UP News: कमांडो सर्जरी-चौघड़ पोला, कोडवर्ड में छिपे राज; कानपुर किडनी कांड के मास्टरमाइंड ​रोहित का कैसे ढहा काला साम्राज्य? – INA

Kanpur kidney racket: अपराध की दुनिया में आमतौर पर हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी की कहानियां सुनने को मिलती हैं, लेकिन कानपुर में उजागर हुआ किडनी कांड इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला है. यह सिर्फ एक साधारण गिरोह नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट स्टाइल में संचालित एक संगठित सिंडिकेट था, जिसने इंसानी अंगों की तस्करी के लिए कोडवर्ड रखा था. पुलिस की गिरफ्त में आए मास्टरमाइंड रोहित ने जो खुलासे किए हैं, उसने हिला कर रख दिया है.

​इस सिंडिकेट की सबसे डरावनी बात इसकी कार्यप्रणाली थी. कानून और खुफिया एजेंसियों की नजर से बचने के लिए आरोपियों ने एक समानांतर भाषा विकसित कर ली थी. इस नेटवर्क में किडनी ट्रांसप्लांट को ‘कमांडो सर्जरी’ कहा जाता था. वहीं, अस्पतालों को ‘स्कूल’ और ‘कॉन्वेंट’ का नाम दे रखा था.

मरीजों के लिए क्या था कोडवर्ड?

आहूजा हॉस्पिटल को ‘आहूजा स्कूल’ और प्रिया हॉस्पिटल को ‘प्रिया कॉन्वेंट’ के नाम से पुकारा जाता था. यही नहीं, जेंडर के आधार पर मरीजों और डोनरों के नाम भी तय थे. पुरुष मरीज को ‘पांव’ और महिला मरीज को ‘पोला’ कहा जाता था. डॉ. सुरजीत आहूजा को ‘चौघड़ पांव’ और डॉ. प्रीति आहूजा को ‘चौघड़ पोला’ के कोडवर्ड से संबोधित किया जाता था.

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​रिसेप्शनिस्ट से मास्टरमाइंड तक का सफर

इस पूरे खेल का केंद्र बिंदु रोहित है. कभी गाजियाबाद में मजदूरी करने वाला यह युवक मेरठ के एक क्लीनिक में रिसेप्शनिस्ट बना. वहीं उसकी मुलाकात किडनी रैकेट के गुर्गों से हुई. सफेद कोट के पीछे छिपे काले कारोबार की बारीकियां सीखकर रोहित ने अपना खुद का साम्राज्य खड़ा कर लिया. 2019 में उसने कानपुर को अपना ‘हॉटस्पॉट’ बनाया और कल्याणपुर इलाके को अवैध ट्रांसप्लांट के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया.

​सोशल मीडिया और एजेंटों का हाईटेक जाल

​रोहित ने गिरफ्तारी से बचने के लिए एक ‘लेयर्ड’ सुरक्षा कवच बनाया था. वह कभी सीधे तौर पर मरीज (रिसिपिएंट) के संपर्क में नहीं आता था. मरीजों को लाने का काम देशभर में फैले एजेंटों का था, जिनका मुखिया शिवम अग्रवाल उर्फ ‘मार्शल’ था. वहीं, किडनी देने वाले ‘डोनर्स’ को फंसाने के लिए टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता था. आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों को टेलीग्राम के जरिए जाल में फंसाया जाता और फिर उन्हें कानपुर लाकर ‘कमांडो सर्जरी’ की मेज पर लिटा दिया जाता था.

​30 लाख से 60 लाख तक की डील

​यह कारोबार कितना मुनाफे वाला था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक किडनी ट्रांसप्लांट का सौदा औसतन 30 लाख रुपये (जिसे कोड में ’30 एल’ कहते थे) में होता था. कुछ मामलों में यह रकम 60 लाख तक पहुंच जाती थी. इस काली कमाई का 50 प्रतिशत हिस्सा सीधे रोहित की जेब में जाता था. इसी पैसे के दम पर उसने अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर लिव-इन पार्टनर के साथ लग्जरी लाइफ जीना शुरू कर दिया था. वारदात के बाद वह अक्सर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ गोवा जैसे शहरों में ऐश करने निकल जाता था.

​गर्लफ्रेंड की एक कॉल और ढह गया साम्राज्य

शातिर रोहित अपनी पहचान छिपाने के लिए लगातार मोबाइल नंबर बदल रहा था. लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उसकी गर्लफ्रेंड बनी. फरारी के दौरान वह अपनी प्रेमिका से संपर्क करने की कोशिश में लगा रहा. पुलिस की सर्विलांस टीम ने जब संदिग्ध नंबरों को ट्रैक किया, तो कड़ियां जुड़ती गईं और आखिरकार पुलिस उस तक पहुंचने में कामयाब रही.

​कानपुर पुलिस की इस कार्रवाई ने एक बड़े रैकेट को ध्वस्त तो कर दिया है, लेकिन अभी भी कई सवालों के जवाब बाकी हैं. मेरठ के कुछ नामी डॉक्टर, ओटी स्टाफ और प्रयागराज के कई एजेंट अभी भी फरार हैं. जांच का दायरा अब उन बड़े अस्पतालों तक भी पहुंच रहा है, जिन्होंने मोटी रकम के लालच में इन ‘कमांडो सर्जरीज’ के लिए अपने दरवाजे खोले.

अनुराग अग्रवाल
अनुराग अग्रवाल

सोलो ट्रैवलिंग का शौक. सहारा समय, इंडिया वॉइस और न्यूज़ नेशन जैसी संस्थाओं में 18 साल से ज्यादा का टीवी जर्नलिज्म का अनुभव.

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