861 में लगी, एल्गिन कॉटन एंड स्पिनिंग मिल्स.

भूमिहीन किसानों के हिस्से में आया श्रम बेचना

1857 की क्रांति के दमन के बाद भारत पर से ईस्ट इंडिया कंपनी का राज खत्म कर दिया गया और भारत को सीधे ब्रिटेन की महारानी के अधीन कर दिया गया. तब अंग्रेजों ने यहां कारखाने लगाने की सोची. जमींदारों के जरिए किसानों से व्यावसायिक फसलें, जैसे नील और रूई उगाने का जोर डाला गया. कृषि भूमि पर से मालिकाना हक छीन लिए जाने से लाखों किसान भूमिहीन हो गए. चूंकि किसान खेती के अलावा और कुछ जानता नहीं इसलिए शहर आकर वह अपना श्रम बेचने लगा.

सस्ते श्रम को अंग्रेजों ने खरीदा और खूब मुनाफा कमाया. उस समय काम के घंटे तय नहीं थे. यहां तक कि कोई साप्ताहिक अवकाश भी नहीं. मिल के अंदर कोई हादसा हो जाने पर कोई मुआवजा नहीं न बीमारी की छुट्टी. उस समय यदि मजदूर काम के दौरान पेशाब तक करने जाता तो लोहे का एक भारी टिकट लाद कर ले जाना पड़ता था. मजदूर 1213 घंटे काम करता. 1918 तक यही स्थिति रही.

तब रूसी क्रांति ने उम्मीदें जगाईं

परंतु इसी बीच एक ऐसी घटना हुई जिसने दुनिया भर के मजदूरों के बीच उम्मीद की किरणें जगाईं. वह था रूस में जार शाही को उखाड़ फेक किसानों-मजदूरों ने अपना राज कायम किया. हालांकि इसके पहले 1886 में USA के शिकागो शहर में मजदूरों ने एक खूनी क्रांति की थी. उनकी मांग थी कि काम के घंटे आठ किए जाएं. शिकागो में चार मई 1886 को 3 से 4 लाख मजदूर एकत्र हो गए थे और इसी बीच किसी ने बम फोड़ दिया. इसमें असंख्य लोग मारे गए. उन शहीदों की स्मृति में एक मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है.

भारत में पहला मजदूर आंदोलन 1875 में बॉम्बे और फिर 1877 में नागपुर में हुआ किंतु अंग्रेजों ने कोई श्रम नीति नहीं बनाई. पर 20वीं सदी में मद्रास और कानपुर में एक-एक कर अनेक मजदूर आंदोलन उठ खड़े हुए. कानपुर में भी एल्गिन मिल के पंडित कामदत्त ने पहला मजदूर संगठन 1918 में बनाया.

कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र केस में मिली सजा

पंडित कामदत्त स्वयं एल्गिन मिल में मजदूर थे. इसलिए मजदूर उनके साथ जुड़ते चले गए. लेकिन यह संगठन बहुत छोटा और सीमित दायरे में था. आर्य समाज, कांग्रेस के सोशलिस्टों और कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व के मार्क्सवादियों ने कानपुर में मजदूरों के बीच संगठन बनाने शुरू किए. पंडित कामदत्त आर्य समाजी थे.

मजदूर नेता कामरेड सुदर्शन चक्र ने अपनी किताब कानपुर; मजदूर आंदोलन का इतिहास में लिखा है कि 17 जुलाई 1920 में कानपुर मजदूर सभा रजिस्टर्ड की गई. तब इसमें आर्य समाजी और कांग्रेसी ही थे. बाद में मार्क्स के विचारों के अनुयायी राधा मोहन गोकुल जी, मौलाना हसरत मोहानी, सत्य भक्त, कामरेड शौकत उस्मानी और गणेश शंकर विद्यार्थी भी जुड़े. इसी बीच 1924 की 14 मार्च को कामरेड एमएन रॉय, श्रीपाद अमृत डांगे, चेलुचेट्टियार, शौकत उस्मानी आदि के खिलाफ कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र केस बनाया गया. इन्हें चार साल की सजा भी हुई.

मजदूरों को संबोधित करने गांधी भी आए

कानपुर के मजदूरों को महात्मा गांधी, एनी बेसेंट ने भी संबोधित किया. इसके बाद से हर एक मई को कानपुर के फूल बाग चौराहे पर मजदूरों की रैली शुरू हो गई. इसमें देश के सभी बड़े मजदूर नेता शरीक होते थे. आखिरी रैली सन् 2000 में हुई.

श्रमिक नेता एडवोकेट कौशल शर्मा बताते हैं कि छह जनवरी 1948 को जेके जूट मिल के मजदूरों ने सवेतन अवकाश की मांग को ले कर जुलूस निकाला, जिस पर पुलिस ने जरीब चौकी के पास फ़ायरिंग कर दी. 6 मजदूर मारे गए, इसमें एक महिला भी थी. उनकी मूर्तियां जरीब चौकी पर लगी थीं और उनकी याद में छह जनवरी को मजदूरों की रैली होती थी, वह भी बंद हो गई. मगर इस हत्याकांड के बाद प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू चिंतित हुए और श्रमिकों के कल्याण के लिए कुछ कारगर कानून बनाने पर विचार करने लगे.

ESIC के पहले कार्ड धारक पंडित नेहरू

इस घटना के बाद ESIC की सुविधा कानपुर से ही शुरू की गई थी. 24 जनवरी 1952 को कानपुर में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस सुविधा को शुरू किया था और पहले कार्ड धारक भी वही बने. इस कार्ड के बन जाने से मजदूरों का इलाज मुफ्त होता और बीमारी के दौरान मजदूर को घर बैठे आधा वेतन मिलता रहता. कानपुर में इसका मुख्यालय भी है. ESIC ने औद्योगिक शहरों में बड़े अस्पताल भी खोले और मजदूर बस्तियों के बीच उनकी डिस्पेंसरियां भी थीं.

श्रम हितकारी केंद्र खोले गए. जिसके तहत मजदूरों के लिए लाइब्रेरी, फुटबॉल और हॉकी खेलने के मैदान बनाए गए और उनके मनोरंजन के लिए खुले में परदा लगा कर सिनेमा दिखाया जाने लगा. इसका सकारात्मक असर पड़ा और कानपुर में कांग्रेस की बल्ले-बल्ले हो गई. मगर कांग्रेस खुद इस खुशी को संभाल नहीं सकी.

लेबर कॉलोनी की शुरुआत की कहानी

पहले आम चुनाव (1952) के बाद पंडित नेहरू कानपुर आए तो यहां से लोकसभा के सदस्य हरिहर नाथ शास्त्री उन्हें कारखाना मजदूरों की रिहाइश दिखाने ले गए. तब अधिकतर मजदूर ग्वाल टोली में रहते थे. वहां किसी मजदूर की झोपड़ी के भीतर जब वे घुसे तो पाया झोपड़ी के भीतर धुआं भरा हुआ था. वे खांसते हुए बाहर आए और उसी दिन उन्होंने मजदूरों के लिए रिहायशी क्वार्टर बनाने की घोषणा की.

इस रिहायशी क्वार्टर में एक कमरा, एक बरामदा, उसी के एक कोने में रसोई तथा एक संडास एवं एक स्नान गृह. करीब 70 मीटर के इन दुमंजिले क्वार्टरों को बनाया जाने लगा. इसके लिए वित्तीय मदद केंद्र से मिलती और जमीन राज्य सरकारों को देनी पड़ती. इस तरह पहली श्रमिक बस्ती बनी शास्त्री नगर. इस कॉलोनी का नाम हरिहर नाथ शास्त्री की स्मृति में रखा गया. शास्त्री जी की 1953 में एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. वे ट्रेड यूनियन से जुड़े हुए नेता थे.

नेहरू नहीं माने तो सांसद का इस्तीफा

कानपुर मिलों, कारखानों और मजदूरों का लंबा इतिहास रहा है. हरिहर नाथ शास्त्री की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस से ही शिव नारायण टंडन लोकसभा का चुनाव जीते. उन्हीं दिनों कानपुर की म्योर मिल को प्रबंधन ने बंद करने का फैसला किया. मिल गेट पर मजदूर धरना दे कर बैठ गए. सांसद शिव नारायण टंडन ने मजदूरों को भरोसा दिलाया कि वे प्रधानमंत्री नेहरू से मिल खुलवाने के बारे में बात करेंगे और मिल में रिसीवर बिठवा देंगे.

उन्होंने मजदूरों से यह भी वायदा किया और यदि वे मिल खुलवाने में नाकाम रहे तो लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देंगे. टंडन ने अपनी बात पंडित नेहरू के समक्ष रखी किंतु नेहरू उनकी बात से सहमत नहीं हुए. टंडन ने लोकसभा से अपना इस्तीफा दे दिया और 1956 में कानपुर में लोकसभा के लिए उपचुनाव कराया गया. इस उपचुनाव में कांग्रेस हार गई.

कानपुर से कैसे कटा कांग्रेस का पत्ता

कांग्रेस ने इस उपचुनाव में छैल बिहारी दीक्षित कंटक को टिकट दिया उधर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) ने मजदूर नेता और स्वतंत्रता सेनानी राजा राम शास्त्री को. कांग्रेस का प्रत्याशी हार गया और राजा राम शास्त्री कानपुर से सांसद बन गए. लेकिन इसके बाद कानपुर में मजदूरों और मजदूर नेता खुद चुनाव में उतरने लगे.

1957 के आम चुनाव में कामरेड एसएम बनर्जी लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते. वे लगातार 20 साल कानपुर से लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते रहे. छैल बिहारी दीक्षित की हार के बाद कांग्रेस यह तो समझ गई कि कानपुर से जीतेगा कोई मजदूर नेता ही. इसलिए 1957 में उसने श्रमिक नेता सूरज प्रकाश अवस्थी को लड़ाया था. अवस्थी कांग्रेस की श्रमिक यूनियन की इकाई इंटक के नेता थे. उनके खिलाफ लड़ रहे एसएम बनर्जी भाकपा की लेबर यूनियन एटक के नेता थे. इस तरह कानपुर से कांग्रेस का पत्ता कट गया.

श्रम नीति पर चुप्पी के कारण गुस्सा फूटा!

पूरे उत्तर भारत में कानपुर मजदूरों का एक बड़ा शहर था. आजादी के पहले से यहां कई बड़ी मिलें चलती थीं. इसीलिए इसे उत्तर भारत का मैनचेस्टर कहा जाता था. मगर धीरे-धीरे मिलें बंद होने लगीं और ट्रेड यूनियनें दम तोड़ने लगीं. लाखों संगठित मजदूर यहां से पलायन को मजबूर हुए. कुछ दिहाड़ी के मजदूर बन गए और कुछ रिक्शा चलाने लगे, सब्ज़ी बेचने लगे या और किसी छोटे-मोटे काम में लग गए. उनको जो सुविधाएं मिलती थीं, सब खत्म हो गईं.

कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) की सुविधा बंद हो गई और प्रॉवीडेंड फंड की भी. जो इस बीच फूटकर इकाइयां लगीं उनमें न तो कम के घंटे तय थे न श्रम कल्याण की कोई सुविधा. मजदूर भी कानपुर से भाग कर दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद आ गए और यहां भी मजदूरों को कोई सुविधा नहीं मिली. जिस नोएडा पर उत्तर प्रदेश सरकार गर्व करती है, उसी में गत 13 अप्रैल को मजदूरों का गुस्सा फूटा.

शंभूनाथ शुक्ल
शंभूनाथ शुक्ल

पेशे से पत्रकार. राजनीतिक विश्लेषक. देश के कुछ बड़े अखबारों में कई संस्करणों के संपादक रहे.

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