पांच महीने में ही ‘फेल’ हुआ करोड़ों का नहर पैनल! पानी पड़ते ही खुली निर्माण की पोल

🔴 80 मीटर कंक्रीट भरभराकर ध्वस्त जून में पानी छोड़ा, दरारों ने पहले ही दे दी थी चेतावनी
कुशीनगर।किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने वाली मुख्य पश्चिमी गंडक नहर के पैनल ने निर्माण की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। वाल्मीकिनगर बैराज से महराजगंज होते हुए कुशीनगर आने वाली इस महत्वपूर्ण नहर के किमी 73 पर महज कुछ माह पहले बनाया गया कंक्रीट का पैनल पानी के दबाव के सामने टिक नहीं सका।बीते सोमवार की रात शुरू हुआ टूटने का सिलसिला मंगलवार रात तक करीब 80 मीटर हिस्से के ध्वस्त होने तक पहुंच गया। ताजा रिपोर्टों में भी इस स्थान पर करीब 75 मीटर आरसीसी पैनल के ध्वस्त होने की पुष्टि हुई है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस पैनल का निर्माण करीब पांच माह पहले कराया गया था, उसमें नहर में पानी छोड़े जाने के कुछ ही समय बाद दरारें दिखाई देने लगी थीं, जिसे विभाग ने मनबढई का परिचय देते हुए नजरअंदाज कर दिया। ग्रामीणों का आरोप है कि दरारों को गंभीरता से लेने के बजाय कहीं-कहीं सीमेंट-बालू का लेप लगाकर मामला दबाने की कोशिश की गई। अब पैनल का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरने के बाद निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल और गहरा गया है।
पहले दरारें आईं, फिर भरभराकर टूट गया पैनल
ग्रामीणों के मुताबिक जून में नहर में पानी छोड़े जाने के बाद ही पैनल में जगह-जगह दरारें पड़ने लगी थीं। उस समय यदि निर्माण की तकनीकी जांच और गुणवत्ता परीक्षण कराया जाता तो शायद स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती। लेकिन दरारों की अनदेखी का नतीजा अब सामने है।पैनल के ध्वस्त होने से नहर के किनारे मिट्टी के कटाव और पानी के रिसाव का खतरा भी बढ़ गया है। विभाग फिलहाल क्षतिग्रस्त हिस्से में मिट्टी भरे बोरे लगाकर स्थिति संभालने में जुटा है।
🔴 इन गांवों के सामने भी मंडरा रहा खतरा
मुख्य पश्चिमी गंडक नहर के पैनल क्षतिग्रस्त होने का मामला केवल किमी 73 तक सीमित नहीं बताया जा रहा। ढोलहां, कोटवा, नंदन छपरा, मुसहरी, सौरहा बुजुर्ग, कोहरगड्डी, खजुरी बाजार, बरवा रतनपुर, गड़हिया बसंतपुर, बंधु छपरा और बिहारी छपरा सहित कई स्थानों पर पैनल की स्थिति को लेकर ग्रामीणों में चिंता है। दरअसल यह वही नहर है जो वाल्मीकिनगर बैराज से निकलकर महराजगंज और कुशीनगर होते हुए बिहार की ओर जाती है। इससे जुड़ी शाखा नहरों और माइनरों के माध्यम से बड़ी कृषि भूमि को सिंचाई का पानी मिलता है।
🔴 मरम्मत के नाम पर फिर वही सवाल जांच कब?
ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि जब पांच माह पहले ही करोडो रुपये खर्च कर नया पैनल बनाया गया था तो इतनी कम अवधि में उसके टूटने की वजह क्या है? क्या निर्माण में निर्धारित मोटाई, कंक्रीट की गुणवत्ता,मिश्रण, आधार तैयार करने की प्रक्रिया और अन्य तकनीकी मानकों का पालन हुआ था? लोगों की मांग है कि क्षतिग्रस्त हिस्से की सिर्फ मरम्मत कराने के बजाय निर्माण की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए। निर्माण में इस्तेमाल सामग्री के नमूने लिए जाएं, पुराने कार्य की माप पुस्तिका और गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट देखी जाए तथा यह भी तय हो कि निर्माण के लिए जिम्मेदार एजेंसी और संबंधित अधिकारियों की भूमिका क्या रही।
🔵 पुराना दर्द, नया निर्माण और फिर वही कहानी!
मुख्य पश्चिमी गंडक नहर के पैनल टूटने का मामला नया नहीं है। वर्षों से इसके अलग-अलग हिस्सों में क्षति और टूटने की घटनाएं सामने आती रही हैं। वर्ष 2019 में दुदही क्षेत्र में नहर टूटने से पानी गांवों में घुस गया था, जबकि नवंबर 2020 में खड्डा क्षेत्र के गैनही जंगल के पास पैनल टूटने से करीब 200 मीटर हिस्सा क्षतिग्रस्त होने की रिपोर्ट सामने आई थी। ऐसे में सवाल सिर्फ इस बार टूटे 80 मीटर पैनल का नहीं है। सवाल यह है कि हर बार टूटने के बाद मरम्मत होती रहेगी या निर्माण की गुणवत्ता और नहर की सुरक्षा व्यवस्था की जड़ तक पहुंचकर जिम्मेदारी भी तय होगी? ग्रामीणों ने उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए चेतावनी दिया है कि यदि क्षतिग्रस्त पैनल और आसपास के कमजोर हिस्सों को समय रहते दुरुस्त नहीं किया गया तो पानी का दबाव बढ़ने पर स्थिति गंभीर हो सकती है। सिंचाई विभाग की ओर से फिलहाल क्षतिग्रस्त हिस्से में वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्था और नए निर्माण की बात कही जा रही है।
🔴 किसने नही सुनी चेतावनी
बेशक! सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जून में पानी छोड़े जाने के बाद पैनल में दरारें दिखाई देने लगी थीं, तब विभागीय स्तर पर क्या कार्रवाई हुई? क्या मौके का निरीक्षण हुआ? क्या कंक्रीट की गुणवत्ता की जांच कराई गई? क्या निर्माण की माप और गुणवत्ता परीक्षण अभिलेखों का सत्यापन हुआ? ग्रामीणों का कहना है कि दरारें चेतावनी थीं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया गया और अब वही चेतावनी 80 मीटर के ध्वंस में बदल गई। कहना ना होगा कि मुख्य पश्चिमी गंडक नहर केवल कंक्रीट की दीवार नहीं, बल्कि हजारों किसानों की सिंचाई व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। ऐसे में पैनल का इतनी कम अवधि में टूटना सिर्फ निर्माण की क्षति नहीं, बल्कि सरकारी धन, गुणवत्ता निगरानी और विभागीय जवाबदेही तीनों पर बड़ा सवाल है।अब देखना यह है कि विभाग केवल टूटे पैनल पर नया कंक्रीट चढ़ाकर मामला खत्म करता है या फिर पुराने निर्माण की गुणवत्ता की जांच कर जिम्मेदारी भी तय करता है।
🔴 रिपोर्ट – संजय चाणक्य