हूती विद्रोही सऊदी अरब को यमन में कैसे फंसा गए:UAE ने गलत फैसलों की वजह से साथ छोड़ा; ट्रम्प ने भी मदद नहीं की- INA NEWS

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अपने देश को तेल की कमाई से निकालकर दुनिया का बड़ा निवेश और पर्यटन केंद्र बनाना चाहते हैं। लेकिन जिस यमन युद्ध से वे पिछले 11 साल से निकलने की कोशिश कर रहे थे, उसी ने उन्हें फिर घेर लिया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोही सऊदी शहरों, हवाई अड्डों और तेल ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, कई गलत फैसलों के कारण सऊदी अरब की मुश्किलें बढ़ी हैं। पिछले साल यमन को लेकर सऊदी अरब और UAE के बीच पुरानी साझेदारी टूट गई। सऊदी के खिलाफ लड़ाई में ट्रम्प ने भी सलमान का साथ नहीं दिया। अब सऊदी अरब अपने सहयोगी देशों की मदद से हूतियों के खिलाफ नया अभियान चला रहा है, लेकिन युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता साफ नहीं है। UAE के हटते ही कमजोर पड़ी सऊदी की रणनीति सऊदी अरब और UAE पहले यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ साथ मिलकर लड़ रहे थे। लेकिन बाद में दोनों के हित टकराने लगे। सबसे बड़ा झगड़ा इस बात पर हुआ कि युद्ध के बाद यमन पर किसका और किस तरह का शासन होना चाहिए।

सऊदी अरब- यमन में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है। UAE- यमन में अलग देश की मांग करने वाले STC के साथ खड़ा है।

2025 के आखिर में STC ने दक्षिणी यमन के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया। सऊदी अरब को लगा कि इससे उसकी सीमा की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसके बाद दिसंबर 2025 में सऊदी अरब ने मुकल्ला पोर्ट पर हवाई हमला किया। सऊदी का आरोप था कि वहां UAE से आए हथियार उतारे जा रहे थे। जबकि UAE का कहना था कि जहाजों में हथियार नहीं थे और सामान यमन में तैनात उसके सैनिकों के लिए था। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया। UAE ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ने वाले अपने सैनिक वापस बुला लिए। इसका असर यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ रहे गुटों पर पड़ा। UAE के समर्थन से तैयार हुए हजारों लड़ाके अचानक अपनी पुरानी कमान से अलग हो गए। सऊदी अरब उनकी जगह वैसी मजबूत व्यवस्था नहीं बना पाया। इससे हूतियों को मजबूत होने का मौका मिल गया। ईरान युद्ध ने सऊदी अरब को फिर घसीटा UAE से साझेदारी टूटने के बाद सऊदी अरब अभी यमन में अपने पैर जमाने की कोशिश कर ही रहा था कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद जुलाई में उनका अंतिम संस्कार हुआ। इसमें शामिल होने के लिए हूती प्रतिनिधिमंडल एक विमान से तेहरान पहुंचा। जब ये लौट रहे थे तो इन्हें कहा गया कि वे यमन की राष्ट्रीय एयरलाइन से ही वापस लौटें। उन्हें ईरान की एयरलाइन में आने नहीं दिया जाएगा। वहीं, हूती अधिकारी ईरानी विमान को सीधे सना में उतारने पर अड़े रहे। इसके बाद सरकार समर्थित फोर्स ने सना एयरपोर्ट के रनवे को बम से उड़ा दिया, ताकि ईरानी विमान वहां उतर न सके। इसके बाद प्लेन को अपना रास्ता बदलकर हूदैदाह एयरपोर्ट उतरना पड़ा। इस घटना से हूती विद्रोही इतने नाराज हो गए कि उन्होंने सऊदी के साथ चल रहा 4 साल पुराना युद्ध विराम तोड़ दिया। ट्रम्प से मदद मांगी, लेकिन अमेरिका ने हाथ खींचे सऊदी अरब को उम्मीद थी कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उसकी सैन्य मदद करेगा। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग भी बढ़ाया था। लेकिन हूतियों के खिलाफ कार्रवाई के मामले में यह भरोसा कमजोर पड़ता दिखा। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से दो बार बात की और हूतियों पर हमला करने का आग्रह किया। ट्रम्प ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया। इसके बजाय अमेरिका ने ओमान में हूतियों से बातचीत की, ताकि उनके साथ अपना संघर्षविराम बनाए रखा जा सके। सऊदी अरब अब दूसरे देशों से मदद जुटा रहा है। फ्रांस ने रक्षा संसाधन और सैन्यकर्मी भेजने पर सहमति जताई है, जबकि ब्रिटेन ने सऊदी लड़ाकू विमानों में ईंधन भरने के लिए विमान भेजने की बात कही है। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने भी रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। जंग का सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर असर मोहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालना चाहते हैं। इसके लिए वे देश में घूमने-फिरने की जगहें, खेल, फिल्में और मनोरंजन बढ़ा रहे हैं। बड़े-बड़े प्रोजेक्ट भी शुरू किए जा रहे हैं। लेकिन लगातार हो रहे हमलों से इन योजनाओं पर खतरा बढ़ गया है। इलाके में तनाव के कारण इस साल कई फिल्म समारोह, पुरस्कार कार्यक्रम और संगीत के बड़े आयोजन टालने पड़े हैं। अक्टूबर के आखिर में सऊदी अरब में होने वाली बड़ी निवेश बैठक पर भी असर पड़ने की आशंका है। तेल के ठिकानों पर हमले और तेल की सप्लाई रुकने से देश की कमाई घट सकती है। सऊदी अरब अब हूतियों से लड़ने के लिए यमन के अपने साथी गुटों की मदद ले रहा है। लेकिन जानकारों का कहना है कि सिर्फ हवाई हमले करने और कुछ इलाकों पर कब्जा करने से यह लड़ाई खत्म नहीं होगी। यमन में लड़ने वाले गुटों के बीच ही कई बातों पर सहमति नहीं है। वे इस बात पर भी एकमत नहीं हैं कि आगे यमन की सरकार कैसी होनी चाहिए। हूतियों को रोकना मुश्किल, तेल कारोबार पर खतरा सऊदी अरब के सामने दो बड़ी मुश्किलें हैं। पहली, हूतियों के हमलों को रोकना और अपनी सीमाओं और तेल के ठिकानों को सुरक्षित रखना। दूसरी, यमन में लड़ाई खत्म करने का ऐसा रास्ता निकालना, जिससे उसे बार-बार हमला न करना पड़े। जानकारों का कहना है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई जारी रहेगी, ईरान हूतियों की मदद से सऊदी अरब पर दबाव बना सकता है। ऐसे में सिर्फ हथियारों और हवाई हमलों से सऊदी अरब के लिए लंबे समय तक शांति बनाए रखना मुश्किल होगा। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की लड़ाई उसकी सीमाओं से दूर रहे, लेकिन अब यही लड़ाई उसके लिए बड़ी परेशानी बन गई है। इससे देश की सुरक्षा, तेल से होने वाली कमाई और विकास की योजनाओं पर असर पड़ रहा है। अब मोहम्मद बिन सलमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे देश को फिर से विकास के रास्ते पर कैसे आगे बढ़ाएं, जबकि यमन की लड़ाई कब खत्म होगी, यह अभी साफ नहीं है।

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यह पोस्ट सबसे पहले भस्कर डॉट कोम पर प्रकाशित हुआ हमने भस्कर डॉट कोम के सोंजन्य से आरएसएस फीड से इसको रिपब्लिश करा है |

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