कोर्ट में मुकदमा, डीएम के दरबार में शिकायत! तथ्यों पर पर्दा डालकर शिकायतकर्ता ने प्रशासन को किया गुमराह

🔴खुद कटघरे में, ट्रस्ट पर लगाए आरोप! डीएम से शिकायत में मुकदमे का जिक्र तक नहीं
कुशीनगर। चित्रगुप्त मंदिर मे देवाधिदेव महादेव के शिवलिंग स्थापना का विरोध करने वाले व चित्रगुप्त मंदिर मे अवैध कब्जा कर व्यवसायिक प्रतिष्ठान का निर्माण करने की योजना बनाने वाले स्वयंसेवी संगठनो के कुछ लोगो द्वारा मंदिर की व्यवस्था संभाल रहे ट्रस्ट के पीठाधीश्वर के खिलाफ जिलाधिकारी से की गयी शिकायत के बाद मंदिर पर जांच करने पहुंचे तहसीलदार व राजस्व टीम ने मौके का पुरा निरीक्षण किया, दोनो पक्षों से पूछताछ की और बयान दर्ज किया। इस दौरान जब ट्रस्ट के महासचिव ने मंदिर को लेकर चल रहे मुकदमे के संबध मे अवगत कराया तो तहसीलदार ने कहा कि शिकायतकर्ता ने अपने शिकायतपत्र मे न तो मुकदमे का उल्लेख किया है और न ही इसकी जानकारी दी है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि शिकायतकर्ता ने न्यायालय में लंबित विवाद की जानकारी क्यो छिपाई?और प्रशासन गुमराह क्यो किया?
बतादे कि चित्रगुप्त मंदिर के प्रबंधन, अधिकार और कथित अनधिकृत हस्तक्षेप को लेकर मंदिर पक्ष के चित्रगुप्त मंदिर समिति ट्रस्ट ने भगवान चित्रगुप्त से मिलता-जुलता नाम से बना स्वयंसेवी संगठन श्री श्री चित्रगुप्त समिति व उनके पदाधिकारियों ( जिन्होंने डीएम से शिकायत की है) के विरुद्ध पहले ही सिविल कोर्ट जूनियर डिवीजन में मुकदमा दाखिल कर रखा है। ट्रस्ट का कहना है कि स्वयंसेवी संस्था से जुड़े कुछ लोग भीटा के जमीन पर स्थापित मंदिर पर अवैध व अनधिकृत अधिकार जताने, व्यावसायिक प्रतिष्ठान का निर्माण कराने और मंदिर की व्यवस्था में जबरिया हस्तक्षेप करने का प्रयास कर रहे थे, मना करने पर मारपीट व बवाल करने के लिए आमादा रहते थे। इसी विवाद को लेकर ट्रस्ट ने न्यायालय की शरण ली है। मामला न्यायालय में विचाराधीन होने के बावजूद शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर मंदिर की व्यवस्था और ट्रस्ट के पीठाधीश्वर के खिलाफ शिकायत करना कई सवाल खड़े कर रहा है।
🔴जब कोर्ट में मुकदमा, तो फिर प्रशासन से शिकायत का औचित्य क्या?
सबसे अहम सवाल यह है कि जब मंदिर के प्रबंधन और अधिकार को लेकर न्यायालय में विधिक लड़ाई पहले से चल रही है, तो स्वयंसेवी संस्था श्री श्री चित्रगुप्त समिति के अध्यक्ष अतुल श्रीवास्तव व मंत्री प्रमोद श्रीवास्तव ने जिलाधिकारी को दिए गए प्रार्थना पत्र में मुकदमे की स्थिति का उल्लेख क्यो नही किया? इसके पीछे वजह क्या थी? क्या प्रशासन को पूरे विवाद की जानकारी दिए बिना एकपक्षीय कार्रवाई की अपेक्षा तो नही की जा रही थी? आखिर स्वयंसेवी संस्था की ओर न्यायालय में अपना पक्ष रखने के बजाय प्रशासन को गुमराह कर विवाद को नया मोड़ देने की कोशिश क्यों की गई?
🔴 शिकायत पर तहसीलदार की जांच, दोनों पक्षों के बयान दर्ज
शिकायत के क्रम में जिलाधिकारी के निर्देश पर तहसीलदार पडरौना, राजस्व टीम के साथ चित्रगुप्त मंदिर पहुंचकर मौका-मुआयना कर पुरी जांच की और दोनों पक्षों से पूछताछ के बाद बयान दर्ज कराया। इस दौरान मंदिर पक्षकार ट्रस्ट के महासचिव ने अवगत कराया कि सिविल कोर्ट जूनियर डिविजन मे उसी स्वयंसेवी संस्था और शिकायतकर्ताओ के विरुद्ध याचिका दाखिल है जिसमे शिकायतकर्ता पक्ष हाजिर भी है। इस दरम्यान तहसीलदार ने बताया कि शिकायत पत्र में मुकदमे का कोई ज़िक्र नही किया गया है और न ही शिकायतकर्ता ने मुकदमे के संबध मे कोई जानकारी दी है।
🔴 लिखित मे फसे स्वयंसेवी संस्था के पदाधिकारी
शिकायतकर्ता ने अपने स्वयंसेवी संस्था श्री श्री चित्रगुप्त समिति के लेटरपैड पर तमाम निराधार आरोप लगाते हुए लिखित रूप से कहा है कि वर्तमान मे उनके संस्था के खिलाफ न तो कोई विवाद है और न ही किसी न्यायालय मे कोई मामला लंबित है, जबकि पडरौना सिविल कोर्ट मे मुकदमा चल रहा है और अगली तारीख 24 नवम्बर है। ट्रस्ट का कहना है कि जब उसने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटा रखा है, तब शिकायतकर्ता पक्ष को भी न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए अपना पक्ष अदालत में रखना चाहिए।
🔵 रिपोर्ट – संजय चाणक्य