UP News: गंगा में नॉनवेज फूज वेस्ट फेंकने से आहत हो सकती हैं हिंदुओं की भावनाएं… जानें हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा – INA

वाराणसी में गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी के दौरान मांसाहारी भोजन करने और बचा हुआ कचरा नदी में फेंकने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने टिप्पणी की है. हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा कृत्य हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है. जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला और जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की पीठ ने वाराणसी की घटना से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की.
इस बीच हाई कोर्ट ने वाराणसी में गंगा की लहरों पर इफ्तार करने वाले आठ आरोपियों की अर्जी मंजूर करते हुए उन्हें सशर्त जमानत दे दी. उनके खिलाफ गंगा की बीच धारा में नाव पर रमजान के महीने में इफ्तार कर मांस खाने के बाद हड्डियां गंगा में फेंककर लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप है. जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकलपीठ ने पांच और जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने तीन आरोपियों की अलग-अलग याचिकाओं पर यह आदेश दिया है. अपने हलफनामे में आरोपियों ने माफी मांगी है. इस आधार पर उन्हें यह राहत दी गई है.
कोर्ट ने क्यों दी जमानत?
जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने कहा कि यह मामला मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा आयोजित रोजा इफ्तार पार्टी से संबंधित है. इस पार्टी के दौरान भोजन करते समय, मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने मांसाहारी भोजन का सेवन किया, जिसके अवशेष उन्होंने गंगा नदी में फेंक दिए. कोर्ट की निष्पक्ष राय में, यह तथ्य हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला सिद्ध हुआ है. हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि उनके पश्चाताप व्यक्त करने को जमानत देने के लिए विचारणीय माना जा सकता है. इसमें कहा गया है कि न केवल आरोपियों ने, बल्कि उनके परिवारों ने भी “समाज को हुई पीड़ा” के लिए खेद व्यक्त किया है.
आरोपियों की दलीलें पश्चाताप को दर्शाती है
जस्टिस ने आगे यह भी कहा कि कोर्ट इस बात को भी समझता है कि किसी आपराधिक मामले में अभियोजन का सामना करते समय, आरोपी की ओर से हलफनामा दायर करने वाला व्यक्ति अपने अपराध को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं कर सकता; इसके अलावा, जब कोर्ट जमानत देने पर विचार कर रहा हो, तो कथित अपराध को स्वीकार करना अनुचित होता है. हालांकि, कोर्ट के समक्ष जमानत याचिकाओं के समर्थन में दायर किए गए हलफनामे और साथ ही आवेदकों के वकील द्वारा दी गई दलीलें किए गए कृत्यों के प्रति वास्तविक पश्चाताप को दर्शाते हैं.
नाव मालिक के आरोप संदेह के घेरे में
वहीं कोर्ट ने यह भी पाया कि आरोपियों के खिलाफ शुरू में लगाए गए किसी भी अपराध के लिए अधिकतम सजा सात वर्ष से अधिक कारावास की नहीं है. इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने नाव मालिक के इस आरोप के संबंध में संदेह व्यक्त किया कि आरोपी ने उसकी नाव पर जबरन कब्जा कर लिया था. यह कहना ही काफी होगा कि मामला दर्ज होने से पहले, उक्त नाविक ने अपने साथ हुई कथित जबरन वसूली के संबंध में कोई रिपोर्ट या शिकायत दर्ज नहीं कराई थी. हाई कोर्ट की प्रथम दृष्ट्या राय में, नाविक अनिल साहनी द्वारा जबरन वसूली के आरोपों को सामने लाने में की गई देरी, उसकी कहानी की सत्यता पर संदेह पैदा करती है.
गंगा में नॉनवेज फूज वेस्ट फेंकने से आहत हो सकती हैं हिंदुओं की भावनाएं… जानें हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा
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