UP News: सिर्फ आर्य समाज मंदिर का प्रमाणपत्र शादी का सबूत नहीं… इलाहाबाद HC ने रस्मों को लेकर कही अहम बात – INA

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सोमवार को कहा कि सिर्फ आर्य समाज मंदिर से जारी विवाह प्रमाणपत्र दिखाने से यह साबित नहीं हो सकता कि हिंदू मैरिज एक्ट के तहत वैध शादी हुई थी. कोर्ट ने कहा कि हिंदू शादी के लिए तय जरूरी रस्में पूरी होनी चाहिए. जस्टिस राजीव सिंह की बेंच ने सशस्त्र सीमा बल (SSB) के एक ऑफिसर को नौकरी से हटाने के फैसले को रद्द करते हुए यह बात कही. ऑफिसर को इस आधार पर नौकरी से हटा दिया गया था कि उसने अपने वैवाहिक स्थिति के बारे में गलत जानकारी दी थी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट में शिकायत में आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता (रोहित पांडे) ने शिकायत करने वाली (सुचेता तिवारी) से 2007 में एक आर्य समाज मंदिर में शादी की थी. अधिकारियों ने कथित शादी को मौजूदा शादी माना और पांडे के खिलाफ हटाने का आदेश पास करते समय इसी पर भरोसा किया.
पीटीआई न्यूज के अनुसार कोर्ट ने कहा कि विवाद असल में उस शिकायत के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पांडे ने तिवारी से एक आर्य समाज मंदिर में शादी की थी. याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि हिंदू रीति-रिवाजों से वैध शादी का कोई सबूत नहीं है और तिवारी ने खुद एक क्रिमिनल केस के ट्रायल के दौरान माना था कि शादी हिंदू रीति-रिवाजों और सप्तपदी के हिसाब से नहीं हुई थी.
आर्य समाज में शादी का दावा, HC ने नहीं माना वैध
दूसरी ओर, रेस्पोंडेंट अधिकारियों ने डिपार्टमेंटल इन्क्वायरी पर भरोसा किया, जिसमें तिवारी ने कहा था कि शादी अगस्त 2007 में आर्य समाज मंदिर में हुई थी. आर्य समाज मंदिर के पुजारी से भी पूछताछ की गई और उन्होंने कहा कि शादी उनकी मौजूदगी में हुई थी. नोटरी सर्टिफिकेट भी पेश किए गए. इसलिए अधिकारियों ने कहा कि पांडे ने सर्विस में आने पर यह कहकर गलत घोषणा की थी कि वह अविवाहित हैं.
हाई कोर्ट ने प्रिया बाला घोष बनाम सुरेश चंद्र घोष 1971 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया. कोर्ट ने कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट के तहत, शादी तभी वैध होती है जब वह हिंदू रीति-रिवाजों और सप्तपदी की जरूरी रस्मों के साथ की जाए. जरूरी बात यह है कि कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि शिकायत करने वाली ने खुद ट्रायल के दौरान कहा था कि शादी हिंदू रीति-रिवाजों से नहीं हुई थी. कोर्ट ने माना कि रिमूवल ऑर्डर में यह नतीजा कि याचिकाकर्ता की सुचेता तिवारी से शादी पहले ही हो चुकी थी, में कोई दम नहीं है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया ये आदेश
अधिकारियों ने इस आरोप पर भी भरोसा किया कि पांडे ने पहली शादी 16 अगस्त, 2007 को तिवारी से की थी और बाद में 13 दिसंबर, 2015 को दूसरी महिला, साधना तिवारी से शादी की.
हाई कोर्ट ने माना कि, प्रिया बाला घोष में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए कानून को देखते हुए, 2007 में हुई कथित शादी “कानून की नजर में शादी नहीं मानी जा सकती.” इसलिए, इसे पांडे को सर्विस के लिए अयोग्य ठहराने का आधार नहीं माना जा सकता.
हटाने के आदेश को सही नहीं मानते हुए, हाई कोर्ट ने 28 अप्रैल, 2022 के विवादित आदेश को रद्द कर दिया. रिट पिटीशन को मंजूरी दे दी गई और रेस्पोंडेंट्स को निर्देश दिया गया कि वे पांडे को तुरंत अपनी ड्यूटी पर वापस आने दें. हालांकि, 28 अप्रैल, 2022 से लेकर फैसले की तारीख तक के समय को “नो वर्क, नो पे” माना जाए, हालांकि इसे सर्विस में ब्रेक नहीं माना जाएगा.
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सिर्फ आर्य समाज मंदिर का प्रमाणपत्र शादी का सबूत नहीं… इलाहाबाद HC ने रस्मों को लेकर कही अहम बात
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