एसडीएम के स्थानांतरण के बाद ठंडे बस्ते में पड़ी नगर पालिका परिषद की जांच

🔴 डीएम के 11 बिंदुओं पर जांच के आदेश, अब कार्रवाई का इंतजार, सरकारी कामकाज में गैर-निर्वाचित व्यक्ति की भूमिका भी जांच के दायरे में 

कुशीनगर। नगर पालिका परिषद कुशीनगर के कामकाज की जांच के लिए जिलाधिकारी की ओर से जारी 11 बिंदुओं के आदेश का क्या हुआ? जिस मामले में प्रशासनिक और वित्तीय कार्यप्रणाली से लेकर सरकारी निर्माण कार्य, खरीदारी आदि तक की जांच होनी थी, वह अब एसडीएम के स्थानांतरण के बाद ठंडे बस्ते में जाता नजर आ रहा है। सवाल सिर्फ जांच की रफ्तार का नहीं, बल्कि उस जवाबदेही का भी है, जिस पर नगर पालिका के कामकाज की पारदर्शिता टिकी है।

प्रकरण की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नगर पालिका परिषद कुशीनगर के कामकाज को लेकर बीते दिनों एसडीएम स्तर पर निरीक्षण की कार्रवाई हुई तो नगर पालिका अध्यक्ष किरन जायसवाल तिलमिला उठी, नतीजतन अध्यक्ष की ओर से एसडीएम को ही नोटिस जारी कर दिया गया। इसके बाद मामला जिलाधिकारी तक पहुंचा और नगर पालिका परिषद से जुड़े 11 बिंदुओं पर जांच के आदेश दिए गए। जांच की प्रक्रिया भी शुरू हुई, लेकिन एसडीएम के स्थानांतरण के बाद इसकी मौजूदा स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अधिकारी बदलने के साथ ही जांच की प्राथमिकता भी बदल गई?

🔴वित्तीय अनियमितताओं से आगे गैर-निर्वाचित व्यक्ति की भूमिका पर भी उठे सवाल

इस पूरे प्रकरण का एक अहम पहलू नगर पालिका के प्रशासनिक कामकाज में गैर-निर्वाचित व्यक्ति (अध्यक्ष पति) की कथित भूमिका है। राकेश जायसवाल की सरकारी निर्माण कार्यों के निरीक्षण के दौरान मौजूदगी, अधिकारियों के साथ बैठकों में भागीदारी और नगर पालिका कार्यालय में बैठने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि ये गतिविधियां नियमित रूप से हो रही हैं, तो यह जानना भी जरूरी है कि राकेश जायसवाल को ऐसी भूमिका निभाने का अधिकार किस वैधानिक प्रावधान, लिखित आदेश या अधिकृत व्यवस्था के तहत दिया गया है। कहना ना होगा कि नगर पालिका का संचालन निर्वाचित अध्यक्ष, सभासदों और नियमानुसार नियुक्त अधिकारियों-कर्मचारियों के माध्यम से होता है। ऐसे में किसी गैर-निर्वाचित व्यक्ति व अध्यक्ष पति राकेश जायसवाल की प्रशासनिक गतिविधियों में भूमिका यदि सामान्य सहभागिता से आगे बढ़कर निर्णयों या सरकारी कार्यों को प्रभावित करने तक पहुंचती है, तो उसकी वैधानिकता की जांच जरूरी हो जाती है। यह जांच का विषय है, न कि बिना पड़ताल किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का आधार।

🔴डीएम के आदेश पर जांच शुरू, फिर आगे क्या हुआ?

नगर पालिका परिषद कुशीनगर के खिलाफ जिलाधिकारी की ओर से 11 बिंदुओं पर जांच के आदेश दिया जाना इस बात का संकेत है कि प्रकरण को प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से लिया गया था। जांच में वित्तीय मामलों और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता के अलावा बिजली सामग्रियों की खरीदारी में गोलमाल, नगर पालिका की प्रशासनिक व्यवस्था, कार्यों के संचालन और गैर-निर्वाचित व्यक्ति की भूमिका जैसे पहलुओं को भी स्पष्ट किया जाना शामिल है। किन्तु अफसोस जांच शुरू होने के बाद अब निष्कर्ष सामने नहीं आना कई सवाल खड़ा कर रहा है। क्या सभी 11 बिंदुओं पर जांच पूरी हुई? क्या संबंधित अभिलेखों की पड़ताल की गई? क्या अधिकारियों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए गए? क्या गैर-निर्वाचित व्यक्ति की भूमिका के संबंध में कोई रिपोर्ट तैयार हुई? और यदि जांच अधूरी है, तो उसे पूरा कराने की जिम्मेदारी अब किस अधिकारी के पास है?इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना जरूरी , ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जिलाधिकारी के आदेश पर शुरू हुई जांच महज औपचारिकता बनकर रह गई है

🔴अधिकारी बदले तो क्या जांच भी बदल जाएगी?

जानकारो का कहना है कि किसी अधिकारी का स्थानांतरण प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन उसके साथ किसी महत्वपूर्ण जांच का ठहर जाना उचित नहीं माना जा सकता। यदि जांच अधिकारी के स्थानांतरण से प्रक्रिया प्रभावित हुई है, तो प्रशासन को नए सिरे से जिम्मेदारी तय कर जांच पूरी करानी चाहिए। खासकर तब, जब मामला नगर पालिका की वित्तीय व्यवस्था, सरकारी निर्माण कार्यों और प्रशासनिक कामकाज की पारदर्शिता से जुड़ा हो। अब देखना दिलचस्प होगा कि  जिलाधिकारी के आदेश पर नगर पालिका परिषद कुशीनगर के खिलाफ 11 बिंदुओं पर शुरू की गयी जांच को  गति मिलेगी? नगर पालिका के वित्तीय और निर्माण संबंधी मामलों के साथ-साथ राकेश जायसवाल की कथित प्रशासनिक भूमिका का वैधानिक आधार की फाइल, फाइलों मे दबकर धूल फाकते रह जायेगी।

🔵 रिपोर्ट – संजय चाणक्य 

Back to top button